मौसम विज्ञान में एक बड़ा बदलाव आने वाला है. पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) के सचिव डॉ. एम. रविचंद्रन ने AI इम्पैक्ट समिट 2026 में कहा कि पारंपरिक भौतिकी आधारित मॉडलों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के साथ मिलाकर ही जलवायु की बढ़ती अनिश्चितताओं से निपटा जा सकता है.
नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित AI इम्पैक्ट समिट 2026 में 'जलवायु extremes को संभालने और टिकाऊ सिस्टम बनाने के लिए AI का उपयोग' टॉपिक पर एक पैनल डिस्कशन के दौरान उन्होंने बताया कि पुराने मॉडल बड़े इलाकों के मौसम की भविष्यवाणी में माहिर हैं, लेकिन आज के मौसम में छोटे-छोटे स्थानीय बदलाव और समय के साथ होने वाले उतार-चढ़ाव को समझने के लिए AI जरूरी है.
हाथी और चींटी की दिलचस्प मिसाल पेश की
डॉ. रविचंद्रन ने वैज्ञानिकों के सामने आने वाली चुनौती को एक मजेदार उदाहरण से समझाया. उन्होंने कहा, "पहले हमें सिर्फ 'हाथी' को ट्रैक करना पड़ता था, यानी बड़े पैमाने के मौसम सिस्टम. लेकिन अब जलवायु परिवर्तन की वजह से हमें उस हाथी पर बैठी 'चींटी' को भी देखना है. हमें बड़े स्थान की गति और छोटे-छोटे स्थानीय समय के बदलाव दोनों को समझना होगा.
उनका मतलब था कि भौतिकी के मॉडल बड़े स्तर पर अच्छा काम करते हैं, लेकिन AI छोटे स्तर पर, समय के साथ होने वाले बदलावों को बेहतर तरीके से पकड़ लेता है. खासकर बादल फटने (cloudburst) जैसी घटनाओं की भविष्यवाणी अभी बहुत मुश्किल है. दोनों को मिलाकर ही सटीक पूर्वानुमान संभव होगा. इसके लिए कई पहलुओं पर काम करना होगा.
मॉडल में कमियां कम करें
उन्होंने कहा कि पुराने मॉडल में कई धारणाएं होती हैं, जिनसे गलतियां बढ़ती हैं. AI इन गलतियों को कम कर सकता है और शुरुआती हालात को बेहतर बना सकता है.
150 साल पुराना डेटा खोलें
भारत मौसम विभाग (IMD) के पास 150 साल का बहुत बड़ा डेटा है।.डॉ. रविचंद्रन ने कहा कि इसे युवा शोधकर्ताओं और अलग-अलग क्षेत्र के विशेषज्ञों के लिए खोल देना चाहिए.
छोटे स्तर पर पूर्वानुमान
AI की मदद से बड़े मॉडल को 1 किलोमीटर तक छोटा करके स्थानीय स्तर पर सटीक मौसम बता सकते हैं. यह लोगों की सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा बदलाव होगा.
उन्होंने कहा कि AI पर भरोसा तभी बनेगा जब उसकी जांच-पड़ताल अच्छे से हो. सार्वजनिक सुरक्षा के लिए AI के नतीजों को सही साबित करना बहुत जरूरी है. इसके लिए सभी क्षेत्रों को साथ मिलकर काम करना होगा.
डॉ. रविचंद्रन ने कहा कि अब सिर्फ एक विभाग या एक तरीके से सोचना बंद करना होगा. हमें जीव विज्ञान के विशेषज्ञ, डेटा साइंटिस्ट और कई क्षेत्रों के शोधकर्ताओं को साथ लाना होगा. अलग-अलग नजरिए से डेटा देखने से ही जलवायु के प्रति मजबूत भारत बन सकता है.
बता दें कि यह पैनल डिस्कशन इंडियन AI रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (IAIRO), अत्रिया यूनिवर्सिटी, C-DAC, IITM/MoES और लोकनीति ने आयोजित की थी इसमें डॉ. रविचंद्रन के अलावा इंजी. मनीष भारद्वाज (राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सचिव), डॉ. शिवकुमार कल्याणरमण (अनुसंधान राष्ट्रीय फाउंडेशन के CEO), प्रो. अमित शेठ (IAIRO के संस्थापक निदेशक और यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैरोलिना के प्रोफेसर, डॉ. प्रफुल चंद्रा (अत्रिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और डीन रिसर्च), डॉ. कार्तिक काशीनाथ (NVIDIA, अमेरिका के डिस्टिंग्विश्ड साइंटिस्ट), प्रो. देव नियोगी (यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास एट ऑस्टिन के प्रोफेसर), संदीप सिंघल (अवाना कैपिटल के सीनियर एडवाइजर) और डॉ. अक्षरा कागिनलकर (अत्रिया यूनिवर्सिटी में क्लाइमेट चेंज सेंटर की प्रोफेसर) शामिल थे.
आजतक साइंस डेस्क