Algorithm Killing: जंग में AI तय करेगा कौन जिएगा और कौन मरेगा, शुरू हो चुका है पूरा खेल

मिडिल ईस्ट की वॉर में उभर रहा है एल्गोरिद्म वाला वॉर, जहां डेटा और मशीनें तय कर रही हैं टारगेट. इससे पहले किसी भी वॉर में इतने बड़े पैमाने पर आर्टिफ़िशियल इंटलेजिेंस का इस्तेमाल नहीं किया गया था.

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एल्गोरिद्म तय कर रहे हैं कौन जिएगा कौन मरेगा (Photo: ITG) एल्गोरिद्म तय कर रहे हैं कौन जिएगा कौन मरेगा (Photo: ITG)

मुन्ज़िर अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 05 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 7:22 PM IST

हॉलीवुड की 'टर्मिनेटर' फिल्मों में मशीनों को इंसानों की जान लेते हुए देखकर हम सिहर उठते थे. लेकिन मार्च 2026 में, यह साइंस फिक्शन अब एक कड़वी और खौफनाक सच्चाई बन चुका है.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब सिर्फ आपके ऑफिस के ईमेल ड्राफ्ट करने, तस्वीरें बनाने या बच्चों का होमवर्क कराने वाला मासूम टूल नहीं रहा. अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे ताज़ा युद्ध में, आसमान से बरसने वाली मिसाइलों का रास्ता अब इंसान नहीं, बल्कि एल्गोरिदम (Algorithms) तय कर रहे हैं.

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अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच बढ़ते टेंशन के बीच पहली बार इतनी साफ़ तरह से दिख रहा है कि मॉडर्न वॉर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका कितनी तेजी से बढ़ रही है. अगर आप इस वॉर को फॉलो कर रहे हैं तो आपने Anthropic और OpenAI का भी नाम सुना होगा जो इनडायरेक्टली मिडिल ईस्ट की इस महाजंग में शामिल हैं. 

इस वॉर में Anthropic के टूल Claude का यूज अमेरिका ने किया है. अब OpenAI को यूज किया जा रहा है. लेकिन सवाल है कि AI को कैसे और क्यों जंग में यूज किया जा रहा है?

हमने इस आर्टिकल में साइबर वॉर से जुड़ी तमाम कवरेज को ऐड किया है आप नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं.

जंग बदल रही है. हथियार वही हैं, लेकिन दिमाग अब मशीन का है

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मिलिट्री एक्सपर्ट अब खुलकर कह रहे हैं कि आने वाले वर्षों में वॉर सिर्फ सैनिकों और हथियारों से नहीं लड़ी जाएगी, बल्कि डेटा, एल्गोरिद्म और मशीनों की मदद से लड़ी जाएगी.

यही वजह है कि दुनिया भर में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या फ्यूचर में वॉर का सबसे बड़ा फैसला यानी किसे मारना है और किसे छोड़ना है किसी इंसान की जगह एक AI सिस्टम करेगा.

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ड्रोन, सैटेलाइट और डेटा. मॉडर्न वॉर में जानकारी का सैलाब

पिछले कुछ सालों में वॉर की नेचर बहुत तेजी से बदली है. पहले किसी मिलिट्री ऑपरेशन से पहले घंटों या कई बार दिनों तक इंटेलिजेंस इकट्ठा की जाती थी. ड्रोन फुटेज को एनालिस्ट देखते थे, सैटेलाइट इमेज का स्टडी किया जाता था, फिर अलग-अलग स्तरों पर मीटिंग्स के बाद यह तय होता था कि हमला करना है या नहीं.

आज वॉर के मैदान में आने वाला डेटा इतना ज्यादा हो चुका है कि उसे केवल इंसानों के भरोसे समझना लगभग असंभव हो गया है. एक मॉडर्न ड्रोन मिशन ही हजारों तस्वीरें और घंटों वीडियो रिकॉर्ड करता है.

सैटेलाइट लगातार जमीन की एक्टिविटी को रिकॉर्ड करते रहते हैं. मोबाइल लोकेशन, कम्युनिकेशन डेटा, सर्विलांस कैमरे और इंटरनेट एक्टिविटी जैसे सोर्स भी इंटेलिजेंस एजेंसियों के लिए जानकारी का बड़ा आधार बन चुके हैं. यह डेटा इतना विशाल होता है कि अगर उसे इंसानी टीम ही देखे तो कई बार महत्वपूर्ण जानकारी छूट सकती है. यहीं से वॉर में AI की एंट्री हुई.

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Project Maven. जब अमेरिका ने पहली बार AI को वॉर में उतारा

अमेरिका ने सबसे पहले इस दिशा में बड़ा कदम उठाया था. 2017 में अमेरिकी डिफेंस डिपार्टमेंट ने Project Maven नाम का एक प्रोग्राम शुरू किया था. इस प्रोजेक्ट का मकसद था ड्रोन और सर्विलांस कैमरों से आने वाले वीडियो को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से समझना.

AI को इस तरह ट्रेन किया गया कि वह वीडियो में गाड़ियों, हथियारों या संदिग्ध एक्टिविटी को पहचान सके. इससे पहले यह काम इंसानी एनालिस्ट को करना पड़ता था और कई बार घंटों की फुटेज में से एक छोटी सी चीज ढूंढना बहुत कठिन होता था.

Project Maven के बाद AI सिस्टम यह काम बहुत तेजी से करने लगे. इससे अमेरिकी सेना को यह समझ में आ गया कि फ्यूचर के वॉर में डेटा को समझने के लिए मशीनों की मदद जरूरी होगी.

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गाजा वॉर और AI टारगेट सिस्टम. जहां मशीनें बताने लगीं किसे मारना है

लेकिन AI का इस्तेमाल सिर्फ डेटा समझने तक सीमित नहीं रहा. धीरे-धीरे यह टेक्नोलॉजी वॉर में टारगेट पहचानने की प्रोसेस तक पहुंच गई. इसका सबसे विवादित उदाहरण गाजा वॉर में सामने आया.

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इजरायली सेना ने गाजा में Lavender और Gospel जैसे AI सिस्टम का इस्तेमाल किया. Lavender नाम का सिस्टम विशाल डेटा का एनालिसिस करके उन लोगों की पहचान करता था जिन्हें पोटेंशियल रूप से उग्रवादी संगठनों से जुड़ा माना जाता था.

इसमें फोन रिकॉर्ड, सोशल नेटवर्क कनेक्शन, लोकेशन डेटा और सर्विलांस से मिलने वाली जानकारी को मिलाकर एक तरह का रिस्क स्कोर तैयार किया जाता था.

दूसरी ओर Gospel नाम का सिस्टम इमारतों और ठिकानों का एनालिसिस करके यह सुझाव देता था कि कौन सी जगह मिलिट्री के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है. इन टेक्नोलॉजी की वजह से टारगेट पहचानने की प्रोसेस बहुत तेज हो गई. जहां पहले सीमित संख्या में टारगेट चिन्हित होते थे, वहीं अब सिस्टम तेजी से नए पोटेंशियल टारगेट की पहचान करने लगा.

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मिडिल ईस्ट टेंशन में AI का बढ़ता रोल

इसी बीच मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच बढ़ते टेंशन ने इस बहस को और तेज कर दिया है. हाल की रिपोर्ट्स में बताया गया कि अमेरिकी मिलिट्री ऑपरेशन में AI बेस्ड डेटा एनालिसिस सिस्टम का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है.

इन सिस्टम की मदद से सैटेलाइट डेटा, ड्रोन वीडियो और इंटेलिजेंस जानकारी को बहुत तेजी से मिलाकर पोटेंशियल मिलिट्री टारगेट का एनालिसिस किया जा सकता है.

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AI की वजह से वॉर के दौरान निर्णय लेने की प्रोसेस बेहद तेज हो गई है. पहले जिन फैसलों में कई घंटे या दिन लग जाते थे, अब वे कुछ मिनटों में लिए जा सकते हैं. यही वजह है कि कई मिलिट्री एक्सपर्ट इसे (मशीन स्पीड वॉरफेयर) यानी मशीन की गति से लड़ा जाने वाला वॉर कहने लगे हैं.

यूक्रेन वॉर ने भी दिखा दिया AI ड्रोन का भविष्य

AI का असर सिर्फ एनालिसिस और टारगेट पहचान तक सीमित नहीं है. यूक्रेन वॉर ने यह भी दिखाया है कि ड्रोन टेक्नोलॉजी कितनी तेजी से बदल रही है. यूक्रेन और रूस दोनों ने बड़े पैमाने पर ड्रोन का इस्तेमाल किया है.

हाल के वर्षों में ऐसे AI बेस्ड सिस्टम तैयार किए जा रहे हैं जो ड्रोन को टारगेट पहचानने में मदद कर सकते हैं. अगर रेडियो सिग्नल जाम हो जाए और ड्रोन का संपर्क ऑपरेटर से टूट जाए तो AI कैमरे से मिलने वाली तस्वीरों का एनालिसिस करके टारगेट को पहचानने में मदद कर सकता है.

