गुरुवार को जब मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने अपनी कैबिनेट का विस्तार किया, तो सबसे बड़ी खबर यही बनी कि कांग्रेस ने 59 साल के लंबे इंतजार के बाद तमिलनाडु की सरकार में वापसी कर ली है. हालांकि, यह कोई बहुत बड़ा या क्रांतिकारी बदलाव नहीं है, क्योंकि न तो कांग्रेस ने इसके लिए कोई जमीनी मेहनत की थी और न ही इसके दो मंत्रियों एस राजेश कुमार और पी विश्वनाथन की मौजूदगी से यह पार्टी राज्य में तुरंत अपने दम पर एक मजबूत राजनीतिक ताकत बन जाती है.
असली और सबसे बड़ी खबर यह है कि किस तरह अन्नाद्रमुक (AIADMK) को, कम से कम अभी के लिए, किनारे लगा दिया गया है. एसपी वेलुमनी और सीवी शनमुगम के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक के 25 विधायकों ने पार्टी महासचिव एडप्पादी पलानीस्वामी के आदेशों की अनदेखी करते हुए विश्वास मत के दौरान विजय सरकार के पक्ष में मतदान किया. इसके अलावा, मुख्यमंत्री ने चेन्नई में शनमुगम के आवास पर जाकर अन्नाद्रमुक के सभी बागी विधायकों से मुलाकात भी की.
इस घटनाक्रम से यह धारणा मजबूत हुई है कि इन बागियों ने मंत्री पद पाने की चाहत में ऐसा किया. साल 2021 से सत्ता से बाहर रहने के कारण, कई पूर्व मंत्री विजय का साथ थामकर अपनी पुरानी सत्ता और प्रभाव को वापस पाना चाहते थे.
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विजय का मास्टर स्ट्रोक
बागियों ने इसके लिए पहले से ही पूरी प्लानिंग कर रखी थी. उनकी आपत्ति इस बात पर थी कि एडप्पादी पलानीस्वामी सिर्फ मुख्यमंत्री बनने के लिए अपने सबसे बड़े विरोधी द्रमुक से भी हाथ मिलाने को तैयार थे. ऐसे में द्रमुक के बजाय टीवीके (TVK) को चुनना इन बागियों के लिए अपनी दलबदल को सही ठहराने का एक अच्छा राजनीतिक बहाना बन गया. वहीं दूसरी ओर, जोसेफ विजय के उनके घर जाने से बागियों को यह उम्मीद जग गई कि विजय उन्हें सरकार में मंत्री बनने का न्योता देंगे.
लेकिन वे राजनेता विजय की चाल को समझ नहीं पाए. टीवीके (TVK) प्रमुख ने अन्नाद्रमुक के विधायकों के बीच इस मतभेद को बढ़ावा देकर एक तीर से दो निशाने साधे. पहला उन्होंने वीसीके (VCK), आईयूएमएल (IUML), वामपंथी दलों और कांग्रेस जैसी सहयोगी पार्टियों को यह साफ संदेश दे दिया कि अगर कभी जरूरत पड़ी, तो टीवीके को अन्नाद्रमुक के एक गुट के साथ मिलकर काम करने में कोई परहेज नहीं है. दूसरा इस फूट को बढ़ावा देकर विजय ने तमिलनाडु की जनता को यह भी दिखा दिया कि चुनाव में तीसरे नंबर पर पिछड़ चुकी अन्नाद्रमुक सिद्धांतों की नहीं, बल्कि सिर्फ फायदे की राजनीति करती है.
गुरुवार को कुल 23 मंत्रियों को शपथ दिलाई गई, जिनमें से 21 टीवीके (TVK) के और 2 कांग्रेस के थे. तमिलनाडु कैबिनेट में कुल मंत्रियों की अधिकतम संख्या 35 हो सकती है, जिसका मतलब है कि अब केवल दो और मंत्रियों के लिए जगह बची है एक वीसीके (VCK) के लिए और एक आईयूएमएल (IUML) के लिए. इस समीकरण ने अन्नाद्रमुक के बागी विधायकों की बची-खुची उम्मीदों पर पूरी तरह पानी फेर दिया है.
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हालांकि, अन्नाद्रमुक के इन विधायकों को अभी कैबिनेट में शामिल न करने का फैसला टीवीके के भीतर बिना किसी चर्चा के नहीं लिया गया था. दरअसल, टीवीके के कुछ सीनियर मंत्री इस पक्ष में थे कि अन्नाद्रमुक के बागियों को सरकार में शामिल कर लिया जाए. भले ही बाद में दलबदल विरोधी कानून के तहत उनकी विधायकी रद्द हो जाती, लेकिन उन्हें बाद में उपचुनाव लड़वाया जा सकता था. इसके पीछे तर्क यह था कि इससे सदन में विजय सरकार के पास जो अभी बहुत मामूली बहुमत है, उसके लिए उन्हें चुनाव के बाद साथ आए सहयोगियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता.
लेकिन जनता का रुख वेलुमनी और उनके साथियों के खिलाफ इस कदर आक्रामक था जिसकी सबसे मुख्य वजह उनके भ्रष्टाचार के मामले थे कि जोसेफ विजय ने अपनी राजनीति के इस शुरुआती दौर में कोई भी गलत कदम न उठाने का फैसला किया. टीवीके (TVK) के सहयोगी दल भी अन्नाद्रमुक के लोगों को कैबिनेट में शामिल करने के पक्ष में नहीं थे. इसकी वजह उनका अतीत में भाजपा के साथ गठबंधन होना था, और दूसरी वजह यह भी थी कि ऐसा होने से गठबंधन में उनका खुद का महत्व कम हो जाता.
