डोनाल्ड ट्रंप के लिए टैरिफ कोई आर्थिक नीति नहीं, यह उनकी मेंटल स्टेट है. जैसे किसी को बहुत गुस्सा आता है, किसी को चाय पसंद है, वैसे ही ट्रंप के लिए टैरिफ है. उन्हें जब लगता है कि दुनिया उनकी बात ध्यान से नहीं सुन रही, तो वे आवाज़ ऊंची नहीं करते. सिर्फ इम्पोर्ट ड्यूटी (टैरिफ) बढ़ा देते हैं. यह उनका स्टाइल है, दुनिया को समझाने के लिए कि व्हाइट हाउस अब कूटनीति नहीं, कलेक्शन सेंटर का नाम है.
ट्रंप के सत्ता में आते ही यह साफ हो गया था कि वे राष्ट्रपति मल्टीलेटरलिज़्म नहीं मानते. वे दुनिया को अपने बराबर वाली सरकारों का समूह नहीं, एक बड़ा बाजार मानते हैं. जहां हर स्टॉल पर ‘अमेरिका फर्स्ट’ की रसीद टंगी है. जो मोलभाव करेगा, उसे थोड़ी रियायत मिलेगी. जो सवाल पूछेगा, उस पर और टैरिफ लगेगा. किसी भी बहाने से.
पहले साल में ट्रंप ने टैरिफ को उस तरह इस्तेमाल किया, जैसे ईस्ट इंडिया कंपनी ने कभी बंदूक और व्यापार को किया था. अंग्रेजों ने पहले व्यापार किया, फिर धमकी दी, और आखिर में शर्तें थोपीं. ट्रंप ने ये क्रम उल्टा कर दिया है. वे पहले शर्तें लादते हैं, फिर टैरिफ लगाते हैं और उसके बाद व्यापार की बात करते हैं. फर्क यह भी है कि पहले के दौर में ब्रिटेन से जहाज आते थे, अब अमेरिका से ट्वीट आते हैं. तब लाल कोट थे, अब लाल टाई है.
पूरा यूरोप ‘ग्रीनलैंड’ समान
अमेरिका के दशकों पुराने मित्र यूरोप को लेकर ट्रंप का ‘मूड स्विंग’ हो गया. यूरोप उन्हें ‘फ्री-राइडर’ लगने लगा. जर्मनी की कारें, फ्रांस की वाइन, स्टील और एल्युमिनियम सब पर टैरिफ की तलवार लटकने लगती हैं. नाटो की बैठकों में पहले डिफेंस पर खर्च की बात होती थी, अब इम्पोर्ट ड्यूटी की होती है. सालभर में इस दोस्ती का नया फॉर्मूला इजात हुआ है- या तो ज्यादा खरीदो, या ज्यादा टैरिफ चुकाओ.
यूरोप ने आनाकानी की तो उसे खामियाजा ग्रीनलैंड के सिर पर तनी अमेरिकी गन के रूप में भुगतना पड़ रहा है. ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप साफ इशारा कर चुके हैं या तो उसे बेचो, वरना मैं छीन लूंगा. सहमा सहमा यूरोप रहम मांग रहा है, लेकिन ट्रंप नहीं पिघल रहे हैं. शनिवार को ही उन्होंने यूरोप के 8 देशों पर 10 फीसदी टैरिफ लगाए हैं. यकीन जानिए, अब ट्रंप की नजर में पूरा यूरोप ग्रीनलैंड से कम नहीं है. वो कह ही चुके हैं कि सिर्फ ग्रीनलैंड ही नहीं, पूरे यूरोप की जिम्मेदारी अमेरिका ही निभाता आ रहा है. अमेरिका है तो नाटो है, वरना नाटो कुछ नहीं. यूरोप दम साधे ये सब सुन रहा है, देख रहा है.
चीन के लिए ‘पावर पॉइंट’ प्रजेंटेशन
चीन इनका पहला और सबसे बड़ा शिकार होता. क्योंकि अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी हुआ था. लेकिन, इसका दूसरा सीज़न ज्यादा आक्रामक और दिलचस्प ढंग से शुरू हुआ. चीन के लिए ट्रंप के पास कोई नीति नहीं थी, सिर्फ ‘पावर पॉइंट’ प्रेजेंटेशन था. यानी ताकत का खेल. ट्रंप ने कहा, चीन हमें लूट रहा है. समाधान? टैरिफ. जवाब में चीन ने भी टैरिफ लगाए. नतीजा यह हुआ कि दोनों तरफ कंज्यूमर महंगाई के साथ साथ राष्ट्रवाद खरीदने पर मजबूर हुए. ट्रंप ने इसे जीत बताया, क्योंकि उनके लिए जीत का मतलब होता है, दूसरे की हालत खराब होना, चाहे अपनी जेब भी हल्की हो जाए. भले अमेरिका में महंगाई बढ़ जाए, ट्रंप मानते हैं कि वे टैरिफ से अमीर हो रहे हैं. और वे इस अमीरी का इस्तेमाल अपनी सेना को और ताकतवर बनाने में कर रहे हैं.
ट्रंप की स्ट्रेटेजी में कोई पार्टनर नहीं
भारत, ब्राज़ील, दक्षिण कोरिया, कोई भी सुरक्षित नहीं था. ट्रंप की दुनिया में ‘स्ट्रैटेजिक पार्टनर’ जैसी कोई चीज़ नहीं थी. केवल दो कैटेगरी थीं- एक वो जो मान गए, और दूसरे वो जिन पर टैरिफ लगेगा. भारत को तो उन्होंने पहले 25 फीसदी टैरिफ और फिर उसके बाद रूस का तेल खरीदने पर बतौर जुर्माना 25 फीसदी टैरिफ और लादा. ट्रंप की टैरिफ को लेकर ये दीवानगी वेलकम मूवी वाले मजनू भाई से कम नहीं थी. हां, ट्रंप ने अपने इस एक साल में यह भी बताया कि उन्हें चमचागिरी भी खूब पसंद है. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ और आर्मी चीफ आसिम मुनीर जब ट्रंप की शान में कसीदे पढ़ते हैं तो उनकी मदमस्ती देखते ही बनती है. वे कतर के अमीर से डंके की चोट पर एक राजसी विमान गिफ्ट ले लेते हैं.
पड़ोसियों पर भी प्रकोप
पड़ोसी देश भी ट्रंप के टैरिफ ट्रामा से गुजर रहे हैं. कनाडा और मैक्सिको, जिनके साथ अमेरिका का दशकों पुराना फ्री ट्रेड एग्रीमेंट था, अचानक शक की नजर से देखे जाने लगे. ट्रंप ने कहा ये देश हमारे साथ अनफेयर कारोबार करते हैं. समाधान? टैरिफ, फिर नया समझौता, फिर अपनी प्रशंसा. यह ऐसा था जैसे पहले घर में आग लगाओ, फिर बाल्टी से पानी डालकर कहो- देखो, मैंने आग बुझाई. राष्ट्रपति बनने के बाद तो ट्रंप कनाडा को भी अमेरिका में शामिल होने का ऑफर दे रहे थे. ग्रीनलैंड की तरह. ट्रूडो की विदाई के बाद वे इस मामले में थोड़ा नरम जरूर पड़े हैं, लेकिन टैरिफ को लेकर नहीं.
इस पूरे दौर में टैरिफ सिर्फ आर्थिक ही नहीं रहा, यह राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक हथियार भी बन गया. ट्रंप जानते थे कि अनिश्चितता सबसे बड़ा डर है. इसलिए वे साफ नहीं बताते थे कि टैरिफ कब, कितना और किस पर लगेगा. बस संकेत देते थे. बाजार घबराते थे. सरकारें फोन उठाती थीं. और ट्रंप मुस्कुराते थे.
WTO हुआ असहाय और मूकदर्शक
अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इस खेल में बेबस दिखीं. विश्व व्यापार संगठन नियमों की किताब खोलता रहा, ट्रंप उसे ‘पुराना’ बताते रहे. नियम उनके लिए तब तक ठीक थे, जब तक वे अमेरिका के पक्ष में हों. वरना नियम भी टैरिफ की तरह ही थे. लचीले, अस्थायी और धमकी के लायक.
दुनिया के लिए यह संकट का दौर इसलिए था क्योंकि यह सिर्फ व्यापार का संकट नहीं था. यह भरोसे का संकट था. दशकों से बनी वैश्विक सप्लाई चेन हिलने लगी. कंपनियां निवेश रोकने लगीं. देश वैकल्पिक गठबंधनों की तलाश में जुट गए. यह वह क्षण था जब दुनिया ने पहली बार गंभीरता से सोचा कि क्या अमेरिका अब स्थिर शक्ति नहीं रहा?
ट्रंप खुद को ‘महान डीलमेकर’ कहते रहे, जबकि उनकी ज्यादातर डीलें डर पर टिकी थीं. मित्र हों या प्रतिद्वंद्वी, अमीर हों या गरीब. सबके लिए एक ही संदेश था- डील करो, वरना डील झेलो. इतिहास बताता है कि डर से बनी व्यवस्थाएं टिकाऊ नहीं होतीं. पर ट्रंप इतिहास नहीं पढ़ते, वे उसे रिवाइज करते हैं. एक साल में दुनिया पक चुकी है. हर देश यही चाहता है कि अगला ट्वीट उसके लिए न हो. यह ग्लोबल पॉलिटिक्स का वह दौर है, जब शांति का मतलब है- चलो, आज टैरिफ नहीं लगा.
धीरेंद्र राय