'लाडली लहर' ने लगाई शिवराज की नैया पार, कांग्रेस का ओवर कॉन्फिडेंस हार का गुनहगार!

कमलनाथ के मुकाबले शिवराज पूरे राज्य में पॉपुलर लीडर के तौर दिखाई दिए. विधायकों के खिलाफ जरूर लोकल एंटी इनकंबेंसी दिखी लेकिन जैसी बात की जा रही थी शिवराज के खिलाफ कोई सत्ता विरोधी लहर नहीं दिखाई दी. वहीं, प्रदेश में भाजपा ने अपने सभी पोस्टर्स-बैनर में मोदी के चेहरे को ही प्रमुखता दी.

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एमपी में बीजेपी को प्रचंड जीत एमपी में बीजेपी को प्रचंड जीत

अनुज खरे

  • नई दिल्ली,
  • 03 दिसंबर 2023,
  • अपडेटेड 1:13 PM IST

विधानसभा चुनावों में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में भाजपा को जोरदार जीत हासिल हुई वहीं, तेलंगाना में कांग्रेस ने सत्ता का खाता खोल लिया है. यह उम्मीद जताई जा रही थी कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस आएगी लेकिन तीनों राज्यों में भाजपा की जीत ने विश्लेषकों को जबर्दस्त तरीके से चौंका दिया है. आइए, जानते हैं कि आखिर इन नतीजों के पीछे किन फैक्टर्स का हाथ रहा. सबसे पहले मध्य प्रदेश पर डालते हैं एक नज़र...

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मामा को सत्ता में ले आईं 'लाडली बहनें'... 

1. लाडली बहनों को डायरेक्ट कैश ट्रांसफर से मिला फायदा
- लाडली बहना योजना के तहत शिवराज सरकार ने प्रदेश की एक करोड़ 31 लाख महिलाओं को हर महीने 1250 रुपए दिए. यह राशि डायरेक्ट उनके खाते में डाली गई. इसे बढ़ाकर 3 हजार रुपये तक करने की भी घोषणा की गई. ऐसा माना जा सकता है कि महिलाओं ने इसी योजना की बदौलत शिवराज सरकार के पक्ष में बढ़-चढ़कर मतदान किया. महिलाओं का भाजपा के पक्ष में किया गया, यही 4 फीसदी अतिरिक्त मतदान लगातार पिछड़ती दिखाई दे रही भाजपा को अंतिम क्षणों में इस योजना की बदौलत फ्रंट रनर बना गया. इस अकेले फैक्टर ने मध्य प्रदेश में चुनावों का परिणाम बदल दिया. इसके अलावा तीर्थदर्शन, लाडली लक्ष्मी...कन्यादान योजना...आयुष्मान योजना...और अधिकतर में डायरेक्ट बैंक ट्रांसफर का इंपैक्ट...इन सभी के सम्मिलित प्रभाव से जो अंडर करंट क्रिएट हुआ उसे कांग्रेस समझने में पूरी तरह नाकामयाब रही. उसे भरोसा था कि शिवराज सरकार के खिलाफ जनता में जो एंटी इनकंबेंसी पनप रही है वो उसे आसानी से सत्ता में ला देगी. यही ओवर कॉन्फिडेंस कांग्रेस पर भारी पड़ा.  

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2. धर्म-हिन्दुत्व का दांव, कर गया काम- भाजपा सरकारों का जोर हिन्दू धार्मिक स्थलों को आध्यात्मिकता के साथ साथ आधुनिकता का कलेवर देने पर रहा. उज्जैन कॉरिडोर इसी का उदाहरण है. इसके अलावा शिवराज ने राज्य के चार मंदिरों- सलकनपुर में देवीलोक, ओरछा में रामलोक, सागर में रविदास स्मारक और चित्रकूट में दिव्य वनवासी लोक के विस्तार और स्थापना के लिए 358 करोड़ रुपये का बजट दिया है. इन सभी योजनाओं ने हिन्दुत्व के पक्ष में माहौल बनाया, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिला. इसके अलावा कांग्रेस के जाति गणना वाले दांव के खिलाफ भाजपा की `हिन्दुत्व काट` बहुत सफल दिखाई दी. 

3. आरएसएस कैडर की सक्रियता, मिला नतीजा- मध्य प्रदेश आरएसएस का गढ़ रहा है. राज्य लंबे समय से हिदुत्व की प्रयोगशाला भी रहा है. पूरे राज्य में आरएसएस कैडर की बहुत पैठ है. लोगों को प्रभावित करने और अपने पक्ष के वोटरों को पोलिंग बूथ तक लाने में इस कैडर की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है. भाजपा के कांग्रेस से पीछे रह जाने की भविष्यवाणी के बाद यह कैडर जबर्दस्त तरीके से सक्रिय हुआ. इसकी सक्रियता की बदौलत गांव-शहर के भाजपा के परंपरागत वोटर बाहर निकले, जो लगातार हार की तरफ बढ़ती भाजपा को जीत दिलाने में कामयाब रहे. ऐसा माना जा सकता है कि यह पहली बार हुआ है कि आरएसएस कैडर ने लगभग पूरी तरह से भाजपा कार्यकर्ता बनकर ही काम किया. सामान्य तौर पर आरएसएस कैडर सीधे तौर पर इतनी राजनीतिक सक्रियता नहीं दिखाता है, बल्कि इनडायरेक्ट तरीके से वोटर को इन्फ्लूएंस करने का काम करता है.      

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4. आदिवासी वर्ग बना तारणहार- राज्य में आदिवासियों के लिए 47 सीटें आरक्षित हैं. पिछले चुनावों में जहां भाजपा को मात्र 16 सीटें मिली थीं वहीं, कांग्रेस 31 सीटें जीतने में कामयाब रही थी. इसी भरोसे 2018 में कांग्रेस की सरकार भी बनी थी. इसी से सबक लेते हुए शिवराज सरकार ने इस वर्ग के लिए योजनाओं की झड़ी लगा दी थी. बिरसा मुंडा जयंती, रानी कमलापति के नाम से भोपाल के हबीबगंज स्टेशन का नाम, टंट्या भील चौराहा, आदिवासी पंचायतों में पेसा एक्ट लागू करने जैसी योजनाओं पर लगातार काम किया गया. कांग्रेस यहां भी उनके परंपरागत समर्थन पर भरोसा करके बैठी रही. उसकी इस वर्ग में सक्रियता बहुत कम रही.

5. सही साबित हुआ केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों को उतारने का फैसला- मंत्रियों-सांसदों से उम्मीद की गई कि वे अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर आसपास की सीटों को भी जीतने में मदद करेंगे. एक्जिट पोल के रीजन वाइज़ परिणामों ने भी बताया कि जिन क्षेत्रों में इन्हें खड़ा किया गया वहां बहुत सी सीटों का परिणाम भाजपा के पक्ष में आया. यानी इन्हें खड़े करने का दांव काफी हद तक सफल माना जा सकता है. 

6. शिवराज का चेहरा, मोदी मैजिक चल गया- कमलनाथ के मुकाबले शिवराज पूरे राज्य में पॉपुलर लीडर के तौर दिखाई दिए. विधायकों के खिलाफ जरूर लोकल एंटी इनकंबेंसी दिखी लेकिन जैसी बात की जा रही थी शिवराज के खिलाफ कोई सत्ता विरोधी लहर नहीं दिखाई दी. वहीं, प्रदेश में भाजपा ने अपने सभी पोस्टर्स-बैनर में मोदी के चेहरे को ही प्रमुखता दी. पूरे चुनाव के दौरान  'एमपी के मन में मोदी और मोदी के मन में एमपी' स्लोगन गूंजता दिखाई दिया. कई राजनीतिक विश्लेषक लगातार यह कह रहे थे कि मोदी का मैजिक चुक गया है लेकिन परिणाम बता रहे हैं कि सभी फैक्टर्स पर मोदी का चेहरा भारी पड़ा. यानी आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा मोदी के चेहरे पर नए सिरे से एकजुट दिखाई देगी.

