आखिर कौन तय कर रहा है भारत की विदेश नीति?

भारत की विदेश नीति में राजनयिक तंत्र और राजनीतिक दबाव के बीच अंतर दिख रहा है. बांग्लादेश के साथ रिश्तों में नरमी के संकेत मिलने के बाद भी क्रिकेटर मुस्ताफिजुर रहमान को आईपीएल से हटाने का फैसला विवादित रहा है. इस फैसले के बाद बांग्लादेश ने भी कह दिया है कि वो टी20 वर्ल्ड कप में भारत के खिलाफ मैच नहीं खेलेगा.

Advertisement
भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव और बढ़ गया है भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव और बढ़ गया है

राजदीप सरदेसाई

  • नई दिल्ली,
  • 16 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 12:10 PM IST

तो सवाल यह है कि भारत की विदेश नीति आखिर तय कौन करता है? ऊपर-ऊपर से देखने पर इसका जवाब बहुत साफ लगता है. विदेश मंत्री के तौर पर डॉ. एस. जयशंकर नरेंद्र मोदी सरकार का सबसे मुखर और दिखने वाला चेहरा हैं. अनुभवी और लगातार विदेश यात्राएं करने वाले इस राजनयिक ने अपने तीखे और सधे हुए बयानों से अक्सर सुर्खियां बटोरी हैं. लेकिन कई ऐसे मौके आए हैं जब मीडिया को लेकर स्मार्ट रहे ये मंत्री शायद यह सोचने पर मजबूर हुए होंगे कि साउथ ब्लॉक में असल फैसले कौन ले रहा है. कूटनीतिक भ्रम का ताजा उदाहरण बांग्लादेश के साथ रिश्तों को लेकर सामने आया है.

Advertisement

इस पर गौर कीजिए. 31 दिसंबर को डॉ. जयशंकर ढाका गए थे, जहां उन्होंने बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में हिस्सा लिया. इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की ओर से शोक संदेश वाला पर्सनल लेटर उनके बेटे और संभावित उत्तराधिकारी तारिक रहमान को सौंपा. इसकी एक तस्वीर सामने आई जिसमें मंत्री उस व्यक्ति से हाथ मिलाते दिखे जो बांग्लादेश का अगला प्रधानमंत्री बन सकता है. इस तस्वीर से संकेत मिला कि महीनों से चले आ रहे ठंडे रिश्तों में नरमी आ रही है.

मगर इसके ठीक दो दिन बाद ही भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने इंडियन प्रीमियर लीग की फ्रेंचाइजी कोलकाता नाइट राइडर्स को निर्देश दिया कि वो बांग्लादेशी स्टार खिलाड़ी मुस्ताफिजुर रहमान को अपने कॉन्ट्रैक्ट वाली प्लेयर लिस्ट से हटा दे. निजी फ्रेंचाइजी ने बिना किसी विरोध के यह निर्देश मान लिया. इसके बाद बांग्लादेश सरकार और वहां के क्रिकेट बोर्ड की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई और अब बांग्लादेश ने ऐलान किया है कि विरोध के तौर पर उसकी टीम अगले महीने भारत में होने वाले टी20 वर्ल्ड कप के मैच नहीं खेलेगी.

Advertisement

48 घंटे के भीतर क्या बदल गया?

तो सवाल उठता है कि 48 घंटों के भीतर ऐसा क्या बदल गया कि एक अहम हाई लेवल कूटनीतिक पहल के बाद अचानक एक क्रिकेटर को निशाना बनाने का फैसला ले लिया गया?  बस एक बदलाव दिख रहा था कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों को देखते हुए तथाकथित ‘फ्रिंज’ हिंदुत्ववादी तत्वों ने मोदी सरकार पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया कि वो बांग्लादेश के खिलाफ सख्ती बरते.

