पेंटागन का AI बेस्ड प्रोजेक्ट MAVEN: स्क्रीन पर खतरा दिखते ही खुद कमांडर से पूछता है, कौन सा टारगेट पहले उड़ाएं?

अमेरिका वॉर के दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का यूज काफी समय से कर रहा है. पेंटागन का एक खास प्रोजेक्ट मेवेन है. इससे वहां की मिलिट्री ये डिसाइड करती है कि कहां और कब अटैक करना है.

Advertisement
अमेरिका का खास प्रोजेक्ट Maven क्या है? (Photo: ITG) अमेरिका का खास प्रोजेक्ट Maven क्या है? (Photo: ITG)

मुन्ज़िर अहमद

  • नई दिल्ली ,
  • 07 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 12:33 PM IST

आज की जंग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और टेक्नोलॉजी का खूब यूज किया जा रहा है. लगभग महीने भर से चल रहे इस मिडिल ईस्ट महाजंग में साइबर वॉर के अलग अलग तरीके दुनिया ने देखे हैं. इस बार यहां तक कि कई मामलों में AI ही ये तय भी कर रहा है कौन मरेगा और कौन बचेगा. सिर्फ टैंक, मिसाइल और फाइटर जेट सबकुछ तय नहीं कर रहे हैं. 

Advertisement

इस वॉर में डेटा और आर्टिफिशियलइ इंटेलिजेंस भी फाइटर जेट और मिसाइज जितनी ही भुमिका निभा रहे हैं. या यों कहें कि उससे ज्यादा काम कर रहे हैं. इसी बदलती जंग का सबसे बड़ा उदाहरण है अमेरिका का Project Maven, जो अब मिडिल ईस्ट में चल रहे वॉर के बीच चर्चा में है. प्रोजेक्ट मेवेन को एल्गोरिद्मिक वॉरफेयर क्रॉस फंक्शनल टीम भी कहा जाता है.

अमेरिका का प्रोजेक्ट मेवेन

प्रोजेक्ट मेवेन दरअसल एक AI बेस्ड सिस्टम है, जिसे अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) ने शुरू किया था. इसका मकसद है भारी मात्रा में आने वाले वीडियो, तस्वीर और सर्विलांस डेटा को तेजी से समझना और उसमें से जरूरी जानकारी निकालना. पहले जो काम इंसान घंटों में करता था, अब वही काम AI कुछ मिनटों में कर देता है. यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है.

यह भी पढ़ें: साइबर वॉर के वे खास तरीके, जो किसी भी देश की कमर तोड़ देते हैं

Advertisement

मिडिल ईस्ट में जब भी अमेरिका या उसके पार्टनर देश ऑपरेशन करते हैं, तो हजारों घंटे का ड्रोन फुटेज और सैटेलाइट डेटा आता है. इस डेटा को समझना आसान नहीं होता. यहां प्रोजेक्ट मेवेन काम आता है. यह सिस्टम खुद ही वीडियो में गाड़ियों, हथियारों, ठिकानों और संदिग्ध ऐक्टिविटीज को पहचान लेता है और सेना को अलर्ट देता है कि कहां ध्यान देना है.

टारगेट पहचानने में AI की मदद

हाल के ईरान से जुड़े तनाव में भी इस तरह की AI टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल की चर्चा तेज हुई है. कई रिपोर्ट्स में कहा गया कि अमेरिका ने AI की मदद से टारगेट पहचानने और तेजी से फैसला लेने की क्षमता को काफी बढ़ा लिया है. यानी जहां पहले टारगेट ढूंढने और कन्फर्म करने में वक्त लगता था, अब वही प्रोसेस बहुत तेज हो गया है. इससे स्ट्राइक ज्यादा सटीक और समय पर हो पा रही है.

यह भी पढ़ें: एक छोटे से डिवाइस ने ऐसे बचाई ईरान में फंसे US पायलट की जान, पेंटागन की टेक्नोलॉजी का खेल

प्रोजेक्ट मेवेन की सबसे खास बात यह है कि यह सिर्फ डेटा दिखाता नहीं, बल्कि उसे समझकर सुझाव भी देता है. उदाहरण के लिए, अगर किसी इलाके में बार-बार संदिग्ध गतिविधि दिखती है, तो यह सिस्टम पैटर्न पहचानकर सेना को पहले ही चेतावनी दे सकता है. इससे हमले से पहले ही तैयारी की जा सकती है.

