नासा चांद पर 2030 तक बनाएगा न्यूक्लियर रिएक्टर... चीन-रूस से आगे निकलने की प्लानिंग

अमेरिका चांद पर 2030 तक न्यूक्लियर रिएक्टर बनाने की योजना बना रहा है. NASA और ऊर्जा विभाग (DOE) ने मिलकर समझौता किया है. यह रिएक्टर चांद पर लगातार, सुरक्षित और भरपूर बिजली देगा, जो Artemis मिशनों, स्थाई बेस और Mars यात्रा के लिए जरूरी है. सूरज की रोशनी पर निर्भर नहीं रहेगा. यह अमेरिकी स्पेस लीडरशिप को मजबूत करेगा.

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चांद पर इंसानी बस्ती और न्यूक्लियर रिएक्टर का काल्पनिक चित्र. (Photo: Getty) चांद पर इंसानी बस्ती और न्यूक्लियर रिएक्टर का काल्पनिक चित्र. (Photo: Getty)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 14 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:25 PM IST

अमेरिका चंद्रमा पर न्यूक्लियर रिएक्टर बनाने की योजना बना रहा है, जो 2030 तक तैयार हो जाएगा. अमेरिकी ऊर्जा विभाग (DOE) और NASA ने मिलकर इस पर काम शुरू किया है. इसका मकसद चंद्रमा पर भविष्य के मिशनों और स्थाई बेस के लिए लगातार और भरपूर बिजली उपलब्ध कराना है. यह Artemis कार्यक्रम का हिस्सा है और Mars मिशनों के लिए भी मददगार होगा.

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घोषणा और समझौता

13 जनवरी 2026 को NASA और DOE ने एक नया समझौता (Memorandum of Understanding - MOU) साइन किया. यह समझौता दोनों एजेंसियों के बीच पुराने सहयोग को मजबूत करता है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की स्पेस पॉलिसी के तहत यह कदम उठाया गया है, जो अमेरिका को अंतरिक्ष में नेतृत्व बनाए रखने पर जोर देती है.

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NASA के एडमिनिस्ट्रेटर जेरेड इसाकमैन ने कहा कि भविष्य हासिल करने के लिए न्यूक्लियर पावर का इस्तेमाल जरूरी है. यह समझौता NASA और DOE को मिलकर काम करने में मदद करेगा ताकि अंतरिक्ष अन्वेषण का सुनहरा युग शुरू हो.

ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने कहा कि अमेरिकी विज्ञान और इनोवेशन से असंभव लगने वाले काम संभव होते हैं. यह न्यूक्लियर एनर्जी और स्पेस एक्सप्लोरेशन का बड़ा माइलस्टोन होगा.

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न्यूक्लियर रिएक्टर क्यों जरूरी?

चंद्रमा पर सूरज की रोशनी हर समय नहीं मिलती. चांद की एक रात पृथ्वी की 14 दिनों जितनी लंबी होती है. सोलर पैनल रात में काम नहीं करते और धूल या तापमान से प्रभावित होते हैं. इसलिए न्यूक्लियर फिशन रिएक्टर (Fission Surface Power System) की जरूरत है. यह रिएक्टर...

  • सुरक्षित और कुशल बिजली बनाएगा.
  • सालों तक बिना रिफ्यूल के चलेगा.
  • सूरज की रोशनी या तापमान पर निर्भर नहीं होगा.
  • चंद्रमा पर स्थायी बेस, वैज्ञानिक प्रयोग, पानी बर्फ निकालना (in-situ resource utilization) और रोबोटिक मिशनों के लिए लगातार पावर देगा.

यह 40 किलोवाट क्लास का रिएक्टर होगा (कुछ रिपोर्ट्स में 100 kW तक का जिक्र), जो कई बेस या बड़े मिशनों को पावर सप्लाई कर सकता है.

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पुराना सहयोग और इतिहास

NASA और DOE पिछले 50 साल से स्पेस न्यूक्लियर सिस्टम पर साथ काम कर रहे हैं. पहले रेडियोआइसोटोप पावर सोर्स (जैसे Curiosity रोवर में) और प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी पर काम हुआ. अब यह सर्फेस रिएक्टर पर फोकस है.

पहले Kilopower प्रोजेक्ट में छोटे रिएक्टर का टेस्ट सफल रहा था. अब नया MOU इसे तेज करेगा - रिएक्टर को डेवलप, फ्यूल, ऑथराइज और लॉन्च के लिए तैयार करना.

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चांद से मंगल तक का रोडमैप

यह रिएक्टर आर्टेमिस कार्यक्रम के तहत चांद पर सस्टेनेबल मिशन शुरू करेगा. चांद पर बेस बनने से Mars मिशनों के लिए टेक्नोलॉजी टेस्ट होगा. NASA का लक्ष्य Moon-to-Mars आर्किटेक्चर है, जहां चांद एक स्टेपिंग स्टोन बनेगा. रिएक्टर 2030 तक लॉन्च के लिए तैयार होगा. 

यह अमेरिका को चीन और रूस से आगे रखेगा, जो भी चांद पर न्यूक्लियर पावर प्लांट की योजना बना रहे हैं. यह प्रोजेक्ट अमेरिकी स्पेस लीडरशिप, सिक्योरिटी और स्पेस इकोनॉमी को मजबूत करेगा. NASA और DOE इंडस्ट्री के साथ मिलकर काम करेंगे ताकि यह सपना हकीकत बने.

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