महाराष्ट्र की राजनीति में बीएमसी चुनाव का सभी को इंतजार था. क्योंकि लोकसभा और विधानसभा के बाद बीएमसी चुनाव के साथ ही ये चक्र पूरा हो रहा है. BMC सहित महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों के लिए हुए चुनाव के जो रुझान आ रहे हैं, बीजेपी तेजी से रफ्तार भरती नजर आ रही है.
बीएमसी का पहला नतीजा तो कांग्रेस के पक्ष में गया है, लेकिन हर तरफ बीजेपी गठबंधन बढ़त बनाए हुए हैं. बीएमसी में बहुमत के लिए 114 सीटों की जरूरत है, और चुनाव खत्म होने के बाद आए एग्जिट पोल में भी बीजेपी के बहुमत हासिल करने की बात सामने आई थी.
बीएमसी का ये चुनाव 2022 में ही होना था, लेकिन कई वजहों से नहीं हो सका. बीएमसी का आखिरी चुनाव 2017 में हुआ था. 227 सीटों वाले बीएमसी चुनाव में बीजेपी ने 137 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, और गठबंधन साथी शिवसेना (शिंदे गुट) के हिस्से में 90 सीटें आई थीं. रिपोर्ट के अनुसार, BMC चुनाव में इस बार कुल 52.94 फीसदी वोट पड़े, जबकि 2017 में 55.53 फीसदी वोटिंग हुई थी.
2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी और गठबंधन साथी एकनाथ शिंदे चूक गए थे, जब कांग्रेस ने बाजी मार ली थी. उद्धव ठाकरे और शरद पवार की पार्टी का प्रदर्शन भी ठीक ठाक रहा, लेकिन विधानसभा चुनाव में देवेंद्र फडणवीस के देवाभाऊ अवतार ने बीजेपी विरोधियों का पूरा खेल बिगाड़ दिया - अब बीएमसी और नगर निगम चुनाव में तो बीजेपी ने राजनीतिक विरोधियों के सारे ही समीकरण खराब कर दिए हैं.
चुनावी रुझानों के आंकड़े देखें तो बीएमसी सहित महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों पर बीजेपी जोरदार पकड़ बनाती नजर आ रही है. महायुति में बीजेपी की सहयोगी एकनाथ शिंदे की शिवसेना भी कदम से कदम मिलाकर साथ दे रही है. खासकर उन इलाकों में जहां उसका अपना प्रभाव है. महाराष्ट्र के 2869 वार्डों में से 1553 के रुझान अब तक सामने आ चुके हैं. आंकड़े बीजेपी के पक्ष में स्वाभाविक रूप से ज्यादा हैं, शिवसेना की बदौलत महायुति औसत रूप से दो-तिहाई से ज्यादा वार्डों पर काबिज होती लग रही है.
बीजेपी ने मराठी मुद्दे को कैसे हैंडल किया
बीजेपी के लिए मराठी का मुद्दा सिर मुड़ाते ओले पड़ने जैसा ही था. भारी बहुमत के साथ विधानसभा चुनाव जीतकर आने के बावजूद महायुति सरकार के त्रिभाषा फॉर्मूले पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस कायम नहीं रह सके. भारी विरोध के चलते स्टैंड ले पाना मुश्किल हो गया था. एकनाथ शिंदे बीजेपी के साथ जरूर थे, लेकिन मराठी के मुद्दे पर तो महाराष्ट्र के किसी भी नेता के लिए कोई अलग स्टैंड लेना मुश्किल हो जाता है. उद्धव ठाकरे के महाराष्ट्र मुख्यमंत्री रहते, चाहे वो नारायण राणे की गिरफ्तारी का मामला हो, या कंगना रनौत के खिलाफ एक्शन का - देवेंद्र फडणवीस सहित सारे ही बीजेपी नेताओं के लिए बयान देना मुश्किल साबित हो रहा था. लिहाजा जैसे तैसे रस्मअदायगी की जा रही थी.
मराठी के मुद्दे पर तगड़े विरोध के चलते देवेंद्र फडणवीस को सरकारी आदेश वापस लेने पड़े थे, लेकिन वो उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे को साथ आने से नहीं रोक पाए. ये मराठी मानुष का ही मुद्दा था जिसने बरसों पहले बिछड़े चचेरे भाइयों को एक मंच पर ला दिया - और राज ठाकरे, उद्धव ठाकरे के साथ मिलकर बीएमसी चुनाव लड़ने को तैयार हो गए.
बीजेपी की तरफ से एक और वाकया हो गया. तमिलनाडु बीजेपी नेता के. अन्नामलाई ने मुंबई को बड़ा शहर बताने के चक्कर में ऐसा बयान दे दिया, जो खिलाफ चला गया था. अन्नामलाई का कहना था कि ये सिर्फ महाराष्ट्र का शहर नहीं है. बल्कि, दुनिया का बड़ा शहर है. बस राजनीतिक चूक ये हो गई कि वो मुंबई की जगह बॉम्बे बोल गए. फिर क्या था, ठाकरे बंधु बीजेपी पर टूट पड़े.