Advertisement

डेटा ड्रिवन वॉर

यही वजह है कि आज की जंग को डेटा ड्रिवन वॉर कहा जा रहा है. मिडिल ईस्ट जैसे इलाके में, जहां हालात तेजी से बदलते हैं और जमीन पर स्थिति हर मिनट अलग हो सकती है, वहां ऐसी टेक्नोलॉजी बेहद अहम हो जाती है. Project Maven सेना को यह ताकत देता है कि वह रियल टाइम में फैसला ले सके.

लेकिन इस टेक्नोलॉजी के साथ कई सवाल भी जुड़े हैं. सबसे बड़ा सवाल है भरोसे का. अगर AI किसी टारगेट को गलत पहचान ले तो क्या होगा? जंग के मैदान में एक छोटी गलती भी बड़ा नुकसान कर सकती है. इसलिए अभी भी अंतिम फैसला इंसान ही लेता है, लेकिन AI उस फैसले को प्रभावित जरूर कर रहा है.

दूसरा मुद्दा नैतिकता का है. जब मशीनें तय करने लगें कि कौन सा टारगेट सही है और कौन नहीं, तो जिम्मेदारी किसकी होगी? यही वजह है कि Project Maven जैसे प्रोजेक्ट पर पहले भी विवाद हो चुका है. कुछ टेक कंपनियों के कर्मचारियों ने इसका विरोध भी किया था, क्योंकि उन्हें डर था कि AI का इस्तेमाल युद्ध को और खतरनाक बना सकता है.

प्राइवेट कंपनियों के कर्मचारियों ने हमेशा किया विरोध

प्रोजेक्ट Maven के लिए शुरू में गूगल जैसे प्राइवेट टेक पार्टनर जोड़े गए, लेकिन कर्मचारियों के विरोध के बाद 2018 में गूगल बाहर हो गया. हालांकि बाद में Palantir समेत कई कंपनियों ने इसका काम संभाला. 

Advertisement

यह भी पढ़ें: पहले इंटरनेट ठप, फिर गूंजीं मिसाइलें, Iran पर ऐसे चला डिजिटल अटैक, साइबर वॉरफेयर की पूरी कहानी

समय के साथ यह प्रोजेक्ट सिर्फ एक छोटा एक्सपेरिमेंट नहीं रहा, बल्कि 2023 में इसे ऑफिशियल प्रोग्राम ऑफ रिकॉर्ड का दर्जा मिला. तभी इसे नेशनल जियोस्पेशल इंटेलिजेंस एजेंसी (National Geospatial‑Intelligence Agency) के तहत शिफ्ट कर दिया गया.

आज ये ड्रोन ऑपरेशन, टार्गेटिंग, डेटा फ्यूज़न और कमांड‑एंड‑कंट्रोल जैसे कई मिलिट्री वर्कफ़्लो में कोर सिस्टम की तरह काम करता है और हजारों सैन्य अनालिस्ट्स और अफसरों के लिए रोज़मर्रा का टूल बन चुका है

बैकफायर के बावजूद अमेरिका को दिख रहा प्रोजेक्ट मेवेन में फ्यूचर

इसके बावजूद, अमेरिका इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है. उसका मानना है कि फ्यूचर की जंग वही जीतेगा जिसके पास बेहतर डेटा और बेहतर AI होगा. प्रोजेक्ट मेवेन इसी स्ट्रैटिजी का हिस्सा है, जहां टेक्नोलॉजी को सीधे वॉर में इस्तेमाल किया जा रहा है.

अगर मिडिल ईस्ट के मौजूदा हालात को देखें, तो साफ है कि अब सिर्फ जमीन पर लड़ाई नहीं हो रही. ड्रोन, सैटेलाइट और AI मिलकर एक नई तरह की जंग बना रहे हैं. ईरान और उसके आसपास के क्षेत्रों में बढ़ती टेंशन के बीच, इस तरह की टेक्नोलॉजी अमेरिका को बढ़त देती नजर आती है.

आने वाले समय में बढ़ेगा ट्रेंड

आने वाले समय में यह ट्रेंड और बढ़ेगा. प्रोजेक्ट मेवेन जैसे सिस्टम और ज्यादा एडवांस्ड होंगे, और शायद एक समय ऐसा आए जब जंग का बड़ा हिस्सा मशीनें ही संभालें. लेकिन तब भी एक सवाल हमेशा रहेगा, क्या जंग को पूरी तरह मशीनों के भरोसे छोड़ना सही होगा?

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement