पूर्व भारतीय कप्तान सौरव गांगुली ने राहुल द्रविड़ को लेकर ऐसा खुलासा किया है, जिसने भारतीय क्रिकेट के पुराने दौर की सबसे बड़ी रणनीतिक चाल को फिर चर्चा में ला दिया है. गांगुली ने बताया कि एक समय ऐसा था जब ओडीआई क्रिकेट में राहुल द्रविड़ की जगह पर सवाल उठने लगे थे और चयनकर्ता उन्हें बाहर करने पर विचार कर रहे थे. लेकिन उन्होंने पूर्व कप्तान द्रविड़ का साथ नहीं छोड़ा और भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (BCCI) के खिलाफ गए.
सौरव गांगुली ने राज शमानी के पॉडकास्ट पर कहा, 'एक दौर था जब लोग कहते थे कि राहुल द्रविड़ का स्ट्राइक रेट वनडे क्रिकेट के लिए सही नहीं है. चयनकर्ता भी दूसरे खिलाड़ियों को मौका देने की बात करते थे. लेकिन मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा क्योंकि अगर मैं छोड़ देता तो शायद उनका करियर खत्म हो जाता.'
2000 के शुरुआती दौर में भारतीय क्रिकेट टीम एक ऐसे विकेटकीपर की खोज में थी, जो अच्छी बल्लेबाजी भी कर सके. जहां एडम गिलक्रिस्ट, मार्क बाउचर और कुमार संगकारा जैसे खिलाड़ी अपनी टीमों को संतुलन दे रहे थे, वहीं भारत के पास ऐसा विकल्प नहीं था. इसी वजह से टीम मैनेजमेंट ने बड़ा फैसला लेते हुए राहुल द्रविड़ को विकेटकीपिंग की जिम्मेदारी दी.
द्रविड़ को क्यों करनी पड़ी कीपिंग?
सौरव गांगुली ने बताया, 'हमारे पास ऐसा विकेटकीपर नहीं था, जो बल्लेबाजी कर सके. इसलिए हमने द्रविड़ को विकेटकीपर बनाया. इससे हम अतिरिक्त बल्लेबाज खिला सकें.' इस फैसले की वजह से भारत को मिडिल ऑर्डर में ज्यादा मजबूती मिली और मोहम्मद कैफ जैसे खिलाड़ियों की प्लेइंग-11 में जगह बनी.
राहुल द्रविड़ को विकेटकीपर बनाने का प्रयोग सिर्फ अस्थायी नहीं था. यही रणनीति 2003 क्रिकेट वर्ल्ड कप में भारत की सफलता की सबसे बड़ी वजहों में से एक बनी, जहां टीम फाइनल तक पहुंची थी.
सौरव गांगुली ने यह भी माना कि उस दौर में भारत के पास मजबूत ऑलराउंडर नहीं थे. इसी कारण गांगुली के अलावा वीरेंद्र सहवाग, सचिन तेंदुलकर और युवराज सिंह को पार्ट-टाइम गेंदबाजी करनी पड़ती थी.
आजतक स्पोर्ट्स डेस्क