20 फरवरी 2026 को भारत मंडपम में इंडिया AI इम्पैक्ट समिट चल रहा था. यह बड़ा इंटरनेशनल इवेंट था. AI पर चर्चा, विदेशी मेहमान, निवेश की बातें. लेकिन अचानक यूथ कांग्रेस के 10-12 कार्यकर्ता अंदर घुसे. उन्होंने शर्ट उतार दी, बनियान में रहकर नारे लगाने लगे. टी-शर्ट्स पर मोदी और ट्रंप की फोटो, इंडिया-यूएस ट्रेड डील के खिलाफ स्लोगन्स. वे हॉल में घूमे, डेलीगेट्स को दिखाया. सिक्योरिटी ने उन्हें खदेड़ा. दिल्ली पुलिस ने एफआईआर दर्ज की. धाराएं लगीं - आपराधिक साजिश, पब्लिक सर्वेंट पर हमला, अवैध जमावड़ा. पहले दिन 4 गिरफ्तारियां हुईं - कृष्णा हरि (नेशनल सेक्रेटरी), कुंदन यादव (बिहार यूथ कांग्रेस सेक्रेटरी), अजय कुमार (यूपी वाइस प्रेसिडेंट), नरसिम्हा यादव (नेशनल कोऑर्डिनेटर). बाद में ग्वालियर से जितेंद्र यादव को भी पकड़ा, कुल 5 गिरफ्तार. यूथ कांग्रेस के नेशनल प्रेसिडेंट उदय भानु चिब को भी कोर्ट ने 4 को 5 दिन की पुलिस कस्टडी में भेज दिया गया है. उनकी बेल रिजेक्ट कर दी गई है. वजह? कोर्ट ने कहा, यह भारत की इंटरनेशनल इमेज को नुकसान पहुंचाता है, ग्लोबल इवेंट को बाधित करता है.
लेकिन असली मुद्दा तो रह गया...
पुलिस और कोर्ट ने मुकदमा प्रोटेस्ट के लिए चलाया - हंगामा, साजिश, इमेज डैमेज. लेकिन किसी ने बेगुनाह बनियान की इमेज के बारे में क्यों नहीं सोचा? बनियान, जो घर में पुरुषों के आराम की साथी है, उसे प्रोटेस्ट का हथियार बनाना - यह उसकी इमेज के साथ खिलवाड़ है. विज्ञापनों में 'ये अंदर की बात है' कहकर बनियान को निजी रखा जाता था, लेकिन यहां इसे बाहर लाकर, सेमी-न्यूड का टैग लगवा दिया. 'फिट है बॉस' - लेकिन अब जेल में फिट? कार्यकर्ताओं ने बनियान को घरेलू सम्मान से निकालकर राजनीतिक स्टंट में बदल दिया. अगर मुकदमा बनियान की बेकद्री पर होता, तो शायद ब्रांड्स और कल्चरल एक्सपर्ट्स गवाह बनते. क्योंकि बनियान भारतीय पुरुषों की पहचान है - बॉलीवुड के कई हीरो इसे महिमामंडित कर चुके हैं. क्या शाहरुख खान, अक्षय कुमार, रनवीर सिंह और क्या वरुण धवन. लेकिन इस प्रोटेस्ट से सब धरा रह गया. पुलिस ने सेमी-न्यूड कहा, लेकिन बनियान तो कपड़ा है. मुकदमा अगर इस पर होता, तो बहस होती कि क्या बनियान को ऐसे अपमानित करना गलत है? शायद इससे बनियान की इमेज बच जाती, और प्रोटेस्ट के नए तरीके खोजे जाते.
मीडिया में 'शर्टलेस प्रोटेस्ट', 'टॉपलेस', 'सेमी-न्यूड' जैसे शब्द आए. पॉलिटिकल रिएक्शन तीखे. पीएम मोदी ने कहा, कांग्रेस ने ग्लोबल इवेंट को 'नेकेड, डर्टी पॉलिटिक्स' का मैदान बना दिया. बीजेपी ने इसे देश की इज्जत पर हमला कहा. यहां तक कि कांग्रेस के सहयोगी भी नाराज दिखे. अखिलेश यादव ने कहा, यह अनुचित है. मायावती ने कंडेम किया. हर बार वही लाइनें दोहराई गईं - इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म पर सेमी-न्यूड प्रोटेस्ट देश की इमेज खराब करता है. कांग्रेस ने डिफेंड किया कि यह लोकतंत्र में विरोध का तरीका है. लेकिन बनियान का एंगल कोई नहीं देखा. प्रदर्शनकारियों की जमानत तो हो ही जाएगी, लेकिन बनियान की 'जमानत' कौन कराएगा? ब्रांड्स बेचारे खामोश हैं, क्योंकि प्रोटेस्ट को 'स्टाइल का मामला' नहीं कह सकते हैं.
बनियान की कश्मकश
दिल्ली के प्रोटेस्ट से बनियान की जीवन में जो कश्मकश आई है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ. बनियान के अतीत में झांकें तो पता चलता है कि कभी यह ताकत और सुरक्षा का सिंबल थी. योद्धा और राजाओं इसे पहनते थे. ब्रिटिश काल में यह वेस्ट कोट के रूप में भारत आया, लेकिन हमने इसे सरल और आरामदायक बना लिया. कपास की हल्का बंडी, जिसमें जेबें भी होतीं. कुर्ते या शर्ट के नीचे बंडी पहनी जाती थी. और इसे से बनियान का विकास हुआ. स्लीव और स्लीवलेस दोनों तरह कीं. और अब तो इसमें स्टाइल और कई रंग भी जुड़ गए हैं. जिम वेस्ट भी बाजार में बिक रही हैं.
विज्ञापनों ने बनियान की इमेज और चमकाई ही है. याद कीजिए वो पुराने ऐड्स - 'बड़े आराम से', जहां आदमी बनियान में सोफे पर लेटा रहता है, परिवार खुश. या 'ये आराम का मामला है', 'ये स्टाइल का मामला है', 'ये अंदर की बात है', 'अपना लक पहन के चलो', 'फिट है बॉस'. ये लाइनें बनियान को कम्फर्ट, मर्दाना फिटनेस और घरेलू स्टाइल से जोड़ती थीं. फिल्मों में अमिताभ बच्चन जैसे हीरो बनियान में एक्शन करते दिखते, तो यह ताकत का प्रतीक बन जाता. कुल मिलाकर, बनियान भारतीय पुरुषों का 'घरेलू राष्ट्रीय परिधान' था - सम्मानजनक, आरामदायक और प्राइवेट.
लेकिन, दिल्ली की घटना दिखाती है कि कैसे एक साधारण प्रोटेस्ट साइड इफेक्ट छोड़ सकता है. प्रदर्शनकारी थोड़ा एहतियात बरत लेते तो बेचारी बनियान सेमी-न्यूड पहनावे के टैग से बच जाती. अब कौन कहेगा 'अपना लक पहन के चलो'?
धीरेंद्र राय