मनुष्य ब्रह्मांड की सिर्फ 5 प्रतिशत चीजों को ही देख, सुन या महसूस कर पाता है. बाकी 95 प्रतिशत वास्तविकता हमारे लिए पूरी तरह अदृश्य है. हम रोजमर्रा की जिंदगी में चलते-फिरते हैं, लेकिन हमारी आंखें और कान सिर्फ एक बहुत छोटी खिड़की से बाहर का नजारा देख पाते हैं. बाकी सब कुछ हमारे इंद्रियों से समझ के बाहर है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारी बायोलॉजिकल सेंसिटिविट बहुत सीमित है. हम जो वास्तविकता समझते हैं, वह दरअसल ब्रह्मांड का सिर्फ एक छोटा-सा टुकड़ा है. यानी जो भी हम देख-सुन या महसूस कर करने हैं, वो पूरे यूनिवर्स को बहुत छोटा हिस्सा है. बाकी सब अदृश्य शक्तियां, तरंगें और कण हमारे चारों तरफ घूम रहे हैं, लेकिन हम उन्हें बिल्कुल नहीं जान पाते.
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हमारी आंखें और कान कितने सीमित हैं
हमारी आंखें केवल 380 से 700 नैनोमीटर तक की प्रकाश तरंगों को ही देख पाती हैं. इसे ही हम दिखने वाली रोशनी कहते हैं. इससे कम फ्रिक्वेंसी वाली अल्ट्रावायलेट किरणें और इससे ज्यादा वाली इंफ्रारेड हमारी आंखों को दिखाई नहीं देतीं. नासा के मुताबिक मानव आंख 380-700 नैनोमीटर के बीच की रोशनी ही देख सकती है.
इसी तरह हमारे कान केवल 20 हर्ट्ज से 20,000 हर्ट्ज (20 kHz) तक के साउंड वेव्स को सुन पाते हैं. इससे कम या ज्यादा फ्रीक्वेंसी वाली आवाजें हम बिल्कुल नहीं सुन पाते. न्यूरोसाइंस के अनुसार (NCBI Bookshelf), यह सीमा इंसानी कान की संरचना के कारण है. अल्ट्रासोनिक वेव्स, रेडियो वेव्स, माइक्रोवेव और एक्स-रे जैसी चीजें हमारे चारों तरफ मौजूद हैं, लेकिन हम उन्हें महसूस नहीं कर पाते.
हमारे चारों तरफ दिखाई ने देने वाली दुनिया
हमारे आस-पास ऐसी दुनिया है जो हमारे सेंसेस से पूरी तरह छिपी हुई है. जैसे- हर सेकेंड हमारे शरीर से अरबों न्यूट्रिनो कण गुजरते हैं. CERN के वैज्ञानिकों के अनुसार, सूर्य से निकलने वाले लगभग 60 अरब न्यूट्रिनो प्रति वर्ग सेंटीमीटर प्रति सेकंड हमारे शरीर से गुजरते हैं
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ये कण इतने हल्के और बिना चार्ज वाले होते हैं कि वे पृथ्वी, इंसान या किसी भी चीज से टकराए बिना निकल जाते हैं. हम इन्हें महसूस नहीं कर पाते, लेकिन ये ब्रह्मांड की बहुत बड़ी सच्चाई हैं. इसी तरह रेडियो तरंगें, इंफ्रारेड किरणें, अल्ट्रावायलेट किरणें और अन्य इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें हर समय हमारे आसपास हैं, लेकिन हमारी आंखें और कान उन्हें नहीं पकड़ पाते.
आधुनिक टेक्नोलॉजी जैसे इंफ्रारेड सेंसर या रेडियो टेलीस्कोप इन अदृश्य चीजों को हमें दिखाते हैं, लेकिन हमारी प्राकृतिक इंद्रियां इनसे पूरी तरह अनजान रहती हैं.
ब्रह्मांड का 95 प्रतिशत अंधेरा
ब्रह्मांड की सबसे बड़ी रहस्यमयी बात यह है कि उसका 95 प्रतिशत हिस्सा डार्क मैटर और डार्क एनर्जी से बना है. नासा और प्लैंक सैटेलाइट मिशन के अनुसार ब्रह्मांड में सिर्फ 4.9 प्रतिशत सामान्य पदार्थ (ऑर्डिनरी मैटर) है, 26.8 प्रतिशत डार्क मैटर और 68.3 प्रतिशत डार्क एनर्जी.
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डार्क मैटर गुरुत्वाकर्षण का असर तो दिखाता है, लेकिन ये रोशनी या किसी भी फ्रिक्वेंसी को सोखता या निकालता नहीं है. इसलिए पता नहीं चलता. डार्क एनर्जी ब्रह्मांड को फैलाती है, लेकिन हम इसे सीधे नहीं देख सकते. प्लैंक मिशन (2018-2023 डेटा) ने यह आंकड़े सबसे सटीक तरीके से दिए हैं. मतलब हम जो तारे, ग्रह, गैलेक्सी देखते हैं, वह ब्रह्मांड का सिर्फ 5 प्रतिशत है. बाकी 95 प्रतिशत पूरी तरह अदृश्य है.
विज्ञान ने इन अदृश्य चीजों को कैसे समझा
वैज्ञानिकों ने टेलीस्कोप, पार्टिकल डिटेक्टर और स्पेस मिशन की मदद से इन अदृश्य चीजों को समझा है. जैसे- CERN के लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर और न्यूट्रिनो डिटेक्टरों ने न्यूट्रिनो कणों की पुष्टि की. नासा के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप और प्लैंक सैटेलाइट ने डार्क एनर्जी और डार्क मैटर के सबूत दिए.
फिर भी हम इन चीजों को सीधे अपनी इंद्रियों से नहीं महसूस कर पाते. हमारी जैविक संवेदनशीलता विकास के दौरान सिर्फ उन चीजों के लिए बनी है जो हमारे जीवित रहने के लिए जरूरी हैं. बाकी सब हमारे लिए अनदेखा है.
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यह सच्चाई हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हम जो वास्तविकता कहते हैं, वह ब्रह्मांड का सिर्फ एक छोटा-सा हिस्सा है. बाकी सब अदृश्य शक्तियां, तरंगें और कण हमारे चारों तरफ हैं. वैज्ञानिक कहते हैं कि भविष्य में नई टेक्नोलॉजी हमें और ज्यादा अदृश्य चीजों को महसूस करने में मदद करेगी, लेकिन फिलहाल हम ब्रह्मांड की सिर्फ 5 प्रतिशत सच्चाई को ही जान पाते हैं.
आजतक साइंस डेस्क