उत्तर प्रदेश के बीजेपी विधायक संगीत सोम ने खास तौर पर केकेआर के मालिक शाहरुख खान को टार्गेट किया और मुस्ताफिजुर को टीम में शामिल करने के लिए उन्हें ‘गद्दार’ करार दिया. इस विवाद में बॉलीवुड सुपरस्टार को घसीट कर उन्होंने थोड़ी देर के लिए प्राइम टाइम की सुर्खियां बटोर लीं. बेशक, उन्होंने केकेआर के अन्य मालिकों, उद्योगपति जय मेहता और उनकी पत्नी, अभिनेत्री जूही चावला का जिक्र करना जरूरी नहीं समझा. लेकिन जब सरनेम खान हो, तो हिंदुत्व के उग्र तत्वों के लिए आप हमेशा आसान शिकार बन जाते हैं.

सामान्य हालात में कोई तर्कसंगत और संतुलित सरकार ऐसे ‘फ्रिंज’ के शोर को नजरअंदाज कर देती. लेकिन ‘न्यू इंडिया’ में हिंदुत्व का यह फ्रिंज अब ‘मुख्यधारा’ बन चुका है. जहरीली धार्मिक राजनीति से चलने वाली सरकार उस सोशल मीडिया फौज को अनदेखा नहीं कर सकती, जो उसे आगे बढ़ाती है.

Advertisement

सोशल मीडिया फौज संवेदनशील विदेश नीति के फैसलों को प्रभावित कर रही

जब सोशल मीडिया पर फैला आक्रोश संवेदनशील विदेश नीति के फैसलों को प्रभावित करने लगता है, तो मामला बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच जाता है. ऐसा लगता है जैसे विदेश मंत्री की ढाका तक की पहल का कोई खास मतलब नहीं रह गया है. असल अहमियत उस घरेलू राजनीतिक भावना की है, जो हर बांग्लादेशी को ‘राष्ट्र-विरोधी’ मानती है, यहां तक कि उस क्रिकेटर को भी, जिसका राजनीति के उतार-चढ़ाव से कोई लेना-देना नहीं.

यह सिर्फ खेल और राजनीति को अलग रखने की पुरानी और घिसी-पिटी दलील का मामला नहीं है. भारतीय उपमहाद्वीप के संदर्भ में खेल, खासकर क्रिकेट, दुनिया के सामने भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ का एक सशक्त प्रदर्शन है.

बीसीसीआई का क्रिकेट जगत पर वर्चस्व है. गृह मंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के अध्यक्ष हैं और खेल के सबसे ताकतवर व्यक्ति माने जाते हैं. चाहे एशिया कप में पाकिस्तानी खिलाड़ियों से हाथ न मिलाने का मामला हो या अब बांग्लादेशी खिलाड़ी को अलग-थलग करना, भारतीय क्रिकेट ही शर्तें तय करता है. 

यह ‘सुपरपावर’ दर्जा अब सरकार की ओर से दबंगई दिखाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, या कहें, इस सुपरपावर का दुरुपयोग किया जा रहा है. मुस्ताफिजुर को हटाने का फैसला आईपीएल गवर्निंग काउंसिल से सलाह-मशविरा किए बिना, सीधे राजनीतिक नेतृत्व के फरमान की तरह लिया गया.

Advertisement

तो... भारत की विदेश नीति कौन तय कर रहा है?

यहीं लौटकर फिर वही सवाल खड़ा होता है- भारत की विदेश नीति आखिर कौन तय कर रहा है? भारत का प्रशिक्षित और अनुभवी राजनयिक तंत्र या फिर गृह मंत्री और बीजेपी का संघ परिवार, जो भगवा रंग में रंगा है?

राजनयिक तंत्र ने हमेशा राष्ट्रीय हितों और पड़ोसी देशों में दीर्घकालिक रणनीतिक लक्ष्यों के बीच नाजुक संतुलन साधते हुए काम किया है. इसके उलट, नेताओं और उनके समर्थकों पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती. असम और पश्चिम बंगाल में कुछ ही महीनों में चुनाव हैं और बांग्लादेश विरोधी भावनाओं को भड़काना वोट बटोरने का एक कारगर हथियार माना जा रहा है.

