कहानी दो विधानसभा सीटों की, जहां विजय ने विरोधियों को उन्हीं के गढ़ में दी चुनौती

तमिलनाडु की दो विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ने का जोखिम, नए चेहरों पर भरोसा और एक गहरा राजनीतिक संदेश. विजय की चुनावी शुरुआत लीक से बिल्कुल हटकर है. मगर इस रणनीति के केंद्र में सबसे अहम सवाल यही है कि क्या उनकी लोकप्रियता वास्तव में चुनावी जीत दिला पाएगी.

Advertisement
 विजय की पार्टी TVK 'एक्स-फैक्टर' बनी हुई है. (Photo-ITG) विजय की पार्टी TVK 'एक्स-फैक्टर' बनी हुई है. (Photo-ITG)

टी एस सुधीर

  • नई दिल्ली,
  • 30 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 3:09 PM IST

चेन्नई के एक आलीशान होटल में 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) के समर्थकों का हुजूम उमड़ा था, विजय ने माइक संभाला और बस इतना कहा "पेरम्बूर विधानसभा क्षेत्र के उम्मीदवार हैं..." पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट और नारों से गूंज उठा. विजय कुछ पल के लिए ठहरे, समर्थकों के इस बेपनाह प्यार और शोर के थमने का इंतजार किया और फिर मुस्कुराते हुए उस नाम का ऐलान किया सी जोसेफ विजय.

Advertisement

तिरुचि पूर्व सीट की घोषणा के वक्त माहौल में कोई खास हलचल नहीं थी, लेकिन जैसे ही उम्मीदवार के तौर पर सी. जोसेफ विजय का नाम सामने आया, पार्टी कार्यकर्ता और समर्थक हैरान रह गए.

48 घंटे पहले की बात है, जब पार्टी ने इस घोषणा से पहले उत्तरी चेन्नई के पेरम्बूर में एक बड़ी जनसभा करने की तैयारी की थी. अब इसे इत्तेफाक कहें या जानबूझकर किया गया काम, चेन्नई के जल विभाग ने ऐन उसी जगह के पास मरम्मत के नाम पर गड्ढा खोद दिया. रही-सही कसर तब पूरी हो गई जब तकनीकी कारणों का हवाला देकर मीटिंग की इजाजत देने से भी मना कर दिया गया. TVK को लगा कि तमिलनाडु के चुनावों में सबको बराबर का मौका नहीं मिल रहा है और यह उसी का एक नमूना है. आखिर में विजय को खुद मुख्य चुनाव अधिकारी के पास जाना पड़ा, तब कहीं जाकर सोमवार को सभा करने की मंजूरी मिल पाई.

Advertisement

यह भी पढ़ें: विजय अकेले... तमिलनाडु चुनाव में बिना गठबंधन के उतर रही TVK क्या हासिल कर पाएगी?

ज्यादातर उम्मीदार हैं नए

के.ए. सेंगोट्टैयन और सी.टी. निर्मल कुमार जो एआईएडीएमके से आए हैं और टीवीके के पुराने साथी आधव अर्जुना और एन. आनंद जैसे कुछ बड़े नेताओं को छोड़ दें, तो टीवीके (TVK) के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले ज्यादातर उम्मीदवार नए और अनजान चेहरे हैं, जो पहली बार चुनावी राजनीति में कदम रख रहे हैं. हकीकत तो यह है कि पार्टी में विकल्पों की कमी के कारण डीएमके, कांग्रेस और एआईएडीएमके से आखिरी वक्त में आए कई नेताओं को भी टिकट मिल गया है, जो 'विजय लहर' के भरोसे अपनी नैया पार लगाना चाहते हैं.

चेन्नई की एक सीट से तो विजय के पूर्व ड्राइवर के बेटे को उम्मीदवार बनाया गया है. टीवीके इसे इस बात के मिसाल के तौर पर पेश कर रही है कि पार्टी में वफादारी और काबिलियत की कद्र है. यह काफी हद तक 'जयललिता मॉडल' जैसा है, जहां एआईएडीएमके के समर्थक उम्मीदवार को देखे बिना सिर्फ उनके नाम पर वोट देते थे. जैसा कि खुद विजय ने पहले एक जनसभा में कहा था हर निर्वाचन क्षेत्र में एक 'विजय' ही टीवीके का उम्मीदवार होगा.

पेरम्बूर और तिरुचि पूर्व सीट पर सबकी नजर

Advertisement

चूंकि ज्यादातर उम्मीदवार राजनीति में नए हैं, इसलिए सबकी नजरें पेरम्बूर और तिरुचि पूर्व सीट पर टिकी हैं. विजय के राजनीतिक विरोधियों ने उनके दो सीटों से चुनाव लड़ने के फैसले को 'सुरक्षित' खेलने वाला एक "मूर्खतापूर्ण" कदम बताया है. दरअसल, यहां भी विजय ने जयललिता के नक्शेकदम पर चलने की कोशिश की है, क्योंकि 1991 में उन्होंने भी तमिलनाडु के उत्तरी और पश्चिमी बेल्ट पर अपना दबदबा साबित करने के लिए बरगुर और कांगेयम, इन दो सीटों से चुनाव लड़ा था.

पेरम्बूर और तिरुचि पूर्व दोनों ही अर्बन और सेमी अर्बन विधानसभा क्षेत्र हैं, जिसका सीधा मतलब यह है कि यहां की आबादी का एक बड़ा हिस्सा विजय के प्रशंसकों का है, जो ईवीएम (EVM) तक पहुंचकर वोटों में बदल सकता है. पेरम्बूर मुख्य रूप से कामकाजी वर्ग की सीट है, जबकि तिरुचि पूर्व में ईसाई मतदाताओं की अच्छी-खासी संख्या है. इस लिहाज से देखा जाए, तो यह 'थलपति' विजय के लिए दोनों सीटों पर जीत सुनिश्चित करने की एक सोची-समझी कोशिश है.

यह भी पढ़ें: पॉलिटिक्स में भी फिल्मी कहानी! विजय ने ड्राइवर के बेटे को दिया चुनाव का टिकट, याद दिलाया वायरल ऐड

लेकिन अगर आप इस ऊपरी तस्वीर से हटकर देखें, तो समझ आता है कि इस फैसले के पीछे काफी गहरी राजनीतिक सोच काम कर रही है. चेन्नई की एक ऐसी सीट से चुनाव लड़ना, जहां बड़ी संख्या में 'ब्लू कॉलर' यानी मजदूर और श्रमिक वर्ग के मतदाता हों, अपने आप में एक बड़ा संकेत है. यह विजय को अपनी जनता के नेता वाली जन-छवि को और मजबूत करने का मौका देता है.

Advertisement

इसके अलावा, राज्य की राजधानी लंबे समय से डीएमके (DMK) का अभेद्य किला रही है. मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के कोलाथुर निर्वाचन क्षेत्र से महज 5 किलोमीटर दूर इस सीट को चुनाव के लिए चुनना, सीधे तौर पर सत्ताधारी पार्टी की राह मुश्किल करने की एक कोशिश है.

एक ऐसी पार्टी के लिए जिसका जमीन पर सांगठनिक ढांचा अभी बहुत कमजोर है. यह एक साहसी फैसला है और यही इसे डेविड बनाम गोलियथ की लड़ाई बना देता है. पेरम्बूर में विजय का सामना डीएमके के कद्दावर मौजूदा विधायक आर.डी. शेखर से होगा, जो इस मुकाबले को जोखिम भरा बनाता है. एनडीए (NDA) द्वारा यह सीट अपेक्षाकृत कमजोर पीएमके (PMK) को दिए जाने के बाद, अब पेरम्बूर में सीधी टक्कर डीएमके बनाम टीवीके होने की उम्मीद है. हालांकि, एक नए राजनीतिक सितारे के उदय को रोकने के लिए एनडीए से डीएमके की ओर वोटों का रणनीतिक बदलाव भी देखा जा सकता है. 

