न गाजा, न लेबनान... ईरान में लोगों का इस्लामी कट्टरपंथ से क्यों मोहभंग हो गया?

ईरान को इस्लामी रिपब्लिक और कट्टरपंथ रास नहीं आया. आर्थिक तबाही, महिलाओं का दमन, भ्रष्टाचार आदि ने लोगों को सड़कों पर उतरने को मजबूर कर दिया है. ईरानी लोग सड़कों पर उतरकर 'तानाशाह मुर्दाबाद... इस्‍लामिक रिपब्लिक मुर्दाबाद... ना गाजा ना लेबनान के लिए, मेरी जिंदगी ईरान के लिए...' जैसे नारे लगा रहे हैं.

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इस्लामिक रिपब्लिक मुर्दाबाद लिखी तख्तियां लेकर ईरान के करीब 100 शहरों में प्रदर्शन हो रहे हैं. इस्लामिक रिपब्लिक मुर्दाबाद लिखी तख्तियां लेकर ईरान के करीब 100 शहरों में प्रदर्शन हो रहे हैं.

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 09 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 6:01 PM IST

ईरान की जनता का इस्लामी कट्टरपंथ से मोहभंग गहरा चुका है. दिसंबर 2025 से शुरू हुए नए विरोध प्रदर्शनों ने इसे साफ कर दिया है. ये प्रदर्शन अब 100 से अधिक शहरों में फैल चुके हैं, जहां लोग सड़कों पर उतरकर 'तानाशाह मुर्दाबाद... इस्‍लामिक रिपब्लिक मुर्दाबाद... ना गाजा ना लेबनान के लिए, मेरी जिंदगी ईरान के लिए...' और वुमन, लाइफ, फ्रीडम जैसे नारे लगा रहे हैं. यह मोहभंग 2022 की महसा अमीनी की मौत से शुरू हुआ वुमन, लाइफ, फ्रीडम आंदोलन का विस्तार ही है, लेकिन अब ज्यादा तीव्र और व्यवस्था-विरोधी हो गया है.लोग कह रहे हैं कि हम ईरानी हैं, इस्लामी रिपब्लिक नहीं. अर्थात राष्ट्रीय पहचान को धार्मिक शासन से अलग कर रहे हैं. आर्थिक संकट (मुद्रास्फीति 52%, रियाल का पतन), भ्रष्टाचार, महिलाओं पर दमन, विदेशी नीतियों का बोझ और युवाओं का विद्रोह मुख्य कारण हैं.

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प्रदर्शनकारियों में व्यापारी, छात्र और युवा आगे हैं, जो हड़तालें कर रहे हैं और सुरक्षा बलों से टकरा रहे हैं. सरकार ने इंटरनेट पर रोक लगा दी और आंदोलन को रोकने के लिए दमन  का रास्ता चुना है. लेकिन जनता की नाराजगी दब नहीं रही. यह सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि पूरे इस्लामी गणराज्य को खारिज करने का आंदोलन बन चुका है. लोग अब सुधार नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन चाहते हैं.

1979 की इस्लामी क्रांति ने वादा किया था कि शाह की तानाशाही के बाद एक न्यायपूर्ण, धार्मिक और समृद्ध समाज बनेगा, लेकिन 46 साल बाद अधिकांश ईरानी इसे दमनकारी, भ्रष्ट और असफल मानते हैं. लोग अपने देश को अफगानिस्तान बनते नहीं देखना चाहते हैं. युवा उन देशों को देख रहे हैं जिन मुस्लिम देशों में कट्टरपंथ हावी नहीं है वहां किस तरह से तरक्की हो रही है.

