कांग्रेस-मुस्लिम लीग का ‘शीर्षासन’, भारत के बंटवारे से लेकर केरल में सरकार बनाने तक

भारतीय राजनीति का चरित्र भी किसी बहुरूपिए से कम नहीं है. जिसमें कांग्रेस और मुस्लिम लीग के अलायंस का इतिहास कभी खून के अक्षरों से लिखा गया था, आज उस पर चुनावी स्वार्थ की स्याही छिड़ककर नया नैरेटिव तैयार कर दिया गया. पढ़िए वो कहानी जो भारत के बंटवारे से लेकर केरल में सरकार बनाने तक की पहुंचती है.

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वायनाड में राहुल गांधी की रैलियों में जब मुस्लिम लीग के झंडे लहराए तो भाजपा के डर से कांग्रेस असहज हो गई थी. (फाइल फोटो) वायनाड में राहुल गांधी की रैलियों में जब मुस्लिम लीग के झंडे लहराए तो भाजपा के डर से कांग्रेस असहज हो गई थी. (फाइल फोटो)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 21 मई 2026,
  • अपडेटेड 1:59 PM IST

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की पिछली पीढ़ी महज सियासी दुश्मन नहीं थी. उनका अतीत खून-खराबे और देश के बंटवारे से भी जुड़ा है. और आज केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के साथ कांग्रेस की गाढ़ी दोस्ती, राजनीतिक अवसरवाद का क्लासिक उदाहरण है. यह इतिहास की किताबों से निकलकर आधुनिक चुनावी बही-खातों तक आने की एक ऐसी दास्तान है, जहां विचारधारा ने सीटों के गणित के आगे बाकायदा शीर्षासन कर लिया है.

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केरल में कांग्रेस और मुस्लिम लीग की भागीदारी हैरान करने वाली है. हाल ही में इन पार्टियों के गठबंधन यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) ने 140 सीटों वाली विधानसभा में से 102 सीटें जीतकर सरकार बना ली है. इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने सत्ताईस में से बाईस सीटें जीतीं और अब सरकार में अहम भूमिका निभा रही है. यह पिछली पीढ़ी की वही मुस्लिम लीग है जिसने 1940 के दशक में पाकिस्तान की मांग की थी और उस दौर की कांग्रेस और देश को खून के आंसू रुला दिए थे.

'शॉर्ट-टर्म मेमोरी लॉस'

कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच जो केरल में गाढ़ी छनती हुई दिख रही है, वो एक 'शॉर्ट-टर्म मेमोरी लॉस' का नतीजा है. जरूरत के अनुसार इतिहास भूल जाने का नतीजा. 1930 और 1940 के दशक में तब की कांग्रेस और मुस्लिम लीग एक-दूसरे के धुर विरोधी थे. इतिहासकार रामचंद्र गुहा की किताबों को पलटें, तो साफ दिखता है कि जवाहरलाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना के बीच का टकराव सिर्फ दो नेताओं की जंग नहीं, बल्कि दो अलग-अलग आइडियोलॉजी का महायुद्ध था. जिन्ना की लीग खुलकर मुसलमानों की बात कर रही थी और कांग्रेस को 'हिंदू संगठन' साबित करने पर तुली थी. उस आक्रामक मजहबी सियासत के जवाब में कांग्रेस भी अपनी धर्मनिरपेक्षता की ढाल को किनारे रखकर, अनौपचारिक रूप से बहुसंख्यक हिंदुओं की रक्षक बनकर खड़ी हो गई थी.

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इतिहासकार आयशा जलाल ने अपनी रिसर्च में साफ किया है कि दोनों दलों की इसी कट्टरता और हठधर्मिता ने देश को 16 अगस्त 1946 के 'डायरेक्ट एक्शन डे' के मुहाने पर लाकर खड़ा किया. कोलकाता की सड़कों पर जो खून बहा, उसकी तपिश ने ही नेहरू और पटेल को यह मानने पर मजबूर किया कि लीग के साथ मिलकर देश चलाना नामुमकिन है. नतीजा- देश का खूनी बंटवारा.

उधर सन्नाटा, इधर नई लीग

बंटवारे के बाद उपमहाद्वीप की राजनीति में एक अजीब विरोधाभास देखने को मिला. पाकिस्तान ने अपने यहां किसी भी हिंदू राजनीतिक दल या विमर्श की गुंजाइश को इस तरह खत्म किया मानो उनका कोई वजूद ही न रहा हो. लेकिन भारत की उदार जम्हूरियत और कांग्रेस की छांव में, बंटवारे के महज सात महीने बाद (मार्च 1948 में) तत्कालीन मद्रास (वर्तमान चेन्नई) की धरती पर मुस्लिम लीग ने 'इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग' (IUML) के रूप में नया चोला पहन लिया. शुरुआत में जवाहरलाल नेहरू इस नई लीग को 'मरे हुए घोड़े' की संज्ञा देते थे और इससे दूरी बनाए रखने में ही भलाई समझते थे. लेकिन नेहरू का वह सैद्धांतिक स्टैंड बहुत जल्दी केरल की वामपंथी (Communist) चुनौती के सामने ढेर हो गया. और इस तरह केरल में ही कांग्रेस ने लिया पहला यू-टर्न. 1959 में केरल की चुनी हुई कम्युनिस्ट सरकार को गिराने के लिए कांग्रेस ने जो 'मुक्ति संघर्ष' चलाया, उसमें उसने इसी मुस्लिम लीग का हाथ थामने में जरा भी संकोच नहीं किया. 1970 के दशक में तो इंदिरा गांधी ने लीग को केरल सरकार में न सिर्फ वैध पार्टनर बनाया, बल्कि लीग के नेता सी.एच. मोहम्मद कोया को समर्थन देकर सीएम तक बना दिया. मनमोहन सिंह के दौर में तो मुस्लिम लीग दिल्ली तक चली आई. लीग के नेता ई. अहमद को विदेश राज्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी गई. लीग को लेकर नेहरू के सिद्धांतों की रीढ़ में आया लचीलापन, आज राहुल गांधी के दौर तक आते-आते पूरी तरह शीर्षासन में बदल चुका है.

