भारतीय क्रिकेट के इतिहास में कुछ जीत केवल ट्रॉफी तक सीमित नहीं होतीं. वे उन खिलाड़ियों और कोचों की तपस्या का जवाब होती हैं, जिन्हें वक्त-वक्त पर नकारा गया. हाल ही में भारत की टी20 वर्ल्ड कप में शानदार जीत ने क्रिकेट जगत को एक बड़ा संदेश दिया है. यह संदेश है प्रोसेस (प्रक्रिया) पर टिके रहने का. इस जीत के तीन सबसे बड़े नायक संजू सैमसन, सूर्यकुमार यादव और हेड कोच गौतम गंभीर हैं. इन तीनों की राहें अलग थीं, लेकिन मंजिल एक थी- अपने आलोचकों को चुप कराना और भारतीय क्रिकेट को शिखर पर ले जाना.
इन तीनों दिग्गजों की कहानी में एक बात समान है तीखी आलोचना के बीच लंबा इंतजार. संजू सैमसन को देखिए. केरल का यह स्टाइलिश बल्लेबाज सालों तक टीम के अंदर-बाहर होता रहा. जब भी उन्हें मौका मिला, उन पर उम्मीदों का पहाड़ लाद दिया गया. एक खराब शॉट और संजू विलेन बन जाते थे. सोशल मीडिया पर उनके चयन को लेकर जंग छिड़ जाती थी. लेकिन संजू ने हार नहीं मानी. उन्होंने घरेलू क्रिकेट में रन बनाए और आईपीएल में राजस्थान रॉयल्स की कप्तानी करते हुए खुद को एक मैच्योर लीडर के रूप में ढाला.
वहीं सूर्यकुमार यादव की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है. सूर्या को अपनी पहली नीली जर्सी पहनने के लिए 30 साल की उम्र तक का इंतजार करना पड़ा. लोग कहते थे कि उनकी उम्र निकल गई है. लेकिन सूर्या ने दिखाया कि टैलेंट उम्र का मोहताज नहीं होता. उनके 360 डिग्री शॉट्स ने दुनिया को हैरान कर दिया. आज वे दुनिया के नंबर एक टी20 बल्लेबाज हैं, लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने सालों तक मुंबई की तपती पिचों पर पसीना बहाया है.
गौतम गंभीर का मामला थोड़ा अलग है. बतौर खिलाड़ी उन्होंने भारत को दो वर्ल्ड कप जिताए, लेकिन बतौर कोच उनकी पारी की शुरुआत कांटों भरी रही. आईपीएल में मेंटर के रूप में मिली सफलता के बाद जब उन्हें टीम इंडिया की जिम्मेदारी मिली, तो सवाल उठे. क्या वे मॉडर्न क्रिकेट के साथ तालमेल बिठा पाएंगे? क्या उनका आक्रामक स्वभाव टीम के माहौल को बिगाड़ देगा? गंभीर ने इन सवालों का जवाब मैदान पर दिया.
आंकड़े जो कामयाबी की कहानी कहते हैं
संजू सैमसन ने T20 वर्ल्डकप 2026 की अपनी पिछली तीन पारियों में जो खेल दिखाया, उसने बता दिया कि वे लंबी रेस के घोड़े हैं. उन्होंने केवल रन नहीं बनाए, बल्कि जिस स्ट्राइक रेट से रन कूटे, उसने विपक्षी गेंदबाजों की कमर तोड़ दी. उनके बल्ले से निकले शतक और अर्धशतक केवल रिकॉर्ड बुक के लिए नहीं थे, वे उस चयनकर्ता के लिए जवाब थे जिसने कभी उन्हें 'इनकंसिस्टेंट' कहा था. T20 वर्ल्डकप 2026 के 9 मैचों में से भी 4 में वे प्लेइंग इलेवन का हिस्सा नहीं बनाए गए थे. लेकिन, उनके लिए टीम ने कुछ बड़ा सोचा था. और फिर जैसे ही उन्हें मौका मिला, संजू ने वो बड़ा कर दिखाया. संजू का औसत और उनका गेम सेंस अब पहले से कहीं ज्यादा बेहतर नजर आता है.
सूर्यकुमार यादव की बात करें तो आईसीसी टूर्नामेंट्स में उनका दबदबा बढ़ता ही जा रहा है. एशिया कप से लेकर चैंपियंस ट्रॉफी और अब टी20 वर्ल्ड कप तक, सूर्या टीम इंडिया की बैटिंग की रीढ़ रहे हैं. उनके आंकड़े बताते हैं कि वे दबाव के क्षणों में निखर कर सामने आते हैं. जब टीम के बड़े नाम फ्लॉप होते हैं, तब सूर्या अपने अतरंगी शॉट्स से मैच का रुख पलट देते हैं. उनका स्ट्राइक रेट टी20 इतिहास के सर्वश्रेष्ठ आंकड़ों में गिना जाता है. यही कारण है कि टी20 वर्ल्डकप में सूर्या ने बल्ले से भले औसत प्रदर्शन किया, लेकिन उनकी मौजूदगी के खौफ ने विरोधी टीमों के हौंसले ऊंचे नहीं होने दिया. और बाकी काम सूर्या की आक्रामक कप्तानी ने कर दिखाया.
गौतम गंभीर का रिकॉर्ड बतौर रणनीतिकार अद्भुत रहा है. उनकी देखरेख में भारत ने एशिया कप जीता, चैंपियंस ट्रॉफी में फाइनल तक का सफर तय किया और अब वर्ल्ड कप की ट्रॉफी घर लाए. गंभीर का 'विनिंग परसेंटेज' किसी भी भारतीय कोच के शुरुआती कार्यकाल में सबसे शानदार रहा है. T20 वर्ल्डकप 2024 के बाद टीम इंडिया के कोच बने गंभीर के रहते भारतीय टीम की जीत का प्रतिशत 85 प्रतिशत है. है ना कमाल. ऐसा इसलिए क्योंकि वे खिलाड़ियों के रिकॉर्ड से ज्यादा उनके इम्पैक्ट पर ध्यान देते हैं. कब वरुण चक्रवर्ती को खिलाना है और कब कुलदीप को, उन्हें सब पता है. मीडिया का दबाव उन पर नहीं चलता है. लगातार फ्लॉप हो रहे अभिषेक शर्मा पर उनका भरोसा रंग लाया.
भरोसे की वो त्रिकोणीय दीवार
इन तीनों की सफलता के पीछे एक-दूसरे पर अटूट भरोसा है. गौतम गंभीर हमेशा से उन खिलाड़ियों के पक्षधर रहे हैं जिनके पास एक्स-फैक्टर हो. उन्होंने संजू सैमसन की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें वह सिक्योरिटी दी जिसकी संजू को सालों से तलाश थी. गंभीर ने साफ कर दिया कि संजू की एक-दो विफलताएं उन्हें टीम से बाहर नहीं करेंगी. इसी भरोसे ने संजू को खुलकर खेलने की आजादी दी.
वहीं सूर्या और गंभीर का तालमेल भी पुराना है. केकेआर के दिनों से ही गंभीर जानते थे कि सूर्या किस मिट्टी के बने हैं. गंभीर ने सूर्या को वह मंच दिया जहां वे खुद को एक्सप्रेस कर सकें. सूर्या भी गंभीर की फील्ड सेटिंग और गेम प्लानिंग पर पूरा भरोसा करते हैं. वर्ल्ड कप के दौरान कई मौकों पर देखा गया कि गंभीर डगआउट से जो निर्देश भेजते थे, सूर्या उसे मैदान पर बखूबी लागू करते थे.
प्रोसेस सही तो परिणाम भी सही
अक्सर क्रिकेट में कहा जाता है कि 'रिजल्ट' मायने रखता है, लेकिन इन तीनों ने साबित किया कि 'प्रोसेस' सबसे ऊपर है. संजू ने अपने शॉट सिलेक्शन पर काम किया, सूर्या ने अपनी फिटनेस और पावर हिटिंग ही नहीं, अपनी ऑन फील्ड टैक्टिकल लीडरशिप को भी इंप्रूव किया. और गंभीर ने टीम में 'जीतने की भूख' पैदा की.
संजू सैमसन के लिए माइलस्टोन केवल शतक नहीं हैं. उनका असली माइलस्टोन वह मानसिक मजबूती है जिससे उन्होंने टीम में अपनी जगह पक्की की. सूर्या के लिए रिकॉर्ड्स केवल नंबर हैं, उनका असली पैगाम यह है कि मेहनत कभी बेकार नहीं जाती. और गंभीर के लिए ट्रॉफी जीतना एक आदत है. उनके लिए सबसे बड़ा माइलस्टोन वह निडर रवैया है जो उन्होंने टीम के भीतर भरा है.
आलोचकों को करारा जवाब
इन तीनों के खिलाफ एक बड़ा मोर्चा हमेशा सक्रिय रहता था. संजू की तकनीक पर सवाल थे, सूर्या की निरंतरता पर संदेह था और गंभीर की कोचिंग स्टाइल पर चर्चा थी. लेकिन अब, जब अलमारी में तीन आईसीसी ट्रॉफियां सज चुकी हैं, तो ये आलोचक शांत हैं.
क्रिकेट की दुनिया में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन जो खिलाड़ी और कोच अपनी बुनियादी बातों (फंडामेंटल्स) पर टिके रहते हैं, वे ही इतिहास रचते हैं. संजू, सूर्या और गंभीर की ये जोड़ी अब भारतीय क्रिकेट के एक नए युग की शुरुआत कर चुकी है. यह युग है निडरता का, यह युग है टैलेंट के सम्मान का और सबसे जरूरी- यह युग है धैर्य का.
धीरेंद्र राय