एक संतुलित डिप्लोमेसी बांग्लादेशी हिंदुओं पर हमलों के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराती, लेकिन उसे प्राइम टाइम तमाशा नहीं बनाती. लेकिन राजनीतिक नेतृत्व और उसके समर्थकों ने हिंदुओं पर हमले को भुनाने की कोशिश की जिससे उसे सुर्खियां मिले और चुनावी फायदा हो.

नतीजतन, बांग्लादेश से रिश्ते सुधारने के बजाय हमने अविश्वास और गुस्से की एक दीवार खड़ी कर ली है, जो पहले से तनावपूर्ण हालात को और बिगाड़ सकती है. इससे बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों को और हौसला मिल सकता है. सोचिए, अगर बांग्लादेश भारत आकर खेलने से इनकार कर दे या पड़ोसी श्रीलंका को 'ज्यादा सुरक्षित' देश मान ले, तो हमारे लिए कितनी शर्मिंदगी होगी.

Advertisement

मालदीव और तुर्की के साथ भी भारत ने यही रुख अपनाया

बांग्लादेश कोई अकेला उदाहरण नहीं है, जहां भावनाओं के दबाव में, बिना सोचे-समझे विदेश नीति के फैसले लिए गए हों.

2024 में छोटे से मालदीव के साथ ऐसा तनातनी हुई जो कि होनी नहीं चाहिए थी. उसकी शुरुआत दोनों तरफ से भड़काऊ ट्वीट्स से हुई. बाद में हालात संभालने के लिए कूटनीतिक सूझबूझ की जरूरत पड़ी.

पिछले साल 'ऑपरेशन सिंदूर' के तुरंत बाद मोदी सरकार ने तुर्की की एयरपोर्ट ग्राउंड हैंडलिंग कंपनी Celebi की सुरक्षा मंजूरी राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर रद्द कर दी. यह फैसला भी अचानक लिया गया, जब तुर्की पर इस्लामाबाद का पक्ष लेने का आरोप लगाया गया. यहां भी अगर एक परिपक्व विदेश नीति अपनाई गई होती तो तुर्की से तुरंत टकराव से बचा जा सकता था लेकिन सोशल मीडिया के अधीर योद्धाओं के पास जटिल और संतुलित संदेश के लिए वक्त नहीं होता.

बॉयकॉट चीन के बाद अब पड़ोसी फिर बन रहा 'दोस्त'

शोर मचाने वालों के प्रभाव में विदेश नीति कैसे डगमगाती है, इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण 2020 में गलवान झड़पों के बाद चीन के प्रति भारत की शुरुआती प्रतिक्रिया में दिखा.

TikTok पर बैन से लेकर चीनी सामान के बॉयकॉट तक, दक्षिणपंथी इंटरनेट ब्रिगेड ने टकराव को बढ़ाने की कोशिश की, जबकि ये कदम किसी विस्तारवादी शासन को रोकने में नाकाफी थे.

Advertisement

पांच साल बाद वही बीजेपी-आरएसएस नेतृत्व चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधिमंडल की मेजबानी कर रहा है और इसे सामान्य राजनीति बताया जा रहा है. जब कांग्रेस ने चीन के राजनीतिक नेतृत्व से बातचीत की थी, तब उस पर राष्ट्रीय हितों से गद्दारी का आरोप लगाया गया था. अब सब कुछ सामान्य है. यह पाखंड चौंकाने वाला है.

अंत में: कुछ दिन पहले मॉल में मैंने कुछ युवकों को भारी छूट पर स्वेटर खरीदते देखा. जब वे जोश में खरीदारी कर रहे थे, तो मैंने देखा कि उन स्वेटरों पर 'मेड इन बांग्लादेश' का टैग लगा था. तो बात ये है कि किसी कपड़ा निर्माता के बजाय एक क्रिकेटर को निशाना बनाना कहीं ज्यादा आसान होता है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement