यूपी चुनाव 2027 में दलित केंद्रित पार्टियों के लिए कितनी जमीन बची, वोटर ट्रेंड क्या कहता है

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव में दलित वोटों को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ गई है. मायावती ने जहां बीएसपी के अकेले दम पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है, चिराग पासवान सहित यूपी से बाहर के राजनीतिक दल भी अपनी अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं - और बीजेपी तो मैदान में डटी हुई है ही.

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उत्तर प्रदेश चुनाव 2027 में दलित वोटों के दावेदार बाहर से भी पहुंचने वाले हैं. (Photo: File/ITG) उत्तर प्रदेश चुनाव 2027 में दलित वोटों के दावेदार बाहर से भी पहुंचने वाले हैं. (Photo: File/ITG)

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 20 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:17 PM IST

उत्तर प्रदेश में मायावती अब दलितों की अकेली मसीहा नहीं रह गई हैं. ये बात कोई धारणा या किसी नैरेटिव की बदौलत नहीं, बल्कि आंकड़ों के आधार पर कही जा रही है. अब अगर दलित मायावती को वोट नहीं देते, तो उनका वोट किसे मिलता है? 

वोट तो उसी को मिलता होगा, जिसे जीत हासिल होती है. बीजेपी यूपी की सत्ता पर काबिज है, और समाजवादी पार्टी विपक्ष में है. मतलब, ज्यादातर दलित वोट भी बीजेपी और समाजवादी पार्टी में ही मुख्य रूप से बंट जा रहा है. बात मायावती की बीएसपी की करें तो 2022 में तो उसे कांग्रेस से भी कम सीटों पर जीत मिली थी. कांग्रेस के दो विधायक चुनकर आए थे, और बीएसपी का सिर्फ एक. 

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बीजेपी और समाजवादी पार्टी में मायावती के वोट बैंक पर काबिज होने की पहले से ही होड़ मची है. 2024 के आम चुनाव में मिली कामयाबी के बाद से भीम आर्मी वाले चंद्रशेखर आजाद भी एक दावेदार बनकर उभरे हैं - और आने वाले चुनाव के लिए तो यूपी से बाहर दलित राजनीति करने वाली पार्टियां भी जोर शोर से तैयारी कर रही हैं.

उत्तर प्रदेश में दलित वोटर का रुझान

बीएसपी को उत्तर प्रदेश में मिलते आ रहे दलितों के समर्थन में आई गिरावट काफी हैरान करती है. लोकसभा या विधानसभा में सीटें मिलें न मिलें, लेकिन वोट शेयर बरकरार रहे तो मायावती के लिए ज्यादा फिक्र वाली बात नहीं होती. 2007 में अपने दम पर सत्ता हासिल करने वाली बीएसपी के वोट शेयर में अब तक 20 फीसदी की गिरावट दर्ज की जा चुकी है. 2007 के यूपी विधानसभा चुनाव में बीएसपी को जहां 30 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे, 2024 का लोकसभा चुनाव आते आते आंकड़े 9.3 फीसदी पर पहुंच गए. 

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2007 के यूपी विधानसभा चुनाव में बीएसपी ने 30.43 फीसदी वोट शेयर के साथ 403 में से 206 सीटें जीती और पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाई. जिसमें दलितों के करीब 65 फीसदी वोट बसपा को मिले थे.

2012 के चुनाव नतीजों को देखें, तो पांच साल सरकार चलाने के बाद बीएसपी का कुल वोट शेयर घटकर 25.91 पहुंच चुका था. जिसमें पिछले चुनाव के मुकाबले दलितों के करीब 20 फीसदी वोट घटे. और मायावती 48 फीसदी दलित वोट ही अपने पक्ष में कर पाईं. बीएसपी के बाद समाजवादी पार्टी को 24 फीसदी, कांग्रेस को 15 फीसदी और बीजेपी को 8 फीसदी वोट मिले थे - लेकिन, धीरे धीरे ये पैटर्न और बदलता गया.

2017 के चुनाव में बसपा को सत्ता मिलना तो बहुत दूर की बात थी, वोट शेयर भी गिरावट के साथ 22.2 फीसदी दर्ज किया गया. दलितों वोटों ने बीजेपी ने सबसे बड़ी सेंध लगाई. खासकर गैर जाटव दलित वोटों में.

2022 के चुनाव में जब योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव को सत्ता में आने से दोबारा रोक दिया, एक छोर पर मायावती 12.7 फीसदी वोटों की हिस्सेदारी के साथ मन मसोस कर रह गईं. उनकी उदासीनता से दलित वोट पूरी तरह सपा और भाजपा के बीच बिखर गया.

2027 की रेस में कौन कौन है

उत्तर प्रदेश में दलित समुदाय की आबादी का करीब 21 फीसदी है. बीएसपी के संस्थापक कांशीराम और बाद में मायावती ने यूपी में दलित वोटर को आवाज देने के साथ ही, चुनावों में उनके निर्णायक भूमिका में होने के साथ उनकी ताकत का भी एहसाल दिलाया. 2007 में मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग की बदौलत बीएसपी की सरकार भी बनाई - लेकिन फिर 2012, 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में वोटिंग पैटर्न में बड़ा बदलाव देखा गया, जिसमें जातीय गठबंधनों के साथ साथ आर्थिक मसलों और वैचारिक राजनीतिक लामबंदी का भी असर देखा गया. 

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2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीएसपी का प्रदर्शन सबसे खराब रहा, और बाकी राजनीतिक दलों के उत्साहवर्धन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. कांशीराम की विरासत भले ही मायावती भतीजे आकाश आनंद या किसी और को सौंपने को तैयार न हों, लेकिन आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के माध्यम से नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद दावा पेश कर चुके हैं. 

चंद्रशेखर आजाद तो यूपी से ही हैं, बिहार से चिराग पासवान लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के साथ साथ महाराष्ट्र से रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अठावले) और प्रकाश अंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी (वीबीए) भी दलित वोट बैंक को देखते हुए यूपी चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में जुटे हैं.
 
1. यूपी की नगीना लोकसभा सीट से 2024 में चंद्रशेखर आजाद की जीत करीब करीब वैसी ही रही, जैसी बिहार के पूर्णिया से पप्पू यादव की. जैसे पप्पू यादव को कांग्रेस से पर्दे के पीछे से जीत में मदद मिली थी, चंद्रशेखर आजाद को भी बीजेपी का वैसा ही परोक्ष सपोर्ट मिला था. नगीना में मायावती के भतीजे आकाश आनंद वैसे ही डटे रहे, जैसे पूर्णिया में तेजस्वी यादव - और दोनों भी फेल साबित हुए. 

चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) ने 2022 के विधानसभा चुनाव में 133 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन अब यूपी की सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है. तब चंद्रशेखर आजाद खुद गोरखपुर से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ चुनाव मैदान में थे. 

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2027 को ध्यान में रखकर चंद्रशेखर आजाद भी मायावती की ही तरह दलितों के अलावा भी वोट पाने की कोशिश में हैं. चंद्रशेखर आजाद ने सभी विधानसभा क्षेत्रों में भाईचारा संगठन बनाए हैं, जिनमें ईबीसी-ओबीसी के 13 अलग-अलग समूह शामिल हैं. मुस्लिम वोट के लिए अलग भाईचारा संगठन बनाया हुआ है.

2. 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में अकेले चुनाव लड़ चुके चिराग पासवान इस बार बीजेपी के साथ चुनावी गठबंधन के लिए प्रयासरत हैं. 2022 के चुनाव में एलजेपी (आरवी) ने 120 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थेचुनाव लड़ने के बावजूद एक भी सीट नहीं जीत पाई, और वोट शेयर भी महज 0.2 फीसदी ही रहा.

हालांकि, एलजेपी की यह दलील महत्वपूर्ण है कि पार्टी उस वक्त विभाजन का दर्द झेल रही थी, लेकिन 2024 के लोकसभा और 2025 के बिहार विधानसभा में उसका स्ट्राइक रेट आने वाले चुनाव में बेहतर प्रदर्शन की तरफ इशारा कर रहा है. यूपी को लेकर एक सीनियर एलजेपी नेता ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा है, हम पासी और पासवान वोटों को अपने पक्ष में एकजुट करने पर ध्यान दे रहे हैं, जो आबादी का 10 फीसदी हैं... हमारा मानना है कि जाटव और रविदासी बीएसपी पर भरोसा बनाए रखेंगे, जबकि नाराज वोटर आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) की ओर चले जाएंगे.

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3. महाराष्ट्र में दलित राजनीति करने वाली दो राजनीतिक पार्टियां भी यूपी के मैदान में उतरने के बेताब नजर आ रही हैं. महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव में कांग्रेस के साथ जाने वाली प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी तो उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर संगठन खड़ा करने में जुटी हुई है. रामदास अठावले की आरपीआई (ए) यूपी में भी बीजेपी के साथ चिराग पासवान की तरह गठबंधन की कोशिश में है. 2022 में भी आरपीआई ने बीजेपी के साथ गठबंधन की कोशिश की थी, लेकिन बात नहीं बनी तो सपोर्ट कर दिया था. वैसे ही वीबीए ने 2022 में चुनाव न लड़कर समाजवादी पार्टी का सपोर्ट किया था. 

बीएसपी की प्रासंगिकता और संभावित भविष्य 

मायावती ने हाल ही में साफ किया है कि बीएसपी 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में किसी भी राजनीतिक दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी, और अकेले दम पर चुनाव मैदान में उतरेगी. राजनीतिक विरोधियों को निशाने पर रखते हुए मायावती ने  कहा, इन दिनों AI को सफलता की कुंजी बताने की स्वार्थी चर्चाएं चल रही हैं... मीडिया जगत में भी किसी न किसी बहाने बसपा के गठनबंधन में विधानसभा चुनाव लड़ने का भ्रम फैलाया जा रहा है... यह फेक न्यूज है... कई बार सार्वजनिक तौर पर बसपा के अकेले चुनाव लड़ने की बात कही जा चुकी है.

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बीएसपी नेता के निशाने पर समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव भी हो सकते हैं. पीडीए के माध्यम से लोगों के बीच भाईचारे और सहयोग को मजबूती मिलने की उम्मीद जताते हुए अखिलेश यादव ने कहा था, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं, और आगे और भी गहरे होंगे. 

1. मायावती की बहुजन समाज पार्टी 2022 के यूपी चुनाव में सिर्फ एक विधानसभा सीट जीत पाई थी, और वोटों में उसकी हिस्सेदारी पांच साल में पांच फीसदी से ज्यादा घट गई. 2022 में बीएसपी का वोट प्रतिशत यूपी में जाटव-रविदासी दलितों की आबादी के लगभग बराबर है, जिन्हें बीएसपी का मुख्य सपोर्ट बेस माना जाता है. 

2. 2024 के लोकसभा चुनाव आने तक बीएसपी का यह मुख्य वोटर बेस भी कमजोर पड़ता देखा गया. बीएसपी एक भी सीट नहीं जीत पाई और उसका वोट प्रतिशत 2019 के 19.43 फीसदी से घटकर 9.3 फीसदी रह गया - 2019 का लोकसभा चुनाव बीएसपी ने समाजवादी पार्टी और जयंत चौधरी की पार्टी आरएलडी के साथ मिलकर लड़ा था, और 10 सीटें जीती भी थीं.

ऐसे में जबकि यूपी से बाहर की दलित राजनीतिक पार्टियां मायावती को चैलेंज करने की तैयारी कर रही हैं, दलित और समाजवादी राजनीति के पुराने रिश्ते की मजबूती की तरफ ध्यान दिलाते हुए अखिलेश यादव कह रहे हैं, कभी बीआर आंबेडकर और राम मनोहर लोहिया ने मिलकर राजनीति को नई दिशा देने की कोशिश की थी, लेकिन परिस्थितियों और राजनीतिक माहौल ने उन्हें पर्याप्त समय नहीं दिया - मायावती को अब ऐसी बातें बिल्कुल भी पसंद नहीं आतीं.   

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और, 2022 के यूपी विधानसभा के दौरान जब अमित शाह ने 2024 में नरेंद्र मोदी को फिर से प्रधानमंत्री बनाने के लिए योगी आदित्यनाथ को चुनावों में जीत सुनिश्चित करने के लिए लोगों से अपील कर रहे थे, मायावती को लेकर कहा था, बीएसपी की प्रासंगिकता खत्म नहीं होने वाली है. 

बीजेपी और मोदी की दलित पॉलिटिक्स

2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में जब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने सत्ता में वापसी के लिए पूरी ताकत झोंक रखी थी, बीजेपी ने बड़े उलटफेर के साथ दोनों को किनारे कर सरकार बना ली. बीजेपी की जीत में दलित वोटों की अहम भूमिका तो थी ही, पहले भी दलित वोटर की निर्णायक भूमिका महसूस की जा चुकी है. केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की बदौलत बीजेपी ने गैर-जाटव वोटों को भी सफलतापूर्वक साध लिया था. मोदी सरकार ने दलित कानून पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अपनी प्राथमिकता को आगे रखा. उन्होंने दलितों की संवेदना से जुड़े हर पहलू पर ये जताने की भरसक कोशिश की, कि उनसे बड़ा दलित हितैषी आज कोई नहीं है. मोदी आरक्षण की बहस में आगे बढ़कर कहते हैं कि उनके जीते जी कोई भी आरक्षण से समझौता नहीं होगा. रविदास जयंती पर वे हर साल याद से रविदास जन्मस्थान या फिर पंजाब में जाते हैं, और दलितों के लिए सम्माननीय महापुरुषों का चरण स्पर्श करते दिखाई देते हैं. मोदी के इन कदमों से कभी ‘ब्राह्मण-बनियों की पार्टी‘ कही गई बीजेपी की छवि बदली है. नतीजा ये हुआ है कि-

1. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 2017 यूपी में सुरक्षित सीटों की संख्या 86 कर दी गई थी. अनुसूचित जाति के लिए 84 तो पहले से ही थीं, अनुसूचित जनजाति के लिए सोनभद्र में दो सीटें बढ़ाई गईं. और, बीजेपी ने तब 70 सीटों पर जीत हासिल की थी, जिनमें सोनभद्र की भी एक सीट शामिल थी. 

2. रिजर्व सीटों के हिसाब से देखें तो यूपी चुनाव 2022 में बीजेपी गठबंधन ने दोबारा दलितों का सबसे ज्यादा वोट हासिल किया. बीजेपी ने 65 सुरक्षित सीटों पर जीत हासिल की. 

अब तो मायावती का अपना जाटव वोट भी फिसलने लगा है, लेकिन 2017 में गैर-जाटव वोट बीजेपी की तरफ शिफ्ट होता देखा गया. तब यूपी में अनुसूचित जाति के लिए रिजर्व 84 में से 69 सीटें बीजेपी के खाते में चली गई थीं, जबकि मायावती के हिस्से में महज 2 सीटें ही आई थीं - क्योंकि बीजेपी के हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के एजेंडे में जातीय राजनीति पीछे छूट गई थी.

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