मिडिल ईस्ट में पिछले कुछ दिनों से वॉर जैसे हालात बने हुए हैं. वॉर हर फ्रंट पर लड़ी जा रही है. इसी बीच साइबर सिक्योरिटी एजेंसी Check Point Research की ताज़ा स्टडी बताती है कि ईरान से जुड़े साइबर एक्टर्स ने मिडिल ईस्ट में बड़े पैमाने पर इंटरनेट से जुड़े IP कैमरों को टार्गेट करना शुरू कर दिया है.
रिपोर्ट के मुताबिक इन कैमरों को हैक करने का मकसद सिर्फ जासूसी नहीं हो सकता. रिसर्चर्स का कहना है कि इन कैमरों की मदद से मिसाइल हमलों से पहले इलाके की निगरानी और हमले के बाद नुकसान का आकलन (Battle Damage Assessment) किया जा सकता है.
यानी अब जंग सिर्फ मिसाइल, ड्रोन और सैनिकों से नहीं लड़ी जा रही, बल्कि सिविलियन टेक्नोलॉजी, जैसे CCTV कैमरे भी इस युद्ध का हिस्सा बनते जा रहे हैं. आपको बता दें कि मल्टिपल रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई के कंपाउंड में बॉम्बिंग से पहले इजरायल ने तेहरान के सैकड़ों सीसीटीव हैक किए थे, ताकि लोकेशन का सटीक अंदाजा लगाया जा सके.
वॉर के बीच अचानक बढ़ीं CCTV हैकिंग की गतिविधियां
Checkpoint Research ने अपने डेटा में पाया कि 28 फरवरी से IP कैमरों को टार्गेट करने की गतिविधियों में अचानक तेज़ी आई. यह बढ़ोतरी उस समय देखी गई जब मिडिल ईस्ट में सैन्य तनाव बढ़ रहा था और कई जगहों पर मिसाइल गतिविधियां भी दर्ज की जा रही थीं.
रिसर्च के अनुसार इस हैकिंग का दायरा सिर्फ एक देश तक सीमित नहीं था. इजराइल, UAE, कतर, बहरीन, कुवैत, लेबनान और साइप्रस जैसे कई देशों में इंटरनेट से जुड़े कैमरों को स्कैन करने और उन तक पहुंचने की कोशिशें देखी गईं.
साइबर एक्सपर्ट्स का कहना है कि इन हमलों के पैटर्न और इस्तेमाल किए गए नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर से संकेत मिलता है कि इनके पीछे ईरान से जुड़े साइबर थ्रेट एक्टर्स हो सकते हैं.
कैसे काम करता है यह कैमरा हैकिंग ऑपरेशन
आज दुनिया भर में लाखों CCTV और IP कैमरे इंटरनेट से जुड़े हुए हैं. यही कनेक्टिविटी उन्हें आसान निशाना भी बना देती है. रिपोर्ट के मुताबिक हमलावर पहले इंटरनेट पर ऐसे कैमरों को स्कैन करते हैं जो पब्लिक नेटवर्क से जुड़े होते हैं. इसके बाद वे कैमरों में मौजूद पुरानी सिक्योरिटी कमजोरियों का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं.
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Hikvision और Dahua जैसे पॉपुलर ब्रांड के CCTV कैमरों को निशाना बनाया गया
इस अभियान में खासतौर पर Hikvision और Dahua जैसे लोकप्रिय कैमरा ब्रांड्स को निशाना बनाया गया. रिसर्चर्स ने बताया कि इन कैमरों में मौजूद कई जानी-पहचानी कमजोरियों का इस्तेमाल करने की कोशिश की गई. इनमें CVE-2017-7921, CVE-2021-36260 और CVE-2021-33044 जैसी खामियां शामिल हैं. ये बेसिक दिक्कतें हैं जो आम तौर पर ज्यादातर कैमरों में देखने को मिलती हैं. इनका फायदा उठा कर साइबर क्रिमिनल्स इनका ऐक्सेस ले लेते हैं.
अगर हमला सफल हो जाए तो हमलावर कैमरे के लाइव वीडियो फीड तक पहुंच सकते हैं, जिससे उन्हें जमीन पर हो रही गतिविधियों का सीधा दृश्य मिल जाता है.
जंग में क्यों अहम हो सकते हैं हैक किए गए कैमरे
रिसर्च के मुताबिक ऐसे कैमरे युद्ध में कई तरह से उपयोगी साबित हो सकते हैं. अगर किसी इलाके में मिसाइल या ड्रोन हमला किया जाता है, तो आसपास लगे CCTV कैमरे उस हमले के बाद की स्थिति को दिखा सकते हैं. इससे हमलावर यह समझ सकते हैं कि टार्गेट को कितना नुकसान पहुंचा और क्या अगला हमला करने की जरूरत है. सैन्य भाषा में इसे Battle Damage Assessment (BDA) कहा जाता है.
इसके अलावा इन कैमरों की मदद से हमले से पहले इलाके की निगरानी भी की जा सकती है. यानी संभावित टार्गेट की गतिविधियों, सुरक्षा व्यवस्था और लोकेशन को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है.
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हमलों को छिपाने के लिए इस्तेमाल हुए VPN
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि इन साइबर गतिविधियों में हमलावरों ने अपनी पहचान छिपाने के लिए कई तकनीकों का इस्तेमाल किया. चेकप्वाइंट रिसर्च के मुताबिक इन नेटवर्क्स में Mullvad, ProtonVPN, Surfshark और NordVPN जैसे VPN सर्विसेज के एग्जिट नोड्स देखे गए.
इसके अलावा कई Virtual Private Servers (VPS) का भी इस्तेमाल किया गया, जिससे असली लोकेशन को ट्रेस करना और मुश्किल हो जाता है. रिसर्चर्स का कहना है कि इसी तरह के नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल पहले भी ईरान से जुड़े साइबर ग्रुप्स द्वारा किया जाता रहा है.
पहले भी दिखा था ऐसा पैटर्न
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कैमरों को टार्गेट करने की गतिविधियां जनवरी 14 और 15 को भी देखी गई थीं. यह वही समय था जब ईरान में बड़े विरोध प्रदर्शन चल रहे थे और क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ा हुआ था. उस दौरान ईरान ने कुछ समय के लिए अपना एयरस्पेस भी बंद कर दिया था, क्योंकि संभावित हमले की आशंका जताई जा रही थी.
रिसर्चर्स का मानना है कि इन घटनाओं के समय और कैमरा स्कैनिंग गतिविधियों के बीच का संबंध इस बात का संकेत देता है कि साइबर और फिजिकल वॉर अब एक दूसरे से जुड़ते जा रहे हैं.
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जंग का बदलता चेहरा
चेकप्वाइंट रिसर्च की ये रिपोर्ट एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है. आधुनिक युद्ध अब सिर्फ सीमाओं पर नहीं लड़े जाते. इसमें साइबर हमले, डिजिटल जासूसी, डेटा एनालिसिस और इंटरनेट से जुड़े डिवाइस भी अहम भूमिका निभा रहे हैं. स्मार्ट सिटी, स्मार्ट होम और इंटरनेट से जुड़े कैमरों की बढ़ती संख्या के बीच यह खतरा और बड़ा हो जाता है.
अगर इन डिवाइस की सुरक्षा कमजोर हो, तो वही कैमरे जो सुरक्षा के लिए लगाए गए हैं, जंग में दुश्मन की आंखें बन सकते हैं. आम तौर पर CCTV की इंटर्नल सिक्योरिटी पर लोग ध्यान नहीं देते हैं.
मुन्ज़िर अहमद