न जर्सी पहनी, न मैदान में उतरे... कहानी उन 11 हीरोज की जिन्होंने पर्दे के पीछे से टीम इंडिया को वर्ल्ड चैम्पियन बनाने की कहानी गढ़ी

टीम इंडिया ने टी20 वर्ल्ड कप के फाइनल में न्यूजीलैंड को हराकर तीसरी बार वर्ल्ड चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया. हालांकि मैदान पर खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन इस जीत के पीछे कई ऐसे लोग भी रहे जिन्होंने जर्सी नहीं पहनी और मैदान में नहीं उतरे.

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टीम इंडिया ने न्यूजीलैंड को हराकर जीता वर्ल्ड कप का खिताब (Photo: ITG) टीम इंडिया ने न्यूजीलैंड को हराकर जीता वर्ल्ड कप का खिताब (Photo: ITG)

आकाश सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 11 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 7:06 AM IST

टीम इंडिया ने जब आईसीसी मेन्स टी20 वर्ल्ड कप के फाइनल में न्यूजीलैंड को हराया, तो नरेंद्र मोदी स्टेडियम जश्न से भर गया. खिलाड़ियों की आंखें नम थीं, हाथों में तिरंगा था और करोड़ों दिलों की धड़कनें एक साथ जीत का गीत गा रही थीं. अहमदाबाद से निकली इस जीत की खबर ने मानो पूरे देश में होली के तुरंत बाद दिवाली ला दी थी.

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अब जब भारत तीसरी बार टी20 का विश्व विजेता बना है तो चर्चा वर्ल्ड कप के हीरोज की हो रही है. लेकिन ये विजयी कहानी सिर्फ उन 11 खिलाड़ियों तक सीमित नहीं  है जो मैदान में उतरे थे. हर ट्रॉफी के पीछे कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो कैमरे से दूर रहते हैं, जिनके नाम स्कोरकार्ड में नहीं लिखे जाते, लेकिन उनकी मेहनत उस जीत की नींव बनती है. 

टीम इंडिया की इस विश्व विजेता कहानी में भी ऐसे कई किरदार हैं. जिन्होंने भारतीय जर्सी नहीं पहनी, मैदान पर कदम नहीं रखा. लेकिन हर खिलाड़ी को निखारा, संवारा और इतना मजबूत बनाया की उनके और उनके साथ ही देश के आगे हमेशा के लिए लिख दिया जाए- वर्ल्ड चैम्पियन... आइए ऐसे ही पर्दे के पीछे के 11 हीरोज की बात करते हैं...

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सोच और रणनीति के शिल्पकार हेड कोच

इस जीत की कहानी का पहले बड़े किरदार हैं टीम के मुख्य कोच गौतम गंभीर. वही गौतम गंभीर जिन्होंने अपनी कोचिंग में टीम इंडिया को चैम्पियंस ट्रॉफी जिताई. लेकिन उसके बाद समीकरण ही बदल गया. उनके ऊपर सवालों की बौछार होने लगी. वर्ल्ड कप में भी उनके फैसलों पर सवाल उठते रहे. लेकिन गौतम गंभीर होकर सबकुछ सुनते रहे. सहते रहे. क्योंकि उन्हें पता था कि ये आलोचनाएं अस्थायी हैं और खिताब जीत जाता स्थायी. जिस दिन हाथ में ट्रॉफी होगी उस दिन ये सवाल शाबासी में बदल जाएंगे. 

हुआ भी वही. आज गंभीर चर्चा के केंद्र में हैं. उन्होंने तमाम कठिनाइयों को सहा लेकिन खिलाड़ियों में जोश भरते गए. मैदान के ठीक बाहर कुर्सी पर बैठे गंभीर पूरे मैच में उसी जोश से नजर आते जितना की वो 11 खिलाड़ी जो मैदान के भीतर होते थे. 

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बल्लेबाजी कोच सितांशु कोटक

इस वर्ल्ड कप में टीम इंडिया के बल्लेबाजों की धमक देखने को मिली. सेमीफाइनल और फाइनल में टीम इंडिया ने जिस ताबड़तोड़ और बेखौफ ढंग से बल्लेबाजी की उसे देखकर कई कोई हैरान रह गया. लेकिन भारत की इस विस्फोटक बल्लेबाजी के शिल्पकार थे टीम इंडिया के बैटिंग कोच सितांशु कोटक. नेट्स में घंटों की मेहनत, छोटी-छोटी तकनीकी सुधार और हर खिलाड़ी को उसकी भूमिका समझाना. कोटक की इस मेहनत ने वर्ल्ड कप में टीम इंडिया की बैटिंग लाइन अप को अलग ही स्तर पर पहुंचा दिया.

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सहायक कोच रयान

टीम के सहायक कोच रयान टेन डोशेट भी इस यात्रा के अहम साथी रहे. खिलाड़ियों के साथ उनका संवाद, मैच से पहले की बारीक तैयारियां और रणनीति को जमीन पर उतारने का काम उन्होंने बखूबी निभाया. वो अक्सर मैच से पहले मीडिया में आकर टीम इंडिया की प्लानिंग पर भी बात करते थे.

बॉलिंग, फील्डिंग और बैटिंग कोच ने दी मजबूती

गेंदबाजी में जो धार पूरे टूर्नामेंट में दिखाई दी, उसके पीछे बॉलिंग कोच मोनी मोर्केल की मेहनत थी. उन्होंने गेंदबाजों को हर परिस्थिति के लिए तैयार किया. नई गेंद से आक्रमण, बीच के ओवरों में नियंत्रण और आखिरी ओवरों में दबाव.

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वहीं मैदान पर जो कैच हवा से बातें करते नजर आए और जो थ्रो सीधे विकेट पर जाकर लगे, उसके पीछे फील्डिंग कोच टी दिलीप  की सख्त मेहनत थी. उन्होंने खिलाड़ियों को यह एहसास कराया कि फील्डिंग सिर्फ एक कौशल नहीं, बल्कि मैच जिताने वाला हथियार है. इसका असर सेमीफाइनल और फाइनल में सबने देखा.

फिटनेस के पीछे की मेहनत

किसी भी बड़े टूर्नामेंट में फिटनेस ही असली परीक्षा होती है. लगातार मैच, यात्रा और दबाव के बीच खिलाड़ियों को पूरी तरह तैयार रखना आसान नहीं होता. यह जिम्मेदारी संभाली स्ट्रेंथ और कंडीशनिंग कोच Adrian Le Roux ने. उनकी देखरेख में खिलाड़ियों की ट्रेनिंग, रिकवरी और फिटनेस का ऐसा संतुलन बना कि टीम पूरे टूर्नामेंट में ताजगी के साथ खेलती नजर आई.

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थ्रो डाउन स्पेशलिस्ट रघु

भारतीय टीम के साथ साए की तरह रहने वाला एक शख्स जिसकी जितनी भी चर्चा की जाए वो कम है. थ्रो डाउन स्पेशलिस्ट रघु साल 2011 से टीम इंडिया के साथ हैं. वह नेट्स में बल्लेबाजों को हर उस रफ्तार, हर उस विपक्षी चालाकी और खतरे की ट्रेनिंग देते हैं जिससे तैयारियों में चार चांद लग जाए. उदाहरण के लिए रघु प्लेयर्स को 150km/h की रफ्तार से गेंद फेंकते हैं ताकि बाकी टीम को तेज गेंदबाजों की गेंद खेलने जब भारतीय बैटर उतरें तो उन्हें वो मिडियम पेस की लगे.

रघु की प्रतिभा के मुरीद सचिन तेंदुलकर, विराट कोहली और रोहित शर्मा जैसे दिग्गज भी हैं. रघु ने कई खिलाड़ियों को निखारा है. इस वर्ल्ड कप में उन्होंने संजू सैमसन को भी खूब ट्रेनिंग दी. जब भारत फाइनल जीता तो संजू ने सबसे पहले रघु को ही गले लगाया.

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मेडिकल स्टाफ

इसके साथ ही मेडिकल स्टाफ और थेरेपिस्ट ने भी पर्दे के पीछे बड़ी भूमिका निभाई. छोटी चोट से लेकर थकान तक. हर समस्या का हल उन्होंने चुपचाप निकाला ताकि खिलाड़ी मैदान पर सिर्फ खेल पर ध्यान दे सकें.

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टीम मैनेजमेंट

टीम की इस सफलता में प्रबंधन की भूमिका भी कम नहीं रही. जय शाह ने टीम इंडिया के प्लेयर्स को खूब सपोर्ट किया. जिसका जिक्र जीत के बाद कप्तान सूर्या और कोच गंभीर ने भी किया. पूरी व्यवस्था ने टीम को ऐसा माहौल दिया जहां खिलाड़ी बिना दबाव के अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकें. पूर्व क्रिकेटरों की सलाह और अनुभव भी टीम के काम आए. 

भारतीय फैन्स भी बने ताकत

टीम इंडिया की सबसे बड़ी ताकत बने भारतीय प्रशंसक. जो हर मैच में, हर पल टीम के साथ खड़े रहे. दुआओं, प्रार्थनाओं और सपोर्ट ने खिलाड़ियों को हमेशा ये महसूस कराया की उनके साथ देश के 140 करोड़ लोग हैं.

दरअसल, टी20 वर्ल्ड कप 2026 की यह जीत भी उसी सामूहिक मेहनत की मिसाल है. खिलाड़ियों ने मैदान पर इतिहास लिखा, लेकिन उस इतिहास की असली पटकथा उन अनदेखे और अनसुने नायकों ने लिखी. जो हमेशा पर्दे के पीछे रहते हैं, लेकिन जिनके बिना कोई भी जीत पूरी नहीं होती.

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