साल 2025 अब इतिहास है और 2026 की दहलीज़ पर खड़ा भारतीय क्रिकेट एक बार फिर उम्मीदों का बस्ता उठाए आगे बढ़ रहा है. टी-20 वर्ल्ड कप सामने है, यानी एक और सपना, एक और जुनून. 2025 ने भी हमें बहुत कुछ दिया- चैम्पियंस ट्रॉफी की खुशी, आरसीबी फैन्स का लंबा इंतज़ार खत्म होने की कहानी. लेकिन अगर भारतीय क्रिकेट को 360 डिग्री के नज़रिए से देखा जाए, तो 2025 की गलियों में एक ही नाम सबसे ज़्यादा गूंजा- और वह है वैभव सूर्यवंशी.
अभी महज़ 14 साल, 280 दिन का... आईपीएल का 'करोड़ वाल कॉन्ट्रैक्ट', विजय हजारे ट्रॉफी में 190 रनों की विस्फोटक पारी और अंडर-19 क्रिकेट में सबसे तेज़ शतक... आंकड़े चीख-चीखकर कह रहे हैं- ये लड़का स्पेशल है. लड़का सच में स्पेशल है, इसमें कोई शक नहीं. लेकिन यहीं से एक डर जन्म लेता है.
भारतीय क्रिकेट की याददाश्त सिर्फ रिकॉर्ड्स से भरी नहीं है, उसमें वो चेहरे भी दर्ज हैं जो आसमान तक पहुंचे, लेकिन फिर चकाचौंध के समंदर में ऐसे डूबे कि आज उनका किनारा भी नज़र नहीं आता. वैभव सूर्यवंशी की चर्चा स्वाभाविक है- 14 साल की उम्र में अगर आप 200 के स्ट्राइक रेट से आईपीएल में रन बना रहे हैं, तो दुनिया आपको पलकों पर बिठा लेती है.
मगर भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी त्रासदी यही रही है- हम किसी खिलाड़ी को लीजेंड बनाने की इतनी जल्दी करते हैं कि उसे इंसान बने रहने का समय ही नहीं देते. आज वैभव जिस उम्र में हैं, वहां सबसे बड़ी चुनौती है- पैर जमीन पर रखना. करोड़ों रुपये, सोशल मीडिया की वाहवाही और 'अगला सचिन' या 'अगला सहवाग' कहे जाने का बोझ अच्छे-अच्छों की तकनीक और मानसिक संतुलन को हिला चुका है.
अगर वैभव को कोई केस स्टडी पढ़नी चाहिए, तो वो है पृथ्वी शॉ. 2018 में लगा था कि भारतीय बैटिंग का अगला दशक उसी के नाम होगा- डेब्यू टेस्ट में शतक, अंडर-19 वर्ल्ड कप की कप्तानी, बेखौफ अंदाज़. लेकिन 2025 तक आते-आते कहानी बदल गई. फिटनेस, अनुशासन और मैदान के बाहर की उलझनों ने एक क्लासिक टैलेंट को डोमेस्टिक क्रिकेट की बेंच तक सीमित कर दिया.
पृथ्वी शॉ इस बात का जीता-जागता सबूत हैं कि क्रिकेट सिर्फ बैट और बॉल का खेल नहीं है, ये दिमाग और लाइफस्टाइल का भी खेल है. जब पैसा और शोहरत मेहनत से आगे निकल जाते हैं, तो पतन तय होता है.
पार्थिव पटेल भी कभी वैभव की तरह ही थे- 17 साल, 152 दिनों का लड़का, सीधे टेस्ट क्रिकेट में. टैलेंट था, मौके भी मिले, लेकिन क्या वो वहां पहुंचे, जहां उनका हुनर उन्हें ले जा सकता था? वक्त बदला, एमएस धोनी आए और पार्थिव पीछे छूटते चले गए.
हमें पीयूष चावला को भी नहीं भूलना चाहिए... उन्हें तो 17 साल 75 रन में ही टेस्ट में उतार दिया गया था… लेकिन उनका भी करियर महज 3 टेस्ट मैचों का रहा. और फिर प्रणव धनावड़े- एक पारी में 1009 रन. दुनिया दंग रह गई. मगर आज वो नाम सिर्फ रिकॉर्ड बुक्स में है... क्योंकि रिकॉर्ड बनाना और इंटरनेशनल क्रिकेट की तपिश झेलना- दो बिल्कुल अलग दुनिया हैं.
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वैभव के पास आज सब कुछ है- राजस्थान रॉयल्स जैसा सपोर्ट सिस्टम, आंकड़ों की बौछार और सुनहरा भविष्य. लेकिन भारतीय क्रिकेट प्रेमियों को भी संयम सीखना होगा. हम अक्सर युवा खिलाड़ियों को विज्ञापन और ग्लैमर के बाज़ार में इतना खींच लेते हैं कि उनकी नेट प्रैक्टिस पीछे छूट जाती है.
वैभव के लिए सबसे बड़ा खतरा विपक्षी गेंदबाज़ नहीं, बल्कि वो हाइप है जो उन्हें हर पल घेरे रहती है. आईपीएल 2025 में 252 रन और 200 से ऊपर का स्ट्राइक रेट उनकी क्षमता का प्रमाण है. लेकिन क्रिकेट की दुनिया 'यूज़ एंड थ्रो' की मानसिकता पर चलती है- आज आप हीरो हैं, कल एक खराब सीज़न आपको भुला सकता है. जनवरी 2026 में ज़िम्बाब्वे–नामीबिया में होने वाला अंडर-19 वर्ल्ड कप वैभव के लिए सिर्फ एक टूर्नामेंट नहीं, बल्कि लिटमस टेस्ट है. अब विरोधी टीमें उनके वीडियो काटेंगी, डेटा खंगालेंगी और हर छोटी कमज़ोरी को निशाना बनाएंगी.
दिक्कत वैभव की बैटिंग में नहीं, बल्कि उस सिस्टम में है जो एक बच्चे को उसकी उम्र से पहले ही भगवान बना देता है. आईपीएल के करोड़ों और विज्ञापनों की भीड़ 14–15 साल के लड़के के मानसिक संतुलन को डगमगाने के लिए काफी है. 2025 की चकाचौंध के बाद 2026 का सन्नाटा बहुत गहरा हो सकता है- अगर अनुशासन का घेरा मज़बूत न रहा. भारतीय क्रिकेट को एक और पृथ्वी शॉ नहीं चाहिए. हमें ऐसा वैभव सूर्यवंशी चाहिए, जो अपनी उम्र के साथ अपनी मैच्योरिटी भी बढ़ाए.
वैभव को अपनी विरासत खुद लिखनी है और उसके लिए उन सितारों से सीखना होगा, जो बहुत तेज़ चमके…और उतनी ही जल्दी बुझ भी गए.
मोहित ग्रोवर