केरलम की राजनीति इस वक्त बड़े बदलाव के मोड़ पर खड़ी है. दस साल से सत्ता में बैठी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार का किला ढह गया है और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की अगुवाई में कांग्रेस की वापसी तय है. 140 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF को करीब सौ सीटें मिलती दिख रही हैं. जिसमें से कांग्रेस अकेले दम बहुमत के करीब पहुंचती दिख रही है. लेकिन यह जीत जितनी साफ दिखती है, उसके बाद की तस्वीर उतनी ही जटिल है. वजह यह है कि सरकार बनने से पहले ही कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर गहमागहमी तेज हो चुकी थी. यानी, चुनावी जंग जीतने के बाद अब पार्टी के भीतर की जंग शुरू हो गई है.
केरलम कांग्रेस में खुलकर भले बयानबाजी कम दिखी हो, लेकिन अंदरखाने लॉबिंग पूरी रफ्तार में हुई. 9 अप्रैल को हुई वोटिंग के बाद से हर खेमे ने अपने-अपने तरीके से ताकत दिखानी शुरू कर दी थी. कोई संभावित विधायकों की गिनती जुटाने में लगा, तो कोई दिल्ली दरबार में अपनी पकड़ मजबूत करता रहा. इस पूरी कवायद में जातीय समीकरण, क्षेत्रीय संतुलन और संगठनात्मक पकड़ जैसे फैक्टर भी अहम भूमिका निभा रहे हैं. यही वजह है कि सीएम का सवाल अब सिर्फ एक नाम का नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक गणित का बन गया है.
वीडी सतीशन: जमीनी पकड़, लेकिन हाईकमान की कसौटी?
वीडी सतीशन को इस वक्त सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है. विपक्ष के नेता के तौर पर उन्होंने लेफ्ट सरकार के खिलाफ आक्रामक भूमिका निभाई और खुद को एक प्रभावी चेहरा साबित किया. उनके पास ग्राउंड कनेक्शन है और विधायकों का एक वर्ग उनके साथ खड़ा दिखता है. लेकिन कांग्रेस की राजनीति में सिर्फ जमीनी ताकत काफी नहीं होती, यहां हाईकमान की मंजूरी सबसे बड़ा फैक्टर बन जाती है. यही वजह है कि सतीशन की दावेदारी मजबूत होते हुए भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं कही जा सकती. वैसे ही जैसे सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य जैसे नेता जमीनी पकड़ होने के बावजूद सत्ता की लड़ाई में हाशिये पर ही रहे.
केसी वेणुगोपाल: दिल्ली कनेक्शन और एक्टिव लॉबिंग
केसी वेणुगोपाल का नाम इस पूरी दौड़ में तेजी से उभरा है और इसके पीछे सिर्फ उनका पद नहीं, बल्कि उनके पक्ष में चल रही मजबूत लॉबिंग भी है. वे राहुल गांधी के खासमखास हैं. राईट हैंड मैन. सिर्फ केरलम ही नहीं, उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में भी कांग्रेस का अहम पिलर माना जाता है. लेकिन, केरलम चुनाव की सरगर्मी शुरू होने के साथ वे अचानक स्थानीय राजनीति भी खूब दिलचस्पी लेते नजर आए. पिछले दिनों केरलम कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के सुधाकरन ने उनके समर्थन में खुलकर लिखा. कि क्यों केरलम को वेणुगोपाल जैसा नेता 'सर्वोच्च पद' पर चाहिए. सुधाकरन लगातार वेणुगोपाल के पक्ष में राजनीतिक संदेश देने और समर्थन जुटाने की कोशिश में लगे हैं.
वेणुगोपाल की ताकत उनका हाईकमान से करीबी रिश्ता और संगठन पर पकड़ है. लेकिन उनके सामने चुनौती यह है कि राज्य स्तर पर उनकी जनस्वीकार्यता को लेकर सवाल उठते रहे हैं. इसके बावजूद, जिस तरह से उनके लिए लॉबिंग होती रही है, उसने इस मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है.
रमेश चेन्निथला : अनुभव का दावा, लेकिन बदलते समय की चुनौती
रमेश चेन्निथला के पास अनुभव की पूंजी है और वे लंबे समय से केरलम कांग्रेस की राजनीति के केंद्र में रहे हैं. लेकिन पार्टी के भीतर अब एक बड़ा तबका नेतृत्व में बदलाव चाहता है. यही वजह है कि चेन्निथला का नाम मजबूत होने के बावजूद उत्साह कम दिखता है. फिर भी, अगर खेमों के बीच सहमति नहीं बनती, तो वे एक ऐसे चेहरे के तौर पर सामने आ सकते हैं, जो सभी पक्षों को स्वीकार्य हो.
शशि थरूर : रेस से बाहर, लेकिन नजर सबसे तेज
इस पूरी सीएम रेस में एक दिलचस्प नाम है शशि थरूर. खास बात यह है कि उनका नाम मुख्यमंत्री पद की दौड़ में कहीं नजर नहीं आता. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे इस पूरी प्रक्रिया से दूर हैं. पार्टी के फैसलों पर उनकी पैनी नजर हमेशा रहती है और उनके तीखे बयान और कटाक्ष राजनीतिक माहौल को प्रभावित करते रहे हैं. ऐसे में यह तय माना जा रहा है कि सीएम के फैसले के बाद उनकी प्रतिक्रिया और टिप्पणियां खास चर्चा का विषय बनेंगी.
गुटबाजी का पुराना इतिहास, फिर वही कहानी
केरलम में कांग्रेस की राजनीति हमेशा से गुटों में बंटी रही है. अलग-अलग नेताओं के अपने-अपने खेमे और प्रभाव क्षेत्र रहे हैं. यह गुटबाजी कई बार खुलकर सामने आई है और पार्टी को नुकसान भी पहुंचा चुकी है. इस बार भी वही पुरानी कहानी दोहराती दिख रही है, फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार दांव पर सत्ता है. ऐसे में हर खेमे की कोशिश है कि उसका नेता ही मुख्यमंत्री बने, जिससे खींचतान और तेज हो गई है.
कांग्रेस का पैटर्न: जीत के बाद बढ़ती तकरार
कांग्रेस का हालिया इतिहास बताता है कि चुनाव जीतने के बाद पार्टी के भीतर संघर्ष तेज हो जाता है. मध्यप्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच टकराव ने सरकार गिरा दी और पार्टी भी टूट गई. राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच खींचतान लंबे समय तक चली. छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और टीएस सिंह देव के बीच सत्ता संतुलन को लेकर विवाद बना रहा. कर्नाटक में सिद्दारमैया और डीके शिवकुमार के बीच समझौता कराने में पार्टी को काफी मशक्कत करनी पड़ी. इन उदाहरणों से साफ है कि कांग्रेस के लिए असली चुनौती चुनाव जीतना नहीं, बल्कि जीत के बाद पार्टी को एकजुट रखना है.
केरलम में कांग्रेस के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि मुख्यमंत्री का फैसला कैसे और कितनी जल्दी लिया जाता है. अगर यह फैसला संतुलन के साथ लिया गया, तो यह जीत स्थिर सरकार में बदल सकती है. लेकिन अगर गुटबाजी हावी रही, तो यही जीत अस्थिरता का कारण बन सकती है.
आखिरकार, केरलम में कांग्रेस के लिए यह सिर्फ सत्ता में वापसी नहीं, बल्कि अपनी अंदरूनी राजनीति को संभालने की असली परीक्षा है और इस परीक्षा में कामयाबी ही उसकी सबसे बड़ी जीत होगी.
धीरेंद्र राय