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केरल का किंग कौन?

आज केरल की राजनीति का सच यह है कि वहां के यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) का नेतृत्व भले कांग्रेस पास हो, लेकिन उसके ढांचे में रीढ़ का काम मुस्लिम लीग ही कर रही है. उत्तर भारत के किसी राज्य में जो कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोपों से डरकर 'सॉफ्ट हिंदुत्व' का चोला ओढ़ लेती है, वही कांग्रेस केरल के मालाबार क्षेत्र में कदम रखते ही मुस्लिम लीग की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिला पाती. कांग्रेस ने लीग को पूरी तरह ‘सेक्युलर’ होने का सर्टिफिकेट दे दिया.

उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक राजनीति से तौबा करने वाली कांग्रेस को अमेठी की हार के बाद जब राहुल गांधी के लिए एक सुरक्षित लोकसभा सीट चाहिए थी, तो उन्हें वायनाड की याद आई. और वायनाड में जीत की गारंटी कौन देता? वही इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग. इस लोकसभा सीट पर, जहां से अब प्रियंका गांधी आती हैं, वहां 48 फीसदी आबादी मुस्लिम है. दोनों पार्टियों के बीच रिश्ता give and take वाला है. कांग्रेस को वायनाड सीट जिताकर लीग कोई एहसान नहीं करती है. केरल में शिक्षा, पब्लिक वर्क्स और उद्योग जैसे मलाईदार विभाग लीग के खाते में जाते रहे हैं, और कांग्रेस सिर्फ गठबंधन का चेहरा बनकर संतोष कर लेती है.

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हाल के केरल विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री बनने को लेकर कांग्रेस के भीतर जो रस्साकशी हुई, उसमें बाहर से एक अहम भूमिका मुस्लिम लीग ने भी निभाई. आप लीग की ताकत का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि उसने वीडी सतीशन के पीछे अपना जोर लगाया तो केसी वेणुगोपाल जैसे दिग्गज दावेदार को भी हथियार डालने पड़ गए. इसके अलावा दावेदारों में सबसे वरिष्ठ रमेश चेन्नथला तो कहीं रेस में ही नजर नहीं आए.

क्योंकि लीग सेकुलर है!

कांग्रेस और लीग के रिश्ते का सबसे मजेदार पहलू जून 2023 में वाशिंगटन में देखने को मिला. वहां राहुल गांधी से मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन पर सवाल हुआ, तो उन्होंने बिना पलक झपकाए कह दिया कि "मुस्लिम लीग पूरी तरह से एक सेक्युलर पार्टी है." यह बयान इतिहास के गाल पर एक करारा तमाचा था. जिस नाम, जिस झंडे (हरे रंग का चांद-तारे वाला झंडा) और जिस सांप्रदायिक अतीत ने इस देश के दो टुकड़े कर दिए, उसे आज की कांग्रेस महज एक राज्य की सत्ता के लिए 'सेक्युलरिज्म का गोल्ड मेडल' बांट रही थी. यह कांग्रेस की राजनीति का वह मुकम्मल शीर्षासन है. ये और बात है कि वायनाड में चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस को उत्तर भारत के वोटरों के डर से मुस्लिम लीग के हरे झंडे छुपाने पड़ते हैं, ताकि भाजपा इसे 'पाकिस्तानी एजेंडा' न कह सके. यानी दोस्ती भी करनी है, सत्ता का मलाईदार स्वाद भी चखना है, लेकिन दुनिया के सामने उस दोस्ती को छुपाना भी है.

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पॉलिटिकल टेकअवे

कांग्रेस और मुस्लिम लीग का यह सफरनामा यह साबित करता है कि राजनीति में न तो कोई स्थायी दुश्मन होता है और न ही स्थायी सिद्धांत. जो मुस्लिम लीग कभी कांग्रेस की नजर में देश के विभाजन की गुनहगार थी, आज वह केरल में उसके वजूद की रक्षक बनी बैठी है. नेहरू के दौर का जो सैद्धांतिक संकोच था, वह राहुल गांधी के दौर तक आते-आते एक ऐसी बेझिझक है. केरल में सत्ता की मलाई के लिए इतिहास के जख्मों पर 'सेक्युलर' क्रीम लगाई जा रही है. इसे ही कहते हैं राजनीति का वह खेल, जहां इतिहास खुद को दोहराता नहीं, बल्कि अपना शीर्षासन करके सबको हैरान कर देता है.

शीर्षासन की एक सच्चाई यह है कि उलटा पर दिखता भी सबकुछ उलटा ही है. राहुल गांधी आज भाजपा और संघ पर हिंदू राष्ट्र का एजेंडा थोपने की बात करते हैं. जैसे, बंटवारे से पहले जिन्ना, नेहरू के बारे में कहते थे. उधर, पाकिस्तान की मुस्लिम लीग (नवाज) सरकार लाहौर की कुछ सड़कों और चौराहों को उनके पुराने हिंदू नाम लौटाकर सेकुलर होने की दलील देती है.

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