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7. कांग्रेस को ओवर कॉन्फिडेंस भारी पड़ा- कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की जोड़ी ने शुरुआती तौर पर तो कांग्रेस को बहुत बढ़त दिलाई लेकिन जैसे-जैसे कैंडिडेट डिक्लियर हुए...पानी उतरने लगा. शिवराज सरकार के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी और पुराने चेहरों के भरोसे कांग्रेस जीतने का दांव खेलने लगी. इसके अलावा पार्टी ने जो सर्वे भी करवाए उनमें लगातार कांग्रेस की प्रचंड जीत की बात की जाती रही...इस वजह से कांग्रेस ग्राउंड में वोटर के साथ कनेक्ट करने की जगह ओवर कॉन्फिडेंस का शिकार होकर ऊपरी तौर पर सक्रिय नजर आई, जबकि भाजपा फीडबैक के आधार पर लगातार अपने प्रदर्शन में सुधार करती दिखाई दी. उसने `गैप फिल` करने में बहुत तेजी दिखाई. इसके अलावा टिकट बंटवारे में जिस तरह से बड़े नेताओं पर फेवरेटिज्म के आरोप लगे...उससे भी कांग्रेस के पक्ष में बना माहौल वीक कैंडिडेट की वजह से कमजोर पड़ता चला गया. 
 
8. शिवराज की इमोशनल अपील काम आई- इस चुनाव में बीजेपी ने मध्यप्रदेश में शिवराज को बतौर सीएम कैंडिडेट नहीं उतारा है. चुनाव प्रचार के दौरान इस बात के कयास लगाये जा रहे हैं... अगर एमपी में बीजेपी जीतती भी है तो शिवराज सीएम नहीं बनेंगे. इससे ये संदेश गया कि शिवराज की स्थिति कमजोर है. लेकिन इस मुद्दे पर शिवराज इमोशनल कार्ड खेल...  गए. शिवराज ने प्रचार के दौरान साफ साफ मतदाताओं-महिलाओं से पूछा कि क्या आप नहीं चाहते हैं कि आपका मामा, आपका भाई मुख्यमंत्री बने?  शिवराज के इस सवाल पर वोटर्स ने भारी शोर के साथ उनके पक्ष में जवाब दिया. अब तो आंकड़े ये भी बता रहे हैं कि न सिर्फ मतदाताओं ने जवाब दिया, बल्कि शिवराज को भारी वोट दिया.

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9. काउंटर पोलराइजेशन का `ट्रंप`- कांग्रेस ने मुस्लिम वोट बैंक को पाले में लाने में पूरा जोर लगाया. जिसकी प्रतिक्रिया में भाजपा ने काउंटर पोलराइजेशन पर काम किया. जहां जिन सीटों पर मुस्लिम वोट खासी संख्या में थे, वहां बीजेपी जबर्दस्त तरीके से काउंटर पोलराजेशन करने में सफल रही. कार्यकर्ताओं और कैडर के जरिये लगातार `मुस्लिम पोलराजेशन` के मैसेज को आगे बढ़ाया गया. लोगों के मन में यह बात बैठा दी गई कि यहां मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के कारण भाजपा कैंडिडेट हार सकता है. इससे हिन्दू वोटों के पोलराइजेशन में मदद मिली. नजदीकी मुकाबले वाली कई सीटों का परिणाम इसी के चलते बदल गया.

लोकसभा के नजरिये से इस चुनाव में क्या निकला?

1.बीजेपी के लिए तीन राज्यों में इस जीत का क्या मायना होगा?

मोदी मैजिक पर मुहर...मोरल बूस्टअप...

तीन हिंदी राज्यों में जीत हासिल करना बीजेपी के लिए बड़ी उपलब्धि होगी. मध्य प्रदेश जहां लगातार उसकी बुरी हार की भविष्यवाणी की जा रही थी...राजस्थान में उसके पास सीएम फेस तक नहीं था. छ्त्तीसगढ़ जहां भूपेश बघेल की जीत तय मानी जा रही थी. ऐसी स्थिति में जीत हासिल करना बीजेपी के लिए जबर्दस्त तरीके से मोरल बूस्टअप का काम करेगी वहीं, मोदी मैजिक पर मुहर भी लगेगी. बीजेपी ने सभी राज्यों के चुनाव में मोदी का चेहरा ही आगे रखा था, इसलिए यह माना जा सकता है कि मोदी मैजिक अभी बना हुआ है. लोकसभा के नजरिये से भी माहौल बनेगा. मोदी सरकार के खिलाफ भी एंटी इनकंबेंसी जैसी बातें खारिज होंगी.

यानी- मोदी निर्विवादित तौर पर सुप्रीम लीडर के रोल में दिखाई देते रहेंगे.
 
2. तेलंगाना की जीत का राहुल को फायदा मिलेगा? 

हां, निश्चित तौर पर...लेकिन दो हिन्दी राज्यों की हार से वो हैसियत नहीं बनेगी जो उन्हें मोदी के मुकाबले सीधी स्वीकार्यता दिलाती...लेकिन फिर भी ब्रॉन्ड राहुल मजबूत तो होगा ही...भारत जोड़ो यात्रा के बाद राहुल लगातार जनता में अपनी एक्सेप्टेबिलिटी के लिए कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं. तेलंगाना की जीत उनकी दक्षिणी राज्यों में स्वीकार्यता बढ़ाएगी. लेकिन हिन्दी राज्यों में हार इंडिया अलायंस में कांग्रेस की स्थिति थोड़ी कमजोर करेगी। ममता-नीतीश कुमार भी उन्हें उतनी तवज्जो नहीं देंगे जो राजस्थान, मप्र या छत्तीसगढ़ की जीत से मिलती. 

यानी- कह सकते हैं कि उत्तरी भारत में राहुल का स्ट्रगल जारी रहेगा.

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3. तेलंगाना का नतीजा क्या कहता है?

तेलंगाना में पूरा चुनाव कर्नाटक की टीम ने ही लड़ा था. तरीके भी कर्नाटक वाले ही अपनाए गए थे. पूरा चुनाव प्रबंधन आगे के चुनावों में दोहराया जा सकता है. कर्नाटक में जिन तरीकों से सफलता मिली है उन पर आगे भी काम किया जा सकता है. तेलंगाना मजबूत राज्य है तो वहां से पार्टी के लिए अच्छा-खासा फंड भी मिलेगा. जो पार्टी के लिए बहुत फायदेमंद साबित होगा.

यानी- कर्नाटक मॉडल कांग्रेस को आगे काम आएगा. फंड से पार्टी की आर्थिक सेहत बेहतर बनेगी. 

4. क्या विधानसभा चुनाव परिणाम लोकसभा के लिए इंडिकेटर हो सकते हैं?

शायद हां या नहीं भी...
मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ ने पिछली बार विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने जीत हासिल की थी जबकि लोकसभा में भाजपा ने क्लीन स्वीप कर दिया था. इसी तरह तेलंगाना में केसीआर की पार्टी बीआरएस ने दोनों ही चुनावों में एकतरफा जीत पाई थी. यानी दोनों चुनावों से कोई ठोस इंडिकेशन निकालना रिस्की हो सकता है. हां, यह बात अलग है कि विधानसभा चुनाव की जीत कार्यकर्ताओं में जोश-जज्बा भरती है. जनता में माहौल बनता है. एक नैरेटिव बनाने में मदद मिल सकती है. अंडर करंट पैदा होता है. फ्लोटिंग वोटर्स को प्रभावित करने में मदद मिलती है.

यानी- विधानसभा चुनाव परिणाम के आधार पर लोकसभा चुनावों की बहुत सटीक भविष्यवाणी संभव नहीं हो सकती है.

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5. छोटी पार्टियों के भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा? 
मप्र में गोड़वाना गणतंत्र पार्टी, जय आदिवासी युवा शक्ति(जयेस), राजस्थान में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी), ट्राइबल पार्टी जैसी पार्टियों ने चुनाव लड़ा था. कई जगह इन्हें किंग मेकर माना जा रहा था। तो कई जगह इन पार्टियों को वोट काटने वाली पार्टी का दर्जा दिया जा रहा था. इन चुनावों में छोटी पार्टियों का परफॉर्मेंस बता रहा है कि अभी इन्हें काफी काम करने की जरूरत है. यह तो माना जा सकता है कि ये पार्टियां एक सीमित क्षेत्र में प्रभावी  हो सकती हैं लेकिन परिणाम को सीधे तौर पर प्रभावित करने की हैसियत नहीं रखती हैं. 

यानी- इन्हें छोटी पार्टियों को पहले अपने आधार का विस्तार करने और लीडरशिप को डवलप करने की जरूरत होगी. यह भी समझने की जरूरत होगी कि यदि वोटर बेस छोटा होगा और नीतियां किसी खास वर्ग-जाति तक सीमित होंगी तो पॉलिटिकल पावर बनने में दिक्कत आएगी.

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