इसके पीछे एक तर्क यह भी दिया गया कि बागियों को सरकार में शामिल करना अन्नाद्रमुक को एक नई जीवनरेखा देने जैसा होगा. और चूंकि वह एक काडर-आधारित पार्टी है, इसलिए वह कभी भी दोबारा वापसी कर सकती है.
अन्नाद्रमुक के बागी विधायक अधर में
नतीजा यह हुआ कि अन्नाद्रमुक के बागी विधायक फिलहाल अधर में लटक गए हैं. वे इस समय परेशान और खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे होंगे. इस अकेलेपन के बाद अब उनके पास पलानीस्वामी के पास जाकर माफी मांगने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा है. हालांकि विश्वास मत के दिन एडप्पादी पलानीस्वामी (EPS) के पास केवल 22 विधायकों का समर्थन था, लेकिन अब पलड़ा उन्हीं का भारी है. ऐसा इसलिए क्योंकि बागी विधायक 47 सदस्यों वाले विधायक दल को तोड़ने के लिए जरूरी 32 विधायकों का आंकड़ा नहीं जुटा पाए. ऐसे में पार्टी महासचिव होने के नाते असली हुक्म का इक्का अब भी पलानीस्वामी के हाथ में ही है.
दूसरी बड़ी खबर यह है कि विजय ने अपने सहयोगियों को अपनी कैबिनेट में शामिल होने का न्योता देकर, उनके संभावित राजनीतिक ब्लैकमेल से बचने के लिए एक तरह का 'बीमा' करवा लिया है, ऐसा इसलिए किया गया है ताकि सरकार के बने रहने में उन सहयोगियों का भी अपना निजी हित जुड़ा रहे, जहां आज कांग्रेस इस कैबिनेट में शामिल हो गई, वहीं उम्मीद है कि VCK और IUML भी जल्द ही इसी राह पर चलेंगे.
तीसरी बड़ी खबर यह है कि इस नए राजनीतिक समीकरण के बाद अब द्रमुक को तमिलनाडु में भाजपा-विरोधी और धर्मनिरपेक्ष वोटों का एकमात्र रखवाला नहीं माना जा सकता. 4 मई के बाद से, एमके स्टालिन ने देखा है कि उनके अधिकांश सहयोगियों ने उनकी पार्टी का साथ छोड़ दिया है. गुरुवार का दिन द्रमुक के 'धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन' के आधिकारिक तौर पर बिखरने का गवाह बना.
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि तमिलनाडु सत्ता के एक नए समीकरण का गवाह बन रहा है, जहां राजनीति अब दो द्रविड़ दलों DMK और AIADMK के कड़े और एकाधिकार वाले ढर्रे से निकलकर एक लचीले और गठबंधन-आधारित दौर में प्रवेश कर रही है. पिछले लगभग छह दशकों से, तमिलनाडु की राजनीति पूर्ण-बहुमत के मॉडल पर चल रही थी, जिसमें मुख्य द्रविड़ पार्टी चाहे वह द्रमुक हो या अन्नाद्रमुक के पास ही पूरी प्रशासनिक शक्ति होती थी.
छोटे सहयोगी दलों को वास्तविक सरकार में शामिल होने की अनुमति नहीं दी जाती थी. यहां तक कि साल 2006 में भी ऐसा नहीं हुआ, जब द्रमुक अपने दम पर साधारण बहुमत पाने में नाकाम रही थी. टीवीके (TVK) ने अब छोटे दलों को सत्ता में भागीदारी देकर इस पुरानी विसंगति को सुधार दिया है.
तमिलनाडु में चुनाव हमेशा गठबंधनों के बीच ही लड़े गए हैं यह सिर्फ इस बार का चुनाव था, जहां अकेले चुनाव लड़ने के बावजूद टीवीके (TVK) सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने में कामयाब रही. जीत के 'इतने करीब आकर भी दूर रह जाने' वाले इस जनादेश को तमिलनाडु की जनता के एक आदेश के रूप में देखा जा रहा है कि विजय को अब एक राजनीतिक गठबंधन तैयार करना ही होगा. कैबिनेट का यह विस्तार उसी दिशा में पहला कदम है.
कांग्रेस आज जश्न मना रही है और उसके पास इसकी वाजिब वजह भी है. विजय के साथ कांग्रेस की यह दोस्ती साल 2029 के लोकसभा चुनावों में काम आएगी, जहां एक राष्ट्रीय पार्टी का सहयोगी होना टीवीके जैसी क्षेत्रीय पार्टी को अपना नैरेटिव तैयार करने में मदद करेगा.
द्रमुक (DMK) के दबदबे वाली छाया से बाहर आने के बाद, सरकार में यह भागीदारी कांग्रेस को जमीनी स्तर पर अपने संगठन को फिर से मजबूत करने का एक सुनहरा अवसर भी देगी. उम्मीद की जा सकती है कि कांग्रेस को एक नए सिरे से स्थापित करने और उसे एक नई शुरुआत देने के लिए जल्द ही एक नए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की नियुक्ति की जाएगी.
टी एस सुधीर