'महामहिम' ट्रंप का एक साल, MAGA का तनाव बना ग्लोबल माइग्रेन

डोनाल्ड ट्रंप के लिए राष्ट्रपति पद की एनिवर्सरी भले जश्न का विषय हो, लेकिन दुनियाभर के लिए ये तनावभरा कैलेंडर था. टैरिफ, डील मेकर, पीस मेकर, हमलावर, टेकओवर... दुनिया के सामने ट्रंप ने हर तरह के स्वांग रचे. वे दुनिया को अपनी अंगुलियों पर नचाना चाहते रहे, और इस कोशिश दुनिया अपनी चाल भूल गई. रोज एक नया ट्वीट, और उसके साथ रोज एक नया बवाल.

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डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद एक साल में पूरी दुनिया के हर नियम कायदे की धज्जियां उड़ा दी हैं. (फोटो- ITG) डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद एक साल में पूरी दुनिया के हर नियम कायदे की धज्जियां उड़ा दी हैं. (फोटो- ITG)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 20 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 10:58 AM IST

जब डोनाल्ड ट्रंप ने शपथ ली, तो व्हाइट हाउस की दीवारों पर लगी घड़ियों ने टिक-टिक करना छोड़ सीधे 'ट्रम्‍प-ट्रम्प' करना शुरू कर दिया. समय अब मिनटों में नहीं, ट्वीटों में मापा जाने लगा. दुनिया ने सोचा चलो, एक और प्रयोग देखते हैं. पर यह प्रयोग साइंस की लैब में नहीं, जियो-पॉलिटिक्‍स के प्रेशर कुकर में हो रहा था. 2024 के राष्‍ट्रपति चुनाव में जब डोनाल्‍ड ट्रंप मेक अमेरिका ग्रेट अगेन (MAGA) का नारा दे रहे थे, तो दुनिया उन्‍हें एक राष्‍ट्रवादी नेता के रूप में देख रही थी. क्‍या पता था कि ट्रंप का MAGA ग्‍लोबल माइग्रेन बन जाएगा.

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पहला महीना था वार्म-अप राउंड का. ट्रंप ने दुनिया को समझाया कि वह राष्ट्रपति नहीं, ब्रांड हैं. देशों को उन्होंने 'डील' कहा, अलायंस को 'सब्सक्रिप्शन', और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को 'फिजूल खर्च'.  डील के लिए डेडलाइन दी जाने लगी. टैरिफ का डर दिखाया जाने लगा.

दूसरा महीना आते-आते ट्रंप के तेवर बदले, भाषा बदली. अब टैरिफ उनका नया राष्ट्रीय कीवर्ड था. जिस देश से सुबह नाराजगी, उस पर दोपहर तक टैरिफ, और शाम तक दोस्ती का प्रस्ताव. बस शर्त यह कि दोस्ती डॉलर में हो. अर्थशास्त्री टीवी पर समझाते रहे कि टैरिफ बूमरैंग होता है. लेकिन, ट्रंप मुस्कुराए. अपनी नीतियों के लिए ट्रंप खुद एक एक्‍सपर्ट थे.

तीसरे महीने में उन्होंने नक्शे से बात करनी शुरू की. मैक्सिको, कनाडा जैसे देशों की सरहदें कमजोर लगने लगीं. किसी द्वीप को देखकर कहा, तुम्हें खरीद सकते हैं. किसी समुद्र से बोले, तुम्‍हारा नाम सही नहीं है. भूगोल चुप था, राजनीति कांप रही थी.

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चौथे महीने तक आते आते ट्रंप शांति का मसीहा बनने लगे थे. जुबां पर हर वक्‍त 'नोबेल' रहता था. दूर दूर से राष्‍ट्राध्‍यक्ष बुलाए जाते. उन्‍हें ट्रंप की मेज के इर्द-गिर्द खड़ा किया जाता. फिर बताया जाता कि ये आपस में लड़ रहे थे, मैंने अमन ला दिया. ट्रंप को संत की उपाधि नोबेल वालों से ही मिलनी थी. जिसकी टीस उनको बरकरार रही. दर्द ये भी था कि ओबामा को वो मिल गया है.

फिर आया चेतावनियों का मौसम. 'हम हमला करेंगे'. किस पर, कब, क्यों - यह सब सरप्राइज एलिमेंट था. दुनिया को लगने लगा कि यह कोई रियलिटी शो है. कौन होगा सेंक्‍शन? कोई देश इस शो का हिस्‍सा होना नहीं चाहता था, लेकिन ट्रंप ढूंढते रहे.

पांचवां महीना संस्थाओं के नाम रहा. अदालतें, मीडिया, विश्वविद्यालय, सब पर एक से बढ़कर एक आरोप. 'ये मेरे जैसे नहीं सोचते, उनकी सोच दो कौड़ी की'. जो MAGA समर्थक नहीं, वो राष्ट्रद्रोही. जो सवाल पूछे, वह दुश्मन. और जो हंसे, वह नकली. प्रेस कॉन्‍फ्रेंस अब सवाल-जवाब नहीं, पत्रकारों की बेइज्‍जती का ठिकाना बन गईं. 

छठा महीना—इतिहास का रिविजन. ट्रंप ने इतिहास को अपडेट दिया. उन्होंने बताया कि विश्व युद्धों में अमेरिका अकेला लड़ा, शांति अकेले लाई, और दुनिया को सभ्य अकेले बनाया. किताबें शर्म से पन्ने पलटती रहीं. NATO के सदस्‍य देश अपनेआप को नए सिरे से अपडेट करने लगे.

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सातवें महीने में मित्र देशों को समझ आया कि दोस्ती का अर्थ बदल चुका है. दोस्त वही जो बिल भरे. बाकी सब फ्री-लोडर. पुराने गठबंधन अब 'बहुत पुराने' थे. और नए गठबंधन 'बहुत महंगे.' अब हर रिश्‍ते की कीमत थी. कोई टैरिफ से चुका रहा था, कोई गिफ्ट से, कोई पेट्रोल से, कोई हथियार खरीदकर तो कोई ट्रंप की क्रिप्‍टो कंपनी से समझौते करके. पाक‍िस्‍तान जैसे देश चापलूसी से ट्रंप के दिल में जगह बना रहे थे.

आठवां महीना सोशल मीडिया का रहा. ट्रंप के ट्वीट सूर्योदय से पहले उग आते. हर ट्वीट एक छोटा एटम बम था. कहीं इकोनॉमी हिलती, कहीं बाजार दौड़ते, राजदूत पसीना पोंछते. हर उथल-पुथल पर ट्रंप की हंसी और तंज आते. हर संदेश के आखिर में लिखा होता- 'थैंक यू फॉर योर अटेंशन.'

नौवें महीने में उन्होंने अपमान को कूटनीति का दर्जा दिया. देशों के नाम बिगाड़े. नेताओं के कद नापे. शिष्टाचार को ओल्ड फैशन कहा गया. डिप्‍लोमैटिक डिक्‍शनरी में नया शब्‍द जुड़ा- ट्रम्पिश. साल खत्‍म होते होते लगा यह शब्‍द 'फूलिश' जैसा तो ब‍िल्‍कुल नहीं है. बहुत सीरियस है ये.

दसवें महीने में जनता थक चुकी थी, पर शो चलता रहा. इकोनॉमी को एनर्जी ड्रिंक पिलाई गई. तुरंत उछाल, बाद में चक्कर. आलोचकों को 'हेटर', समर्थकों को 'पैट्रियट', और सच्चाई को 'फेक' कहा गया.

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ग्‍यारहवें महीने के अंत में ट्रंप ने साल का रिव्यू किया. बोले 'मैंने दुनिया को मजबूत बनाया.' दुनिया ने सिर दर्द की गोली ली. उन्होंने कहा 'सब डरते हैं.' दुनिया ने माना कि डरते हैं. भले यह कोई डार्क कॉमेडी लगे, लेकिन, सच वेनेजुएला की घेराबंदी जैसा डार्क था.

बारहवें महीने में आते आते ट्रंप ने अपना डंक दिखाया. और उनका विष सीधे वेनेजुएला के मदूरो और उनकी पत्‍नी को नीला कर गया. इंटरनेशनल लॉ डायनोसॉर जैसे जीवाश्‍म लग रहे थे. क्‍योंकि, ट्रंप कह रहे थे कि 'अपुन ही भगवान है.' अब ग्रीनलैंड कांप रहा है. सर्दी से नहीं, ट्रंप से. क्‍योंकि, अमेरिकी हवा डेनमार्क समेत यूरोप तक आ रही है. ग्रीनलैंड पर समझौता न करने के एवज में यूरोप के 8 देशों पर दस फीसदी टैरिफ लग चुका है. 25 फीसदी की चेतावनी दी चुकी है.

आज 20 जनवरी 2026 को ट्रंप अपने दूसरे राष्‍ट्रपति कार्यकाल की एनिवर्सरी सेलिब्रेट करेंगे. दुनिया के मन में सस्पेंस था कि उनके केक पर 'ईरान' लिखा होगा या ‘ग्रीनलैंड‘.

एक साल बाद निष्कर्ष यह नहीं कि क्या बदला, बल्कि यह कि क्या बचा. संस्थाएं जर्जर हैं. इंटरनेशनल इंस्‍टीट्यूशंस का वजन कम है, और धमकियों की कीमत ज्‍यादा. पर एक चीज स्पष्ट है कि जब राजनीति स्टैंड-अप कॉमेडी बन जाए और कॉमेडी डर पैदा करे, तो हंसी भी काली हो जाती है.

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डोनाल्ड ट्रंप का यह साल दुनिया के लिए कैलेंडर नहीं, अलार्म था. जो हर सुबह बजता रहा, यह याद दिलाने के लिए कि शोर भी शासन कर सकता है. और हम? हम कान बंद करके भी सुनते रहे.

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