बिहार में सत्ता के हस्तांतरण की प्रक्रिया धीरे धीरे चल रही है. धीरे धीरे काम होने में ही नीतीश कुमार यकीन भी रखते हैं. धीरे धीरे काम होता है तो अच्छा होता है, ऐसा उनका मानना रहा है.
2015 में जब जनता परिवार के विलय की कोशिश हो रही थी, तब नीतीश कुमार ने कबीर के दोहे के माध्यम से कहा भी था, ‘धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आये तब फल होय.'
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उसी साल हुए विधानसभा चुनाव के दौरान भी यही दोहा बार बार दोहराते रहे. तब नीतीश कुमार ने कहा था, 'बहुत सी बातें आती रहेंगी और काम धीरे-धीरे अपने समय पर होता रहेगा. धैर्य की जरूरत है. सब कुछ ठीक रास्ते पर चल रहा है. परेशानी की कोई बात नहीं है.'
नीतीश कुमार के मुंह से कबीर का दोहा हाल फिलहाल तो सुनने को नहीं मिला है, लेकिन उनके हाव भाव वही बातें बता रहे हैं. असल में, नीतीश कुमार को जो कहना था वो सब राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करने से पहले सोशल मीडिया पर कह दिया था. मजमून भले ही किसी और का हो, लेकिन दस्तखत तो नीतीश कुमार के ही थे - और वे बातें सुनकर जेडीयू कार्यकर्ताओं ने जो विरोध जताया था, सिलसिला तो थमा नहीं लगता. खामोशी का मतलब यह तो नहीं होता कि आवाजें भी बंद हो गई हैं.
त्यागी का मामला जेडीयू से आने वाला पहला रुझान है
जनवरी, 2026 में ही पक्का हो गया था कि केसी त्यागी का जेडीयू से क्या रिश्ता रह गया है. असल में, केसी त्यागी ने नीतीश कुमार को भारत रत्न देने की मांग की थी. केसी त्यागी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर यह मांग की थी. केसी त्यागी ने लिखा था, जैसे पिछले साल चौधरी चरण सिंह और कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न की उपाधि से नवाजा गया, नीतीश कुमार भी इसके पूरी तरह हकदार हैं.
जेडीयू की तरफ से केसी त्यागी की मांग को निजी राय करार दिया गया. जेडीयू प्रवक्ता राजीव रंजन का कहना था, 'केसी त्यागी की मांग का पार्टी के आधिकारिक स्टैंड से कोई लेना नहीं है... वह जेडीयू के साथ हैं या नहीं, पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को यह भी पता नहीं है. इसलिए उनके बयानों को और उनकी विज्ञप्ति को उनकी निजी क्षमता में दिए गए बयान के तौर पर लेना चाहिए.'
17 मार्च को केसी त्यागी ने जेडीयू प्रवक्ता की बात को सही करार दिया. और, एक प्रेस रिलीज के माध्यम से अपना स्टैंड भी साफ कर दिया, 'जेडीयू का गठन 30 अक्टूबर, 2003 को समता पार्टी और जनता दल के विलय से हुआ था. जॉर्ज फर्नांडिस अध्यक्ष थे, और मैं पार्टी का महासचिव था. मैंने शरद यादव जी और नीतीश कुमार जी के साथ काम किया, जब वे मेरे अध्यक्ष थे. मैं मुख्य महासचिव, मुख्य प्रवक्ता और राजनीतिक सलाहकार के रूप में काम करता रहा. अब पार्टी का सदस्यता अभियान खत्म हो गया है. इस बार मैंने पार्टी की सदस्यता का नवीनीकरण नहीं कराया है.'
केसी त्यागी ने अपना पक्ष रखा है, 'नीतीश कुमार के साथ मेरा 50 साल पुराना रिश्ता है. जयप्रकाश जी के आंदोलन में, फिर जनता पार्टी, लोक दल और उसके बाद कर्पूरी ठाकुर जी के नेतृत्व में हमने साथ मिलकर राजनीति की. मैंने इस्तीफा नहीं दिया है, मैंने पार्टी के सदस्यता अभियान में हिस्सा नहीं लिया है.'
और इस तरह केसी त्यागी ने अपना रास्ता अलग कर लिया है. निश्चित तौर पर नीतीश कुमार के बाद नए खांचे में ढल पाना केसी त्यागी के लिए काफी मुश्किल है. आगे की रणनीति के बारे में भी संकेत दे दिया है, '22 मार्च को मेरे कुछ शुभचिंतक दिल्ली में कुछ साथियों को इकट्ठा करेंगे, हम बैठकर अपनी नई भूमिका की घोषणा करेंगे.'
केसी त्यागी ने राज्यसभा न भेजे जाने को लेकर किसी भी नाराजगी से इनकार किया है. कहते हैं, सवाल ही पैदा नहीं होता है. एक भी उदाहरण नहीं है कि राज्यसभा टिकट के लिए प्रयास किया हो. 2013 में भी नीतीश कुमार ने मुझे घर से बुलाकर टिकट दिया था.
2024 में फिलिस्तीन मुद्दे पर केसी त्यागी ने भारत सरकार के आधिकारिक रुख से अलग स्टैंड लिया था. केसी त्यागी केंद्र सरकार के खिलाफ एक संयुक्त बयान के पक्ष में खड़े दिखाई दिए थे. जेडीयू ने केसी त्यागी के रुख से दूरी बना ली. नीतीश कुमार ने खामोशी अख्तियार कर ली - और यह केसी त्यागी सहित जेडीयू नेताओं के लिए भी संदेश था.
दिल्ली जाकर तो बिहार से दूर हो जाएंगे
2014 से पहले बीजेपी का साथ छोड़ देने और आम चुनाव में खुद को आजमाने के बाद नीतीश कुमार ने विपक्षी एकता को भी तौलने की कोशिश की थी. 2015 से शुरू हुई यह कोशिश 2024 की शुरुआत तक कई चरणों में जारी रही - और आखिरकार नीतीश कुमार को बीजेपी नेतृत्व के आगे हथियार डाल देने को मजबूर होना पड़ा.
2015 में जनता परिवार को एक करने की कोशिश हुई थी. ये राजनीतिक दल थे - समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड, जनता दल सेक्यूलर, भारतीय राष्ट्रीय लोकदल और समाजवादी जनता पार्टी (राष्ट्रीय) - 6 क्षेत्रीय दलों को एक सिंबल और एक झंडे के नीचे लाने की कवायद शुरुआती दौर में ही ढेर हो गई.
जनता परिवार एक तो नहीं हुआ, लेकिन लालू यादव से हाथ मिलाकर 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार बीजेपी के नए नेतृत्व को शिकस्त देने में सफल रहे. रिश्ता लंबा नहीं चला, और बीजेपी के साथ हो गए. 2022 में फिर से लालू यादव से हाथ मिला लिया, और विपक्ष को एकजुट करने की नए सिरे से कोशिश की. लेकिन, फिर वही हाल हुआ, और बीजेपी के पास ही लौटना पड़ा. बार बार बताना भी पड़ा कि गलती हो गई थी. और, उम्र के इस पड़ाव पर नीतीश कुमार की सेहत भी दुरुस्त नहीं रही. न गलती सुधारने का मौका बचा, न ही कोई नई गलती करने का.
कहने को तो नीतीश कुमार ने कहा है, 'नई सरकार को मेरा पूरा सहयोग और मार्गदर्शन मिलेगा.'
बाहर से तो दिल्ली दूर लगती है. लेकिन, नीतीश कुमार ऐसी स्थिति में दिल्ली पहुंच रहे हैं, जब बिहार से ही दूर हो जाने की नौबत आ गई है.
निशांत तो अभिमन्यु जैसे ही हैं
महाभारत के अभिमन्यु से तुलना करें तो निशांत कुमार भी मिलते जुलते ही लगते हैं. फर्क बस यह है कि निशांत कुमार ने सत्ता और संगठन की राजनीति के चक्रव्यूह को अपनी आंखों से देखा है, जबकि अभिमन्यु ने मां के गर्भ के अंदर से ही सब सुन रखा था.
और, नीतीश कुमार की बातों को ही निशांत कुमार भी दोहरा रहे हैं, 'हम सब... मेरे पिता नीतीश कुमार के मार्गदर्शन में काम करेंगे... पार्टी और जनता ने मुझ पर जो विश्वास किया है, उस पर मैं खरा उतरने की कोशिश करूंगा... आप पापा पर विश्वास बनाए रखें.'
निशांत कुमार को अभी बहुत कुछ सीखना है. अपने काम से खुद को साबित भी करना है. बेशक, निशांत कुमार की करीब साल भर से ट्रेनिंग चल रही है, और उनकी मदद के लिए सलाहकारों की एक टीम भी बना दी गई है, लेकिन मौका तो सभी के लिए इम्तिहान जैसा ही है.
बिहार की राजनीतिक गतिविधियों पर करीब से नजर रखने वाले एक्सपर्ट भी मान रहे हैं कि जेडीयू का जनाधार अति पिछड़ा तबका है, और नीतीश कुमार के बाद की लीडरशिप में ज्यादातर सवर्ण नेता हैं, और निशांत कुमार तभी चल पाएंगे जब जेडीयू के कार्यकर्ताओं, समर्थकों और वोटर का नेता बन जाएं - और जेडीयू कार्यकर्ता नीतीश कुमार के राज्यसभा के नामांकन से पहले अपना इरादा जाहिर कर चुके हैं.
मृगांक शेखर