20वीं सदी की शुरुआत में सोवियत संघ के एक प्रसिद्ध जीव वैज्ञानिक इलिया इवानोव (Ilya Ivanov) ने एक बहुत विवादास्पद और असामान्य प्रयोग शुरू किया. उनका सपना था कि इंसान और चिम्पैंजी (chimpanzee) को मिलाकर एक नया हाइब्रिड जीव पैदा किया जाए, जिसे ह्यूमनजी (Humanzee) भी कहा जाता है.
इवानोव का मानना था कि जानवरों के बीच हाइब्रिड बनाने में उनकी सफलता के बाद इंसान और एप (ape) के बीच भी यह संभव है. उन्होंने घोड़ों, ज़ेब्रा और गधों, गायों और बाइसन के बीच क्रॉसब्रीडिंग करके अच्छे नतीजे दिखाए थे, जिससे उन्हें बोल्शेविक सरकार का समर्थन मिला.
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इवानोव 1910 में ही दुनिया के वैज्ञानिकों के सामने यह दावा कर चुके थे कि भविष्य में इंसान-एप हाइब्रिड बनाया जा सकता है. सोवियत सरकार को यह विचार पसंद आया क्योंकि इससे इवोल्यूशन की थ्योरी को मजबूत सबूत मिल सकता था. धर्म को चुनौती दी जा सकती थी. सरकार ने उन्हें पैसे और सहयोग दिया. 1925 में इवानोव अफ्रीका के फ्रेंच गिनी गए, जहां उन्होंने जंगलों से चिम्पैंजी पकड़ने की कोशिश की.
वहां उन्होंने एक मादा चिम्पैंजी में इंसान का अंडाशय (ovary) प्रत्यारोपित करने की कोशिश की. बाद में उन्होंने उस चिम्पैंजी को इंसान के स्पर्म से गर्भाधान कराने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली. फिर उन्होंने उल्टा रास्ता अपनाया.
अफ्रीका से सोवियत संघ तक के प्रयोग
इवानोव ने अफ्रीका से चिम्पैंजी सोवियत संघ लाए. 1926-1927 के आसपास उन्होंने गिनी में तीन मादा चिंपैंजियों को इंसान के स्पर्म से कृत्रिम गर्भाधान करने की कोशिश की, लेकिन कोई भी गर्भवती नहीं हुई.
वापस सोवियत संघ लौटकर उन्होंने अबखाजिया में एक प्राइमेट नर्सरी बनाई. यहां उन्होंने कुछ सोवियत महिलाओं को चिम्पैंजी के स्पर्म से गर्भाधान कराने की कोशिश की. लेकिन कोई भी महिला गर्भवती नहीं हुई.
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इंसान और चिम्पैंजी के बीच हाइब्रिड बनाना असंभव था. इंसानों में 46 क्रोमोसोम होते हैं, जबकि चिंपैंजियों में 48. इन दोनों की जनन कोशिकाएं एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं. इसी वजह से गर्भ ठहर ही नहीं पाता था. इवानोव की सारी कोशिशें इसी बायोलॉजिकल डिफरेंस के कारण नाकाम हो गईं.
नैतिक और राजनीतिक विवाद
इवानोव के प्रयोग बहुत विवादास्पद थे. उन्होंने स्थानीय अफ्रीकी महिलाओं को बिना उनकी सहमति के प्रयोग में शामिल करने के बारे में भी सोचा था, लेकिन क्रेमलिन ने ऐसा करने से मना कर दिया. पश्चिमी मीडिया में इस प्रयोग की खबरें आने पर सनसनी फैल गई. कुछ लोग इसे विकासवाद साबित करने का मौका मानते थे, तो कुछ इसे अनैतिक और पाप मानते थे.
सोवियत सरकार शुरू में समर्थन दे रही थी, लेकिन जब कोई सफलता नहीं मिली और नैतिक सवाल उठने लगे, तो इवानोव पर दबाव बढ़ा. 1930 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. कजाकिस्तान भेज दिया गया. 1932 में उनकी मौत हो गई.
प्रयोग का असली मकसद क्या था?
कुछ इतिहासकारों का कहना है कि इवानोव विज्ञान के लिए नहीं, बल्कि सोवियत एथीइज्म को मजबूत करने के लिए प्रयोग कर रहे थे. उनका उद्देश्य था कि इंसान बंदर से बना है, यह साबित करके धर्म को कमजोर किया जाए.
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कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा जाता है कि वे मजबूत लेकिन आज्ञाकारी 'नए इंसान' बनाने की कल्पना कर रहे थे, जो कम्युनिस्ट व्यवस्था के लिए काम कर सकें. यह प्रयोग पूरी तरह असफल रहा. कभी दोहराया नहीं गया.
इलिया इवानोव की कहानी विज्ञान की महत्वाकांक्षा और नैतिक सीमाओं का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है. उन्होंने जानवरों के बीच सफल हाइब्रिड बनाने के बाद सोचा कि इंसान और चिम्पैंजी को भी मिलाया जा सकता है, लेकिन प्रकृति की बुनियादी नियमों को नहीं बदल पाए.
आज हम जानते हैं कि इंसान और वानर लाखों साल पहले एक आम पूर्वज से निकले थे, लेकिन अब वे इतने अलग हो चुके हैं कि उनके बीच संतान पैदा नहीं हो सकती. इवानोव की कहानी हमें याद दिलाती है कि कुछ प्रयोग, चाहे कितने भी साहसिक हों, विज्ञान काल्पनिक कहानियों तक ही रहने चाहिए.
ऋचीक मिश्रा