यह टेक्नोलॉजी अभी पूरी तरह ऑटोनॉमस नहीं है, लेकिन इससे यह साफ हो गया है कि फ्यूचर में वॉर के मैदान में मशीनों की भूमिका और बढ़ने वाली है.

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अगर AI गलती कर दे तो जिम्मेदार कौन होगा

AI वॉर को लेकर सबसे बड़ी चिंता यह है कि मशीनें हमेशा पूरी तरह भरोसेमंद नहीं होतीं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम डेटा से सीखते हैं और कई बार वही डेटा उनकी सीमाएं भी तय करता है.

अगर डेटा अधूरा हो या उसमें गलत जानकारी हो तो AI भी गलत निष्कर्ष निकाल सकता है. टेक्नोलॉजी की दुनिया में इसे AI Hallucination जैसी समस्याओं से जोड़ा जाता है.

वॉर के संदर्भ में ऐसी गलती बहुत गंभीर हो सकती है क्योंकि इसका सीधा असर लोगों की जान पर पड़ सकता है. यही वजह है कि कई वैज्ञानिक और ह्यूमन राइट्स ऑर्गेनाइजेशन मांग कर रहे हैं कि AI को पूरी तरह ऑटोनॉमस हथियार सिस्टम में बदलने से पहले इंटरनेशनल नियम बनाए जाएं.

दुनिया में शुरू हो चुकी है AI वॉर रेस

दूसरी ओर मिलिट्री स्ट्रैटेजिस्ट का तर्क अलग है. उनका कहना है कि मॉडर्न वॉर में जानकारी इतनी ज्यादा होती है कि बिना AI के उसे समझना लगभग असंभव है. अगर AI का इस्तेमाल नहीं किया गया तो वॉर में निर्णय लेने की प्रोसेस बहुत धीमी हो जाएगी और इससे मिलिट्री रिस्क बढ़ सकता है.

उनके मुताबिक AI इंसानों की जगह लेने के लिए नहीं बल्कि उनकी मदद करने के लिए है. लेकिन आलोचक पूछते हैं कि अगर AI सिर्फ मदद ही कर रहा है तो फिर दुनिया भर की सेनाएं ऑटोनॉमस हथियार सिस्टम पर इतना निवेश क्यों कर रही हैं.

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यही वजह है कि कई एक्सपर्ट अब एक नई ग्लोबल दौड़ की बात कर रहे हैं AI Arms Race. अमेरिका, चीन, रूस, इज़रायल और कई अन्य देश मिलिट्री AI टेक्नोलॉजी पर तेजी से निवेश कर रहे हैं.

ड्रोन स्वार्म, ऑटोनॉमस टैंक, AI संचालित सर्विलांस सिस्टम और मशीन बेस्ड वॉर स्ट्रैटेजी जैसे क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहे हैं. अगर यह दौड़ इसी तरह जारी रही तो आने वाले वर्षों में वॉर का चेहरा पूरी तरह बदल सकता है.

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क्या फ्यूचर में मशीनें तय करेंगी मौत का फैसला

इतिहास में कई टेक्नोलॉजी ने वॉर का स्वरूप बदला है. बारूद ने मध्यकालीन वॉर को बदल दिया था. परमाणु हथियारों ने दुनिया को शक्ति संतुलन के नए दौर में पहुंचा दिया.

ड्रोन ने वॉर को दूर से लड़ना संभव बना दिया. लेकिन AI शायद पहली ऐसी टेक्नोलॉजी है जो वॉर के फैसले लेने की प्रोसेस को ही बदल सकती है. अगर मशीनें डेटा के आधार पर टारगेट सुझाने लगें और इंसान सिर्फ अंतिम मंजूरी देने तक सीमित रह जाएं तो वॉर में इंसानी भूमिका धीरे-धीरे कम हो सकती है.

और यही वह सवाल है जो आज दुनिया के सामने खड़ा है. टेक्नोलॉजी तेजी से आगे बढ़ रही है. AI पहले से ज्यादा ताकतवर हो चुका है. लेकिन क्या इंसान अपनी सबसे खतरनाक ताकत वॉर के फैसले मशीनों के भरोसे छोड़ने के लिए तैयार है.

क्योंकि अगर ऐसा हुआ, तो इतिहास में पहली बार ऐसा हो सकता है कि किसी सैनिक या जनरल ने नहीं, बल्कि एक एल्गोरिद्म ने तय किया हो कि कौन जिएगा और कौन मरेगा.

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