2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस का स्लोगन था, 'खेला होबे!' और व्हील चेयर पर बैठकर ममता बनर्जी अपने समर्थकों को यही नारा बोलकर सत्ता में वापसी का भरोसा दिलाती थीं. चुनाव कैंपेन के दौरान ममता बनर्जी लोगों से कहती थीं, एक पैर से बंगाल जीतेंगे, और दोनों पैर से दिल्ली. बंगाल तो जीत गईं, लेकिन ममता बनर्जी के लिए दिल्ली अब तक दूर ही है.
ममता बनर्जी ने अपने दम पर तृणमूल कांग्रेस को तो बहुमत दिला दिया, लेकिन नंदीग्राम में बीजेपी के शुभेंदु अधिकारी से खुद चुनाव हार गईं. शुभेंदु अधिकारी 2026 के चुनाव में भवानीपुर पहुंचकर ममता बनर्जी को चुनाव मैदान में चुनौती दे रहे हैं. ममता बनर्जी फिलहाल भवानीपुर से, और शुभेंदु अधिकारी नंदीग्राम से विधायक हैं. और, इस बार शुभेंदु अधिकारी दो सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं.
खेला होबे का नारा देने का श्रेय देबांग्शु भट्टाचार्य को दिया जाता है, जो अभी तृणमूल कांग्रेस के आईटी सेल के हेड हैं. पांच साल पहले वाले कैंपेन में देबांग्शु भट्टाचार्य ने काफी बदलाव किया है, और ममता बनर्जी को एक बार फिर मुख्यमंत्री बनवाने के लिए प्रयासरत हैं.
कैसा चल रहा है प्रमोशन
अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में तृणमूल कांग्रेस के सोशल मीडिया कैंपेन पर एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है. रिपोर्ट के मुताबिक, देबांग्शु भट्टाचार्य बीजेपी से नए दौर और बदले हालात में मुकाबले की रणनीति पर काम कर रहे हैं. फर्क यह है कि इस बार ममता बनर्जी के कैंपेन में प्रशांत किशोर नहीं हैं - जबकि कैंपेन संभाल रही संस्था आईपैक के संस्थापक प्रशांत किशोर ही हैं.
1. एक मोबाइल ऐप बना है, 'दीदीर दूत'. 2020 में बनाए गए इस ऐप के 18 लाख से ज्यादा डाउनलोड किए जाने का दावा किया जा रहा है. टीएमसी कार्यकर्ताओं और समर्थकों को जोड़ने के मकसद से बनाए गए दीदीर दूत ऐप में करीब 1.3 लाख डेली एक्टिव यूजर हैं.
2. टीएमसी सूत्र बताते हैं, सोशल मीडिया इकोसिस्टम अब 10,000 से ज्यादा रील्स और शॉर्ट वीडियो बनाता है. वीडियो में ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के भाषण, टीएमसी की सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के अनुभव और विपक्ष के नैरेटिव का जवाब देने वाला कंटेंट शामिल होता है.
3. वॉलंटियर का भी एक नेटवर्क है, आमी बांगलार डिजिटल जोद्धा. डिजिटल जोद्धा के 1.6 लाख सक्रिय सदस्य बताए जाते हैं, जो अलग अलग जिलों में तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाते हैं. यह वॉलंटियर कैंपेन वोटर तक मैसेज पहुंचाने, राजनीतिक घटनाओं पर तत्काल रिएक्ट करने और सोशल मीडिया पर प्रचार मैटीरियल पहुंचाने में मददगार होते हैं.
4. टीएमसी के सोशल मीडिया इकोसिस्टम में 5,000 से ज्यादा इन्फ्लुएंसर्स का नेटवर्क भी जोड़ा गया है, जो टीएमसी के कोर नेटवर्क से इतर भी राजनीतिक कंटेंट बनाते और शेयर करते हैं. एक 'कमेंट्स आर्मी' भी है जो जरूरत के हिसाब से प्रतिक्रिया के रूप में प्रचार करती है. बताते हैं, 50 से ज्यादा डिजिटल प्रवक्ता भी बनाए गए हैं. डिजिटल प्रवक्ता मुद्दों पर आधारित वीडियो और टिप्पणी तैयार करते हैं, जिनकी बदौलत किसी भी राजनीतिक एजेंडे पर प्रतिक्रिया दी जा सके.
5. तृणमूल कांग्रेस के कैंपेन में इस बार भी बीजेपी को बाहरी ही बताने की कोशिश है, लेकिन तरीका सीधे सीधे बोलने से अलग है. 'बांग्ला विरोधी' अभियान और 'बंगाल की फिक्र बनाम बंगाल पर कब्जा' जैसे अभियान के तहत लोगों के सामने बंगाल के भविष्य का खाका खींचने की कोशिश होती है - और समझाने की कोशिश होती है, अगर वे सत्ता में आ गए तो क्या होगा?
6. कैंपेन के लिए एक मल्टी लेवल इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया गया है, जिसका आधार व्हास्टऐप के नेटवर्क पर टिका है. टीएमसी नेताओं के हवाले से दी गई रिपोर्ट के मुताबिक, कैंपेन नेटवर्क से पूरे पश्चिम बंगाल में 1.5 लाख से ज्यादा ग्रुप और एक करोड़ से ज्यादा मेंबर शामिल - ताकि, अभियान से जुड़ा मैटीरियल टार्गेट करके तेजी से पहुंचाया जा सके.
7. तृणमूल कांग्रेस ने हाल के दिनों में बीजेपी के सेंट्रलाइज्ड डिजिटल मैसेजिंग से मुकाबले के लिए, अपना विकेंद्रीकृत डिजिटल इकोसिस्टम भी बना रखा है. कल्याणकारी योजनाओं के प्रचार प्रसार में भी यही तरीके अपनाए जाते हैं.
बीजेपी को ऐसे काउंटर कर रही है टीएमसी
1. टीएमसी के आईटी सेल चीफ देबांग्शु भट्टाचार्य बताते हैं, हमारी रणनीति सिंपल है... हम सच बता रहे हैं, और वे (बीजेपी) झूठ फैला रहे हैं... हमारे कार्यकर्ता जमीन पर और ऑनलाइन दोनों जगह सक्रिय हैं - सड़क से लेकर इंटरनेट तक.
देबांग्शु भट्टाचार्य का आरोप है कि बंगाल को टार्गेट कर बीजेपी की डिजिटल गतिविधियों का बड़ा हिस्सा पश्चिम बंगाल से बाहर बैठे लोग चला रहे हैं. देबांग्शु भट्टाचार्य के मुताबिक, वे बॉट्स की तरह काम करते हैं.
2. बीजेपी के कैंपेन को लेकर देबांग्शु भट्टाचार्य कहते हैं, वे बंगाल की योजनाओं की आलोचना करते हैं, लेकिन दूसरे राज्यों में वैसी ही योजनाएं लाने का वादा करते हैं. ऐसे में टीएमसी के कैंपेन में कोशिश होती है कि लोगों को बीजेपी का डबल स्टैंडर्ड लोगों को समझाया जा सके.
लगे हाथ तुलना करके लोगों को यह बताने की भी कोशिश होती है कि कैसे ममता बनर्जी के राजनीतिक विरोधी भी तृणमूल कांग्रेस की नीतियां अपनाने लगे हैं.
3. विचारधारा और संगठन के स्तर से आगे बढ़कर टीएमसी के नेता कैंपेन में भावनात्मक पहलू पर ज्यादा जोर देते हैं. मसलन, बीजेपी नेताओं के भाषण में लगातार घुसपैठिया जैसे शब्दों का इस्तेमाल होता है, और जवाबी हमले के लिए टीएमसी बंगाली अस्मिता और बंगाल के लोगों के सम्मान की बात करती है - हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सबसे बड़ा घुसपैठिया बताया था.
क्या प्रशांत किशोर बंगाल चुनाव से पूरी तरह कटे हुए हैं
2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान प्रशांत किशोर ने दावा किया था कि अगर बीजेपी 100 सीटों का आंकड़ा पार कर गई, तो वो चुनाव रणनीति का काम छोड़ देंगे. रिजल्ट आया तो मालूम हुआ, बीजेपी विधानसभा की 77 सीटों पर ही सिमट गई थी - और उसी दौरान प्रशांत किशोर ने ऐलान कर दिया कि आगे से चुनाव रणनीति तैयार करने का काम नहीं करेंगे.
प्रशांत किशोर उसके बाद बिहार पहुंच गए, और जन सुराज अभियान शुरू किए. उपचुनाव से शुरू कर विधानसभा का चुनाव भी लड़े, लेकिन एक भी सीट नहीं मिल सकी. दिल्ली में कुछ बड़ी मुलाकातों के बाद माना जा रहा था कि प्रशांत किशोर नए सिरे से पुराना काम कर सकते हैं, लेकिन प्रशांत किशोर फिर से बिहार में घूम घूम कर लोगों से मिल रहे हैं, और अपनी बात समझाने की कोशिश कर रहे हैं?
प्रशांत किशोर तो नहीं हैं, लेकिन उनकी बनाई हुई संस्था आईपैक यानी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी ही ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस का चुनाव कैंपेन संभाल रही है. आईपैक के दफ्तर पर प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हस्तक्षेप का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है.
जब कोलकाता में आईपैक के दफ्तर पर छापा पड़ा तो ममता बनर्जी मौके पर पहुंच गईं, और वहां से फाइल लेकर आ गईं थीं. सुप्रीम कोर्ट में ईडी ने जब ममता बनर्जी और पश्चिम बंगाल के आला पुलिस अधिकारियों के खिलाफ याचिका दायर की, तो ममता बनर्जी की तरफ से भी कैविएट दाखिल की गई.
हाल ही में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी के मौके पर जाने को लेकर कहा था कि यह कोई खुशगवार स्थिति नहीं है. सुप्रीम कोर्ट का कहना था, अगर कल कोई दूसरा मुख्यमंत्री भी ईडी की रेड में घुस जाए तो क्या एजेंसी को यूं ही छोड़ दिया जाए?
ममता बनर्जी के कैंपेन में प्रशांत किशोर भले मौजूद नजर न आ रहे हों, लेकिन उनकी बनाई संस्था आईपैक में उनका शैडो तो महसूस किया ही जा सकता है - कम से कम 4 मई तक तो ऐसा ही है.
मृगांक शेखर