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राम मंदिर के लिए 28 साल पहले छोड़ा था अन्न, अब अयोध्या में बसने की इच्छा

aajtak.in
  • 01 अगस्त 2020,
  • अपडेटेड 11:36 PM IST
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अयोध्या में राम मंदिर की तैयारियां जोरों पर हैं. ऐसे तमाम लोग हैं जिन्होंने राम मंदिर के निर्माण के लिए वर्षों संघर्ष किया. मध्य प्रदेश के जबलपुर की रहने वाली 81 साल की उर्मिला चतुर्वेदी ने 28 साल पहले विवादित ढांचा गिरने पर संकल्प लिया था कि जब तक राम मंदिर का निर्माण शुरू नहीं होगा वो अन्न ग्रहण नहीं करेंगी और अब जब 5 अगस्त को राम मंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन होने जा रहा है तो उर्मिला को अपना संकल्प पूरा होता दिख रहा है.

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1992 में जब ढांचा गिरा था तब उर्मिला चतुर्वेदी 53 साल की थीं. ढांचा गिरने के बाद जब देश मे दंगे हुए तो इससे आहत होकर ही उर्मिला ने संकल्प लिया था कि जिस दिन सबकी सहमति से मंदिर निर्माण शुरू होगा उस दिन वो अन्न ग्रहण करेंगी. अब जब 5 अगस्त को मंदिर का भूमिपूजन होने जा रहा है तो उर्मिला चतुर्वेदी की इच्छा है कि वे अयोध्या में जाकर बस जाएं.


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बाकी जीवन अयोध्या में बिताना चाहती हैं उर्मिला: 

राम का नाम जपते हुए पिछले 28 साल से बिना अन्न के जीवन बिता रही उर्मिला चतुर्वेदी का कहना है कि उनका बहुत मन था कि भूमिपूजन वाले दिन वो अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन करें लेकिन सबने कहा है कि ये मुमकिन नहीं है क्योंकि वहां सिर्फ आमंत्रण मिलने पर ही जाया जा सकता है. उर्मिला चतुर्वेदी का कहना है कि उनका संकल्प तो पूरा हो ही गया अब उनकी बस इतनी इच्छा है कि अयोध्या में थोड़ी सी जगह मिल जाए ताकि बाकी जीवन वो वहां बिता सकें.

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कंठस्थ हैं रामायण की चौपाइयां: 

उर्मिला चतुर्वेदी ने जहां एक तरफ राम मंदिर निर्माण शुरू होने तक अन्न ग्रहण ना करने का संकल्प लिया तो वहीं उनका ज्यादातर समय पूजा-पाठ और रामायण पढ़ने में बीतता है. पिछले कई सालों से उनकी दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आया है. 

उर्मिला चतुर्वेदी सुबह जल्दी उठ कर पूजा करने के बाद घर के बच्चों के साथ समय बिताती हैं और उसके बाद रामायण पढ़तीं हैं. वैसे तो उर्मिला अकेले दिनभर रामायण पढ़ती हैं लेकिन समय मिलने पर कई बार घर के अन्य सदस्य भी उनके साथ रामायण या गीता पढ़ते हैं.

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परिजनों के कहने से भी नहीं तोड़ा संकल्प: 

उर्मिला चतुर्वेदी की बहू रेखा के मुताबिक जब वो घर मे करीब 17 साल पहले आई तब से उसने मां को ऐसा ही देखा है. रेखा के मुताबिक मां सिर्फ दूध या फलहार ही लेती हैं और अन्न का एक दाना नहीं लेतीं लेकिन इसके बावजूद उनमें खूब ऊर्जा है. 

रेखा ने बताया कि इतने सालों से खाना नहीं खाने के बावजूद मां अपना सारा काम खुद ही करती थीं लेकिन अब बीते 3-4 साल से उम्र की वजह से शरीर मे थोड़ी कमज़ोरी आ गयी है लेकिन उनकी बाकी दिनचर्या का नियम जस का तस बना हुआ है. उनको कई बार घरवालों से लेकर रिश्तेदारों और समाज के अन्य लोगों ने संकल्प खोलकर खाना खाने को मनाया लेकिन वो नहीं मानीं.

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