उद्धव ठाकरे ने आरोप लगाया कि बीजेपी मुंबई का नाम बदलकर बॉम्बे करना चाहती है, और राज ठाकरे ने लुंगी-पुंगी के साथ बीजेपी नेता को टार्गेट किया.
बीजेपी नेताओं ने तो चुप्पी साध ली, लेकिन एकनाथ शिंदे को आगे किया गया. और, एकनाथ शिंदे ने भी बस इतना ही कहा कि अन्नामलाई को ऐसा नहीं बोलना चाहिए था.
बीजेपी गठबंधन ने इस बेहद संवेदनशील मुद्दे को समझदारी से हैंडल कर लिया, और ठाकरे बंधुओं का अटैक फुस्स हो गया - चुनाव नतीजे तो यही बता रहे हैं.
मराठी मानुष ने बीजेपी को स्वीकार कर लिया
2019 में शिवसेना के गठबंधन तोड़ लेने के बाद बीजेपी को महाराष्ट्र में अपने बूते पांव जमाना काफी मुश्किल हो गया था. मराठी मानुष का सपोर्ट हासिल करने के लिए ही बीजेपी ने बाल ठाकरे की शिवसेना के साथ गठबंधन किया था. गठबंधन चला भी लंबा, लेकिन उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री पद को लेकर जिद के कारण टूट भी गया.
उद्धव ठाकरे से नाउम्मीद हो चुकी बीजेपी को एकनाथ शिंदे के रूप में तुरूप का पत्ता हाथ लग गया. फिर एक ही झटके में बीजेपी उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास आघाड़ी सरकार को बेदखल कर सत्ता पर काबिज हो गई. बड़े लक्ष्य को देखते हुए बीजेपी ने मुख्यमंत्री पद पर भी समझौता कर लिया.
पूरे पांच साल मुख्यमंत्री रह चुके देवेंद्र फडणवीस को डिप्टी सीएम बनाने के पीछे भी बीजेपी का मकसद मराठी जनता को मैसेज देना ही था. ताकि, उद्धव ठाकरे पक्ष का ये नैरेटिव कामयाब न हो कि बीजेपी ने मराठी नेताओं के हाथ से सत्ता छीन ली है.
बीजेपी को, असल में, मराठी वोटर के बीच अपनी अलग पैठ बनानी थी. और, इसी के लिए शुरू से ही उसे शिवसेना की जरूरत थी. उद्धव ठाकरे के गठबंधन तोड़ देने के बाद से तो जैसे हाथ ही कट गए थे. लेकिन, बीजेपी ने उद्धव ठाकरे के हिंदुत्व की राजनीति पर सवाल उठाया और ऐसी मुहिम चलाई कि सफाई देने के बावजूद संभलते नहीं बना - और बीएमसी चुनाव में बीजेपी की मुहिम की पूर्णाहूति हो गई है.
महायुति में नेतृत्व का मामला स्पष्ट हो गया, बीजेपी ही बिग बॉस
महाराष्ट्र में नेतृत्व का मामला बीजेपी ने शुरू से ही स्पष्ट रखा है.तख्तापलट के बाद एकनाथ शिंदे सत्ता प्रतिष्ठान के निर्विवाद नेता के रूप में उभरे. बेलगाम न हों, इसलिए देवेंद्र फडणवीस को भी डिप्टी सीएम बनाकर ऐसा बिठाया गया था कि हमेशा आस पास ही मौजूद रहें. प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी एकनाथ शिंदे को देवेंद्र फडणवीस की तरफ से पर्ची पकड़ाते देखा ही गया था.
विधानसभा चुनाव तक तस्वीर साफ नजर नहीं आ रही थी. हालांकि, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तो एकनाथ शिंदे के चुनाव बाद भी मुख्यमंत्री बने रहने के सवाल पर जवाब देकर संकेत दे भी दिया था. लेकिन, तस्वीर पूरी तरह साफ तब हुई जब महाराष्ट्र विधानसभा में देवेंद्र फडणवीस ने बीजेपी की झोली में सबसे ज्यादा सीटें डाल दी - और ये सिलसिला बीएमसी चुनाव तक भी देखने को मिल रहा है.
मेयर किसका होगा, इस सवाल पर एक टीवी डिबेट में शिंदे सेना की नेता शाइना एनसी का कहना था कि गठबंधन मिलकर तय करेगा - लेकिन, बीजेपी प्रवक्ता प्रेम शुक्ला ने भी अमित शाह स्टाइल में ही चीजें पहले ही स्पष्ट कर दी है. प्रेम शुक्ला का कहना है कि बीजेपी का नेता होने के कारण वो तो यही चाहेंगे कि मेयर बीजेपी का ही हो.
ठाकरे बंधुओं का दावा था कि मेयर मराठी होगा, तो AIMIM नेता वारिस पठान ने मुस्लिम मेयर की बात आगे बढ़ा दी - देवेंद्र फडणवीस ने मौके की नजाकत को देखते हुए पहले ही साफ कर दिया है, मुंबई का मेयर हिंदू-मराठी होगा. चुनाव नतीजों के रुझान भी ऐसे ही इशारे कर रहे हैं.
मृगांक शेखर