मध्य तमिलनाडु के डेल्टा क्षेत्र से चुनाव लड़ने का फैसला भी रणनीतिक है, क्योंकि यह विजय को 'एक्टर' की रूढ़िवादी छवि और 'चेन्नई-केंद्रित' होने के आरोपों से बाहर निकलने में मदद करेगा. इससे वे पूरे तमिलनाडु के नेता के रूप में उभर सकेंगे. पेरम्बूर की औद्योगिक चमक और कावेरी डेल्टा की उपजाऊ मिट्टी, दोनों जगहों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराकर वे उत्तर के मेहनतकश हाथों और दक्षिण के किसान दिलों को एक साथ जोड़ने की एक सोची-समझी कोशिश कर रहे हैं. 

Advertisement

तिरुचि, जिसे अक्सर तमिलनाडु की 'राजनीतिक राजधानी' कहा जाता है, वहां से चुनाव लड़ना उन दो द्रविड़ पार्टियों (DMK और AIADMK) को एक नई रणनीति बनाने पर मजबूर कर देगा, जो राज्य के मध्य और दक्षिणी हिस्सों में बेहद मजबूत हैं. हालांकि, जयललिता के नेतृत्व में AIADMK ने 2011 और 2016 में तिरुचि पूर्व सीट जीती थी, लेकिन 2021 में उसे DMK से करारी शिकस्त झेलनी पड़ी, जहां DMK ने 53,000 से अधिक वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की थी. वर्तमान DMK विधायक इनिगो इरुदयराज की ईसाई समुदाय में जबरदस्त पैठ है, और ऐसे में 'स्थानीय बनाम बाहरी' का मुद्दा विजय के खिलाफ जा सकता है.

यह भी पढ़ें: अकेला शेर’... तमिलनाडु चुनाव में मल्टी पार्टी अलायंस के सामने ’234 विजय’ फॉर्मूला

क्या प्रशांत किशोर जैसा होगा हाल?

बाजार में ये भी चर्चा की जा रही है कि TVK का हाल भी बिहार में प्रशांत किशोर की 'जन सुराज पार्टी' जैसा होगा, जिसने अनजान चेहरों को मैदान में उतारा था. लेकिन इस तुलना में तमिलनाडु में विजय की 'लार्जर-देन-लाइफ' छवि को कम करके आंका जा रहा है. तमिलनाडु की अन्य राजनीतिक पार्टियों के उलट, जिन्हें अपनी जनसभाओं में भीड़ जुटाने के लिए पैसे देने पड़ते हैं और कई बार वोटों के लिए रिश्वत तक देनी पड़ती है, विजय के पास यह बहुत बड़ा फायदा है कि हजारों की भीड़ उन्हें देखने और सुनने के लिए खुद उमड़ पड़ती है. बेशक, चुनौती अब बस इतनी है कि इस दीवानगी को वोटों में कैसे बदला जाए.

Advertisement

संयोग से, साल 2019 में आई विजय की सुपरहिट फिल्म 'बिगिल' (उत्तरी चेन्नई की बोलचाल की तमिल भाषा में जिसका अर्थ 'सीटी' है, जो टीवीके का चुनाव चिह्न भी है) की कहानी उत्तरी चेन्नई के रायपुरम पर आधारित थी. इस फिल्म में विजय ने पिता-पुत्र की दोहरी भूमिका निभाई थी. रायप्पन, जो उत्तरी मद्रास का एक उम्रदराज डॉन है और माइकल, जो फुटबॉल स्टार से सबका रक्षक बन जाता है. दरअसल, पेरम्बूर और उसके पास के पुलियानथोप और व्यासपडी जैसे इलाके चेन्नई की फुटबॉल प्रतिभाओं के गढ़ माने जाते हैं.

उत्तरी चेन्नई से चुनाव लड़कर विजय उसी 'सबकल्चर' से जुड़ रहे हैं, जिसे उन्होंने बड़े पर्दे पर बहुत ही शानदार ढंग से पेश किया था. अगर 23 अप्रैल को मतदाता मौजूदा राजनीति की विदाई की सीटी बजा देते हैं, तो वह निश्चित रूप से राजनीति के मैदान में जीत का गोल करने में भी सफल रहेंगे.
 

(लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक की अपनी राय हैं)

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement