पर्यटकों को बचाने में गई थी बेटे की जान, अब भी ताजा हैं जख्म, आदिल हुसैन की कहानी

पहलगाम आतंकी हमले को एक साल बीत चुका है, लेकिन उस दिन का दर्द आज भी लोगों के दिलों में ताजा है. पर्यटकों को बचाने की कोशिश में जान गंवाने वाले आदिल हुसैन शाह की कहानी आज भी हर किसी को भावुक कर देती है. परिवार के लिए जिंदगी अब पहले जैसी नहीं रही.

Advertisement
आदिल की पत्नी गुलनाज अख्तर के लिए यह सदमा सह पाना आसान नहीं था (Photo: PTI) आदिल की पत्नी गुलनाज अख्तर के लिए यह सदमा सह पाना आसान नहीं था (Photo: PTI)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 22 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 1:09 PM IST

पहलगाम हमले को एक साल गुजर चुका है, लेकिन दर्द आज भी उतना ही ताजा है. पहलगाम में हुए आतंकी हमले में मारे गए स्थानीय घोड़ा चलाने वाले आदिल हुसैन शाह के परिवार के लिए वक्त जैसे थम सा गया है. आदिल अपने परिवार के सबसे बड़े बेटे और एकमात्र कमाने वाले थे. वे पहलगाम में अपने घोड़े पर सैलानियों को घुमाकर परिवार का पालन-पोषण करते थे.

Advertisement

22 अप्रैल को हुए उस हमले के दौरान आदिल ने पर्यटकों को बचाने की कोशिश की, लेकिन इसी कोशिश में उन्होंने अपनी जान गंवा दी. उनके जाने के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. उनकी पत्नी गुलनाज अख्तर के लिए यह सदमा सह पाना आसान नहीं था. उन्होंने इस दर्द के साथ जीना सीख लिया है, लेकिन जिंदगी अब पहले जैसी नहीं रही.

'हर दिन एक संघर्ष बन गया है'

गुलनाज अब सरकारी नौकरी के सहारे घर चला रही हैं, लेकिन पति और फिर अपनी नन्ही बेटी को खोने का दर्द उन्हें हर पल तोड़ता है. वे कहती हैं कि आदिल ही सब कुछ संभालते थे-घर, खर्च, जिम्मेदारियां और अब उनके बिना हर दिन एक संघर्ष बन गया है.

आदिल के पिता का दर्द भी कम नहीं है. जब भी पहलगाम में सैलानियों का मौसम आता है, उन्हें अपने बेटे की याद और ज्यादा सताती है. वे कहते हैं कि पहले इन्हीं दिनों में वे अपने बेटे के साथ पहलगाम जाया करते थे, लेकिन अब वही बेटा जमीन में दफन है.

Advertisement

देखें ये पूरी रिपोर्ट

परिवार के बाकी सदस्य भी इस सदमे से उबरने की कोशिश कर रहे हैं. सरकार की ओर से कुछ मदद जरूर मिली है, लेकिन बेटे को खोने का गम किसी भी सहारे से कम नहीं हो सकता. फिर भी परिवार को इस बात पर गर्व है कि आदिल ने दूसरों की जान बचाते हुए अपनी जान दी.

'आज भी हर दिन आदिल की याद आती है'

उनके भाई कहते हैं कि यह दुख सहन करना बेहद मुश्किल है, लेकिन इस बात से थोड़ी तसल्ली मिलती है कि आदिल ने इंसानियत की मिसाल पेश की. उन्होंने बिना धर्म या मजहब देखे लोगों की जान बचाने की कोशिश की.सरकार ने आदिल के परिवार को करीब 15 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी. महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने भी परिवार की मदद की और घर बनवाने का वादा निभाया. उनके सहयोग से परिवार को कुछ सहारा जरूर मिला है.

आज भी आदिल का परिवार उसी घर में उनकी यादों के साथ जी रहा है. उनकी पत्नी अब अपने माता-पिता के साथ रहती हैं, क्योंकि पुरानी यादें उन्हें परेशान करती हैं.पहलगाम आतंकी हमले की पहली बरसी पर उन 26 लोगों की यादें एक बार फिर ताजा हो गई हैं, जिन्होंने इस हमले में अपनी जान गंवाई. लश्कर-ए-तैयबा द्वारा किए गए इस हमले ने सिर्फ परिवारों को नहीं, बल्कि पूरे देश को गहरा जख्म दिया है.एक साल बाद भी दर्द वही है, बस वक्त आगे बढ़ गया है.

Advertisement

कौन था आदिल हुसैन शाह
आदिल हुसैन शाह, पहलगाम का रहने वाला एक मेहनती युवक था, जो पिछले कई सालों से घोड़े चलाकर अपना और अपने परिवार का गुजारा करता था.वह साल 2010 से इस काम में जुड़ा था. शुरुआत में वह चंदनवारी में अमरनाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को घोड़े पर बैठाकर ले जाता था. बाद में जब पहलगाम में सालभर पर्यटन बढ़ा, तो आदिल ने वहीं रहकर काम करना शुरू कर दिया.

घर में वह सबसे बड़ा था और 4-5 सदस्यों के पूरे परिवार की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर थी. परिवार में उसकी बात को अंतिम माना जाता था,

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement