मुगलों से ज्यूडिशरी तक... NCERT की 'कंट्रोवर्सी बुक' में कैसे जुड़ते गए नए-नए चैप्टर

NCERT के जिम्मे एक अहम जिम्मेदारी है स्कूली सिलेबस और उसके हिसाब से बच्चों की किताबें तैयार करने की. टेक्स्टबुक पब्लिश करने वाले इस अहम महकमे के साथ हर सत्र में कुछ न कुछ विवाद जुड़ ही जाते हैं. और विवादों का यह साया, इस महकमे से जुड़े मानव संसाधन विकास मंत्रालय यानी HRD मिनिस्ट्री तक पहुंच जाता है.

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NCERT ने जूडिशरी पर विवादित चैप्टर छापकर यह साबित कर दिया कि उसकी प्रोसेस में गंभीर खामी है. NCERT ने जूडिशरी पर विवादित चैप्टर छापकर यह साबित कर दिया कि उसकी प्रोसेस में गंभीर खामी है.

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 26 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:59 PM IST

कहानी शुरू हुई एक चैप्टर से. या कहें कि हर बार ही शुरू होती है एक चैप्टर से. लेकिन, इस बार NCERT (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) ज्यूडिशरी को टच करके बुरा फंस गया. एक विवादित चैप्टर में न्यायपालिका में व्याप्त कथित भ्रष्टाचार, पेंडिंग केस जैसे नकारात्मक तथ्यों को एकतरफा रखा गया. 2026-27 के सत्र के लिए छापी गई आठवीं कक्षा की यह किताब जैसे ही इंटरनेट पर आई, बवाल मच गया. जैसा कि हर बार होता है, लेकिन इस बार सरकार NCERT के बचाव में नहीं आई. यहां तक यह भी खबर आई कि इस चैप्टर के बारे में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पता चला तो वे भी नाराज हुए थे.

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NCERT किताब के इस चैप्टर की शिकायत सीनियर वकील कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी खुद लेकर गए. वे CJI जस्टिस सूर्यकांत के सामने अपनी बातें रख ही रहे थे कि जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि वे इस मामले से अवगत हैं. उन्हें इस बारे में कई मैसेज और शिकायतें आई हैं. वे स्वतः संज्ञान लेकर इस मामले में यह आश्वस्त करेंगे कि कोई भी दोषी बख्शा न जाए. गुरुवार को खचाखच भरी कोर्ट में सरकार के पक्ष को सुनने के बाद चीफ जस्टिस ने जो आदेश दिया उससे स्पष्ट है कि वे इस मामले में नरम पड़ने वाले नहीं है.

NCERT बुक के ज्यूडिशरी चैप्टर पर CJI के आदेश की बड़ी बातें कुछ यूं हैं-

-विवादित कक्षा 8 की किताब पर पूरी तरह रोक. सभी छपी और डिजिटल प्रतियों की तत्काल जब्ती और हटाने का निर्देश.

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-किसी भी स्कूल, शिक्षक या संस्था को उस किताब से पढ़ाई न कराने का आदेश.

-NCERT के निदेशक और शिक्षा मंत्रालय के संबंधित सचिव को नोटिस जारी. पूछा गया कि क्यों न उनके खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाए.

-चैप्टर तैयार करने वाली समिति के सदस्यों के नाम, योग्यता और बैठक का रिकॉर्ड पेश करने को कहा गया. ताकि उनके खिलाफ कार्यवाही की जा सके.

राजनीति विज्ञान की किताबों में ज्यूडिशरी पर लिखा कंटेंट हमेशा संवेदनशील रहा है. पहले भी आपातकाल, कोलेजियम सिस्टम, और न्यायिक समीक्षा जैसे मुद्दों पर शब्दों की लड़ाई होती रही है. लेकिन यहां सवाल सिर्फ शब्दों का नहीं था. सवाल था मंशा का. और यहीं से NCERT की स्वायत्तता पर फिर उंगली उठी. इस विवाद के चलते मानव संसाधन विकास मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी माफी मांगी है. और यह भरोसा  दिलाया है कि इस मामले के दोषियों के प्रति सरकार सख्ती से कार्रवाई करेगी.

इतिहास की कटौती और राजनीतिक सरगर्मी

NCERT को लेकर जो कुछ हुआ, वह पहली बार नहीं था. इससे पहले इतिहास की किताबों में मुगल काल, गुजरात दंगों, आपातकाल और कुछ सामाजिक आंदोलनों से जुड़े हिस्सों में बदलाव हुए. महात्मा गांधी की हत्या से जुड़े कुछ संदर्भों को लेकर भी विवाद हुआ. 2022 और 2023 में कई अध्याय हटाए गए. सरकार ने कहा कि यह रूटीन अपडेट है. कोविड के बाद सिलेबस रेशनलाइजेशन था. बस्ते का बोझ कम करना था.

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आलोचकों ने कहा कि बोझ कम नहीं हुआ, असहज इतिहास कम हुआ.

NCERT ने तर्क दिया कि हर कुछ साल में पाठ्यक्रम की समीक्षा होती है. यह सामान्य प्रक्रिया है. लेकिन हर बदलाव के साथ राजनीतिक बयानबाजी भी बढ़ती गई. विपक्ष ने इसे इतिहास की नई व्याख्या कहा. सत्ता पक्ष ने इसे पाठ्यक्रम सुधार बताया.

स्वायत्त संस्था या सरकारी लाइन?

NCERT की स्थापना 1961 में हुई थी. मकसद था शिक्षा में शोध और पाठ्यक्रम विकास. इसे स्वायत्त संस्था का दर्जा मिला. मतलब यह कि यह अकादमिक आधार पर फैसले ले सके. लेकिन व्यवहार में यह हमेशा शिक्षा मंत्रालय के दायरे में रहा. फंडिंग सरकार से आती है. चेयरमैन और निदेशक की नियुक्ति सरकार करती है. ऐसे में हर दौर में यह सवाल उठा कि क्या NCERT सच में स्वतंत्र है.

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय भी इतिहास की किताबों में बदलाव को लेकर बड़ा विवाद हुआ था. तब वामपंथी इतिहासकारों ने आरोप लगाया कि पाठ्यक्रम का भगवाकरण हो रहा है. 2004 में सरकार बदली तो किताबें फिर बदलीं. तब कहा गया कि पहले का सिलेबस पक्षपाती था. यानी हर सरकार के साथ किताबों की भाषा बदलती रही. और NCERT बीच में खड़ा रहा.

अकादमिक बहस या राजनीतिक जंग?

स्कूल की किताबें नॉलेज ही नहीं देतीं. वे छात्रों का नजरिया गढ़ती हैं. इसलिए हर शब्द पर नजर रहती है. जब समाजशास्त्र की किताब में जाति पर चर्चा का तरीका बदला जाता है, तो सवाल उठता है. जब राजनीतिक विज्ञान में लोकतंत्र की चुनौतियों को नए फ्रेम में रखा जाता है, तो बहस होती है.

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NCERT का कहना है कि विशेषज्ञ समितियां तय करती हैं कि क्या पढ़ाया जाए? लेकिन इन समितियों के गठन पर भी सवाल उठते हैं. कौन विशेषज्ञ है? किस विचारधारा से है? क्या सभी तरह के मत वाले लोग शामिल हैं? यही वजह है कि संस्था अकादमिक मंच कम और राजनीतिक अखाड़ा ज्यादा दिखने लगती है.

HRD मंत्रियों पर भी विवादों का साया

जब भी पाठ्यक्रम पर विवाद हुआ, शिक्षा मंत्री पर भी सवाल आए. मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम अब शिक्षा मंत्रालय है, लेकिन विवादों की प्रकृति नहीं बदली. स्मृति ईरानी के दौर में भी पाठ्यक्रम और संस्थानों की नियुक्तियों पर तीखी बहस हुई थी. प्रकाश जावड़ेकर के समय में भी सिलेबस रिव्यू पर सवाल उठे. मौजूदा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के दौर में भी रेशनलाइजेशन और नई शिक्षा नीति को लेकर विरोध हुआ.

हर मंत्री ने कहा कि सुधार जरूरी है. हर विपक्ष ने कहा कि सुधार के नाम पर विचारधारा थोपी जा रही है. नतीजा यह हुआ कि NCERT का हर कदम मंत्री के बयान से जोड़ा जाने लगा. स्वायत्त संस्था की छवि धुंधली होती गई. 2020 की नई शिक्षा नीति के बाद NCERT पर दबाव और बढ़ा. नए फ्रेमवर्क के हिसाब से किताबें लिखनी थीं. स्किल बेस वाली एजुकेशन लानी थी. भारतीय ज्ञान परंपरा को शामिल करना था.

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यह एक बड़ा बदलाव था. लेकिन इसके साथ यह आशंका भी जुड़ी कि क्या अकादमिक स्वतंत्रता बनी रहेगी. NCERT ने नए राष्ट्रीय ढांचे का मसौदा जारी किया. सुझाव मांगे. लेकिन आलोचकों ने कहा कि असहमति की आवाजों को पर्याप्त जगह नहीं मिलती.

NCERT कंट्रोवर्सी की टेक्स्टबुक क्यों बनी?

आज हालत यह है कि NCERT का नाम आते ही लोग पूछते हैं, इस बार क्या हटाया गया. कौन सा अध्याय बदला गया. किस शब्द पर आपत्ति है. ज्यूडिशरी वाला अध्याय सिर्फ एक उदाहरण है. असली कहानी उन सालों की है, जब हर सरकार ने किताबों को अपनी प्राथमिकताओं के हिसाब से ढालने की कोशिश की. स्वायत्तता का दावा रहा. लेकिन राजनीतिक छाया भी साथ रही. इसलिए NCERT अब सिर्फ पाठ्यपुस्तक नहीं बनाता. वह खुद एक केस स्टडी बन गया है. लोकतंत्र में शिक्षा, सत्ता और विचारधारा के रिश्ते की केस स्टडी. जो अपने आप में कंट्रोवर्सी की टेक्स्टबुक है.

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