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1-आतंकी संगठनों के आर्थिक मदद से चीजें खराब हुईं

हिजबुल्लाह (लेबनान), हमास (गाजा), हौथी (यमन) और अन्य मिलिशिया को ईरान सरकार से मिलने वाली मदद ने जनता के बीच असंतोष को पैदा किया. अमेरिकी अनुमानों के अनुसार, ईरान हिजबुल्लाह को सालाना 700 मिलियन डॉलर और हमास तथा अन्य फिलिस्तीनी समूहों को 100 मिलियन डॉलर देता है. कुल मिलाकर इस तरह के  गुटों पर ईरान सरकार अरबों डॉलर खर्च कर रहा है. जो ईरान की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डालते हैं.2025 में इजराइल-ईरान युद्ध (12-दिन का संघर्ष, जून 2025) ने स्थिति और बदतर कर दी. इस युद्ध में ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हमले हुए, जिससे अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा. युद्ध के बाद कई तरह के सैंक्शंस लगे, रियाल का मूल्य रिकॉर्ड निचले स्तर (1.5 मिलियन प्रति डॉलर) पर गिरा, मुद्रास्फीति 52% पहुंची, और बिजली-पानी की किल्लत बढ़ी. जनता पूछती है कि हमारी गरीबी, बिजली कटौती, पानी की कमी सब इस जंग के लिए क्यों ? प्रदर्शनों में नारा गूंजता है  कि नीदर गाजा नॉर लेबनान, माय लाइफ फॉर ईरान.इन स्लोगक का संदेश स्पष्ट है. यह स्लोगन विदेशी नीतियों को घरेलू संकट से जोड़ता है, और सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता है. लोग मानते हैं कि ये खर्च घरेलू विकास पर लगने चाहिए. 

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2. युवा पीढ़ी का विद्रोह और सेकुलराइजेशन

ईरान की नई पीढ़ी (Gen Z और मिलेनियल्स), जो 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद पैदा हुई, वर्तमान व्यवस्था के प्रति सबसे ज्यादा विद्रोही है. उन्हें क्रांति की बातें नहीं याद हैं. उनके लिए इस्लामी रिपब्लिक सिर्फ दमन, गरीबी और स्वतंत्रता की कमी का प्रतीक है. सोशल मीडिया (Instagram, Telegram, X) के जरिए वे पूरी दुनिया में हो रहे विकास को देख रहे हैं. स्वतंत्रता, आधुनिक जीवनशैली, और लोकतंत्र के  प्रति उनमें आकर्षण है. इससे इस्लामी कट्टरपंथ उन्हें पुराना, दमनकारी और अप्रासंगिक लगता है.GAMAAN (नीदरलैंड्स-बेस्ड इंडिपेंडेंट रिसर्च ग्रुप) के सर्वे इस मोहभंग को स्पष्ट दिखाते हैं. 2024 के एक सर्वे में लगभग 70% ईरानी इस्लामी रिपब्लिक के खिलाफ हैं. केवल 20% इसका समर्थन करते हैं. 89% लोकतंत्र चाहते हैं.66% किसी भी तरह के धार्मिक शासन के खिलाफ है. सबसे ज्यादा विरोध सबसे ज्यादा युवा, शहरी और शिक्षित लोगों में है .यूनिवर्सिटी ग्रेजुएट्स में 74% रिपब्लिक को रिजेक्ट करते हैं. युवा पीढ़ी में सेकुलर रिपब्लिक (26%) या अन्य गैर-धार्मिक सिस्टम सबसे पॉपुलर है. वे मानवाधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राष्ट्रवाद को प्राथमिकता देते हैं, न कि धार्मिक मूल्यों को.

3- महसा अमीनी की मौत और महिलाओं पर दमन 

2022 में 22 वर्षीय कुर्द लड़की महसा अमीनी (जिना अमीनी) की मौत ने लोगों के अंदर कट्टरपंथी इस्लाम के खिलाफ क्रांति का बीज रोपित कर दिया. नैतिक पुलिस (Guidance Patrol) ने उन्हें गलत हिजाब के लिए गिरफ्तार किया, जिसकी हिरासत में मौत हो गई. यह घटना अनिवार्य हिजाब और महिलाओं पर पूरे सिस्टम के नियंत्रण का प्रतीक बन गया.2022-2023 के महिला- जीवन- स्वतंत्रता आंदोलन में लाखों महिलाओं ने हिजाब उतारे, बाल काटे और सड़कों पर विरोध किया. 2025-2026 के विरोधों में भी यह जारी है.

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 सर्वे (GAMAAN 2022-2025) दिखाते हैं कि 70-80% ईरानी (खासकर युवा और शिक्षित) अनिवार्य हिजाब के खिलाफ हैं, और 67-84% धर्मनिरपेक्ष (secular) राज्य चाहते हैं.महिलाएं कहती हैं कि यह सिर्फ कपड़े का मुद्दा नहीं, बल्कि महिलाओं को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने का है. तलाक, विरासत, संरक्षण में भेदभाव ने महिलाओं के साथ अत्याचार को बढ़ा दिया है. युवा पीढ़ी (Gen Z) ने 2022 के बाद सीखा कि इस्लामी कट्टरपंथ महिलाओं की आजादी को कुचलता है.

4- आर्थिक तबाही और आम आदमी की बदहाली

इस्लामी रिपब्लिक ने अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया. 1979 में रियाल स्थिर था, आज 1.4 मिलियन रियाल प्रति डॉलर है. मुद्रास्फीति 52% से अधिक, बुनियादी सामान की कीमतें दोगुनी हो चुकी हैं. बेरोजगारी युवाओं में 20 से 30% तक पहुंच चुकी है. 2025-2026 का विरोध व्यापारियों की दुकान बंदी से शुरू हुए. लोग कहते हैं कि IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर) और शीर्ष नेताओं से जुड़े लोग अमीर हो रहे हैं, जबकि आम ईरानी गरीब. 

भ्रष्टाचार इतना गहरा है कि IRGC अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से (तेल, बैंकिंग, निर्माण) को नियंत्रित करता है.लोग पूछते हैं कि हमारी कुर्बानी विदेशी जंगों (सीरिया, लेबनान, गाजा) के लिए क्यों? इसलिए नारा लग रहा है कि न गाजा, न लेबनान, हमारी जान ईरान के लिए.

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दरअअसल ईरान में जबसे इस्लामी रिपब्लिक की स्थापना हुई तबसे ईरानी सरकार दुनिया भर में मुसलमानों की मसीहा बनने के चक्कर में अपना बहुत कुछ गंवा दिया. यूरोप और अमेरिका से इसी चक्कर में दूरी बढ़ती गई.

5- राजनीतिक दमन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अंत

इस्लामी रिपब्लिक में असली लोकतंत्र की कमी लोगों को बहुत खलती है. सर्वोच्च नेता अली खामेनेई अंतिम फैसला लेते हैं, जबकि गार्जियंस काउंसिल (12 सदस्यीय धार्मिक-कानूनी निकाय) उम्मीदवारों को वीटो करता है. यह काउंसिल सुधारवादी या विपक्षी उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराती है, जिससे चुनाव नियंत्रित हो जाते हैं.अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूरी तरह कुचली गई है.सरकार इंटरनेट ब्लैकआउट का सहारा लेती है .2025-2026 प्रदर्शनों में जनवरी 2026 से देशव्यापी इंटरनेट पर रोक लगी, ताकि प्रदर्शनकारी एकजुट न हों सकें. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ब्लॉक हैं, पत्रकारों की गिरफ्तारियां और विरोधियों की हत्याएं आम हैं.2025 में फांसी की संख्या दोगुनी हो गई. मानवाधिकार समूहों (HRANA, Iran Human Rights) के अनुसार कम से कम 1,922 फांसियां हुईं, जो 2024 से 106% अधिक हैं. दिसंबर 2025 में अकेले 376 फांसियां रिकॉर्ड हैं. लोग कहते हैं कि यह तानाशाही है, न कि इस्लामी रिपब्लिक.

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