Hindu Dharam: रात का सन्नाटा और श्मशान की बुझती चिताओं के बीच जलती अग्नि, चारों ओर उड़ती राख, उसी राख के बीच खड़ी एक भयावह देवी जिनके खुले बिखरे बाल, गले में खोपड़ियों की माला, हाथ में खप्पर और आंखों में ऐसा क्रोध जिसे देखकर देवता भी कांप उठें. ये हैं विनाश और मृत्यु की देवी माता चामुंडा. लेकिन सवाल उठता है कि आखिर कौन हैं मां चामुंडा? उन्होंने अवतार क्यों लिया? और क्यों आज भी उनकी पूजा भक्ति से ज्यादा भय के कारण की जाती है?
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, एक समय ऐसा आया जब पृथ्वी पर अधर्म और दानवों का आतंक अपने चरम पर था. चंड और मुंड नाम के दो भयानक असुरों ने देवताओं को हराकर तीनों लोकों में उत्पात मचा रखा था. उनकी शक्ति इतनी प्रबल थी कि देवताओं के अस्त्र भी उन पर बेअसर हो गए थे. तब देवताओं की प्रार्थना पर मां दुर्गा युद्ध के मैदान में उतरीं. युद्ध के दौरान उनका क्रोध इतना बढ़ गया कि उनके मस्तक से एक भयंकर ज्वाला प्रकट हुई. उसी ज्वाला से एक उग्र देवी प्रकट हुईं, जिनकी काली त्वचा, बिखरे बाल, कंकाल जैसा शरीर, उभरी हुई नसें और आंखों में अग्नि की ज्वाला. यही थीं चौसठ योगिनियों में से एक मां चामुंडा.
कौन हैं मां चामुंडा?
मां चामुंडा का अवतार केवल एक उद्देश्य के लिए हुआ था, अधर्म का संपूर्ण विनाश. युद्धभूमि में वे वायु से भी तेज गति से लड़ीं थीं. उनके एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे में खड्ग, तीसरे में खप्पर और चौथे में रक्त से भरा पात्र था. कुछ ही क्षणों में उन्होंने चंड और मुंड का वध कर उनके सिर अलग कर दिए थे. जब वे दोनों असुरों के सिर लेकर मां दुर्गा के पास पहुंचीं, तब देवी ने उन्हें वरदान दिया कि, 'आज से तुम चामुंडा कहलाओगी और संसार तुम्हें विनाश की शक्ति के रूप में जानेगा.'
क्या है मां चामुंडा का तंत्र विद्या से संबंध
पुराणों के मुताबिक, मां चामुंडा का संबंध तंत्र विद्या से भी है. उन्हें श्मशान में रहने वाली देवी माना जाता है. तांत्रिक परंपराओं में श्मशान वह स्थान है जहां जीवन और मृत्यु का अंतिम सत्य सामने आता है. जहां न कोई अहंकार होता है, न कोई पहचान, सिर्फ आत्मा और ब्रह्मांड का संबंध होता है. मां चामुंडा उसी अंतिम सत्य का प्रतीक हैं कि जो जन्मा है उसका अंत निश्चित है. यही कारण है कि उनकी पूजा में खोपड़ियां, राख और अग्नि जैसे प्रतीकों का विशेष महत्व होता है.
मान्यता है कि बड़े-बड़े सिद्ध पुरुष नकारात्मक शक्तियों, काले जादू और तांत्रिक बाधाओं को दूर करने के लिए मां चामुंडा की साधना करते हैं. यहां तक कि ब्रह्मराक्षस जैसी शक्तियों को भी मां चामुंडा के सामने कमजोर माना जाता है.
आज भी भारत के कई शक्तिपीठों और तांत्रिक स्थलों पर मां चामुंडा की गुप्त साधनाएं की जाती हैं. नवरात्र के दौरान उनकी विशेष पूजा होती है. कई साधकों का मानना है कि उनकी कृपा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं. हालांकि, उनकी पूजा में एक विशेष बात है कि लोग उन्हें प्रेम से कम और भय के कारण ज्यादा याद करते हैं, क्योंकि उनकी साधना आसान नहीं है. यह केवल शुद्ध मन, दृढ़ संकल्प और गुरु के मार्गदर्शन में ही संभव मानी जाती है.
शक्तिपीठ है चामुंडा देवी मंदिर
यदि हम प्रमुख मंदिरों की बात करें, तो हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित चामुंडा देवी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है. मान्यता है कि यहां माता सती के चरण गिरे थे. इसे चामुंडा नंदीकेश्वर धाम भी कहा जाता है, जहां मां चामुंडा के साथ भगवान शिव भी विराजमान हैं. वहीं, राजस्थान के जोधपुर स्थित मेहरानगढ़ किले में भी मां चामुंडा का प्राचीन मंदिर है. कहा जाता है कि 1460 में राव जोधा ने अपनी कुलदेवी की मूर्ति यहां स्थापित की थी और तब से मां चामुंडा को जोधपुर की रक्षक देवी माना जाता है.
मध्य प्रदेश के देवास में माता टेकरी पर भी उनका शक्तिशाली धाम है, जहां हर साल देवी की प्रतिमा के स्वरूप में बदलाव देखने को मिलता है. जहां वैज्ञानिक इसे प्राकृतिक कारण बताते हैं, वहीं श्रद्धालु इसे चमत्कार मानते हैं. गुजरात के चोटीला में भी मां चामुंडा का प्रसिद्ध मंदिर है, जहां भक्त सैकड़ों सीढ़ियां चढ़कर करीब 1200 फीट ऊंचाई पर पहुंचते हैं. मान्यता है कि यहीं देवी ने चंड और मुंड का संहार किया था.
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