कांग्रेस-DMK गठबंधन में टकराव, क्‍या राहुल गांधी को विजय की पार्टी TVK का साथ मंजूर होगा?

तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके के बीच गठबंधन को लेकर सियासी हलचल तेज है. आगामी विधानसभा चुनावों से पहले सीटों के बंटवारे, सत्ता में साझेदारी और संभावित नए गठबंधनों को लेकर चर्चाएं सामने आई हैं. इन घटनाक्रमों के बीच कांग्रेस नेतृत्व, क्षेत्रीय दलों और नए राजनीतिक खिलाड़ियों की भूमिकाएं राजनीतिक विमर्श के केंद्र में हैं.

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कांग्रेस एमके स्टालिन के साथ बनी रहे या चुनाव में विजय के टीवीके के साथ जाए, राहुल गांधी के सामने नया चैलेंज है. (Photo: ITG) कांग्रेस एमके स्टालिन के साथ बनी रहे या चुनाव में विजय के टीवीके के साथ जाए, राहुल गांधी के सामने नया चैलेंज है. (Photo: ITG)

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 07 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 1:44 PM IST

कांग्रेस और डीएमके गठबंधन में हालिया तनाव थोड़ा कम हुआ है. थोड़ा और होने की जरूरत है. जो होना बचा है, वो जो हुआ है उससे ज्यादा मुश्किल लगता है. आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए डीएमके की तरफ से कांग्रेस को 32 सीटों की पेशकश की गई है. 

कांग्रेस नेता तमिलनाडु में भी बिहार चुनाव की ही तरह तेवर दिखाने लगे हैं. ये तब भी हो रहा है, जब बिहार में आरजेडी के मुकाबले तमिलनाडु में डीएमके मजबूत स्थिति में है. सत्ता पर भी काबिज है. हर चुनाव की तरह तमिलनाडु में भी पहला पेच तो सीटों के बंटवारे पर ही फंसा है, लेकिन मुश्किलें और भी हैं. 

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सीटों का बंटवारा, असल में, भविष्य की संभावित सत्ता में साझेदारी की नींव होती है. और, ये तकरीबन सभी चुनाव पूर्व गठबंधनों पर लागू होती है. तमिलनाडु की मुश्किल एक अपवाद के कारण है. तमिलनाडु में चुनावी गठबंधन तो हो जाता है, लेकिन सत्ता में साझेदारी नहीं होती. ये अघोषित परंपरा चली आ रही है - लेकिन, अब कांग्रेस ये एकतरफा परंपरा हजम नहीं हो रही है. 

तमिलनाडु में सत्ताधारी डीएमके के सामने कांग्रेस के तीखे तेवर दिखाने एक बड़ी वजह, सूबे की राजनीति में एक नए प्लेयर की जोरदार एंट्री है. नए प्लेयर थलपति विजय हैं, जो चुनाव से पहले मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं. तमिलनाडु के कांग्रेस नेताओं का एक तबका डीएमके की जगह विजय की पार्टी टीवीके के साथ नए गठबंधन की पैरवी कर रहा है - लेकिन क्या ये राहुल गांधी को भी मंजूर होगा?

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क्या कांग्रेस-डीएमके गठबंधन खतरे में है?

तमिलनाडु में भी कांग्रेस ने अपनी डिमांड में बिहार की ही तरह अपने लिए सीटों की एक निश्चित संख्या रखी थी. लेकिन, डीएमके नेतृत्व ने असहमति दिखाई, और ज्यादा से ज्यादा 32 सीटें शेयर करने के संकेत दिए. बात न बनते देख कांग्रेस की तरफ से मांग घटाकर 38 सीटें की गई हैं. हालांकि, तमिलनाडु कांग्रेस के कुछ नेता इसे भी नाकाफी मान रहे हैं. 

डीएमके पर दबाव बढ़ाने के लिए कांग्रेस दो कदम आगे बढ़ाकर एक्टर विजय की पार्टी टीवीके के साथ चुनाव में जाने के संकेत देने लगी है. जैसे चुनाव से पहले बिहार में कांग्रेस गठबंधन के बजाए अकेले मैदान में उतरने के इशारे कर रही थी - बिहार में तो सारे पैंतरे मनमाफिक सीटें हासिल करने के मकसद से अपनाए जा रहे थे, लेकिन तमिलनाडु में मामला सत्ता में हिस्सेदारी तक पहुंच चुका है. 

कांग्रेस सांसद मनिकम टैगोर ने साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी सिर्फ सीटों के बंटवारे भर से संतुष्ट नहीं है, बल्कि गठबंधन के सत्ता में आने पर कांग्रेस सरकार में हिस्सेदारी भी चाहती है. टीवीके की तरफ से मिले ग्रीन सिग्नल के बाद कांग्रेस का भी जोश बढ़ने लगा है. 

असल में, TVK ने कांग्रेस को तमिलनाडु की राजनीति में अपना स्वाभाविक सहयोगी बताया है. टीवीके का ये रुख सामने आते ही तमिलनाडु की राजनीति में नए समीकरणों की अटकलें शुरू हो गई हैं. कांग्रेस को स्वाभाविक सहयोगी बताकर अभिनेता से नेता बने विजय डीएमके और AIADMK को वैसे ही समझाना चाहते हैं, जैसे मायावती कांग्रेस और बीजेपी के बारे में बयान देती रही हैं, एक सांपनाथ और दूसरा नागनाथ. 

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अब सिर्फ गठबंधन से काम नहीं चलेगा

तमिलनाडु में भी सत्ता में साझेदारी की बात मनिकम टैगोर ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं की राय बताई है. इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में मनिकम टैगोर अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं, क्योंकि तमिलनाडु में कोई भी पार्टी अपने दम पर चुनाव नहीं जीत सकती, और हर पार्टी को सहयोगियों की जरूरत होती है... हमने केंद्र में (यूपीए सरकार के दौरान) डीएमके को सत्ता में भागीदारी दी थी, और राज्य में भी वही फार्मूला होना चाहिए. अपनी दलील को पुख्ता करने के लिए मनिकम टैगोर कहते हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि कांग्रेस तमिलनाडु के लोगों से किए गए वादे पूरे करना चाहती है.

सूत्रों के हवाले से आई खबर के मुताबिक कांग्रेस के तमिलनाडु प्रभारी गिरीश चोडणकर के नेतृत्व में कुछ नेता 3 दिसंबर को मुख्यमंत्री एमके स्टालिन से सीट बंटवारे पर चर्चा के लिए मुलाकात की थी. बताते हैं कि तमिलनाडु कांग्रेस के नेता 15 दिसंबर तक ही सीट बंटवारे को अंतिम रूप देना चाहते थे. एक कांग्रेस नेता का कहना था, हम चाहते हैं कि हमारे शीर्ष नेता जल्द से जल्द चुनाव प्रचार शुरू करें. लेकिन, ये तभी संभव है जब हमें मालूम हो कि हम किन सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं. 

ऐसे नेताओं का तर्क भी वाजिब है, हमने बिहार से सबक लिया है और वही गलती दोहराना नहीं चाहते, जहां सीट बंटवारे की बातचीत आखिरी समय तक चलती रहती है. 

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बिहार में बंटवारे पर आखिरी दम तक सहमति नहीं बन सकी, और यही वजह रही कि कई सीटों पर दोस्ताना लड़ाई की नौबत आ गई. कांग्रेस को तो अपना उम्मीदवार भी वापस लेना पड़ा था. 

तमिलनाडु में भी कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही है. और, एक वजह गठबंधन में कांग्रेस के हिस्से में कम सीटें मिलना भी है. कांग्रेस के हिस्से की सीटों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है. 2011 में 63 से घटकर कांग्रेस के सीटों की संख्या 2016 में 41, और 2021 में 25 रह गई. वोट शेयर में भी ऐसी ही गिरावट दर्ज की गई. 2011 में कांग्रेस का वोट शेयर 9.3 फीसदी से घटकर पांच साल बाद 6.42 फीसदी और दस साल बाद 2021 में 4.27 फीसदी पर पहुंच गया था. 

कांग्रेस और टीवीके गठबंधन की कितनी संभावना है

रिपोर्ट के मुताबिक, TVK प्रवक्ता फेलिक्स जेराल्ड का दावा है कि उनके नेता विजय और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की अच्छी दोस्ती है. और, इसी कारण वो कांग्रेस के साथ गठबंधन की संभावना अधिक संभावना मानकर चल रहे हैं. वैसे फेलिक्स जेराल्ड को लगता है कि तमिलनाडु कांग्रेस नेतृत्व के अपने हितों के कारण बातचीत में देरी हो सकती है.

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, तमिलनाडु के कांग्रेस के सांसदों का मानना है कि जमीनी स्तर पर गठबंधन जिस तरह काम कर रहा है, उससे कार्यकर्ता खुश नहीं हैं. लेकिन, वे कांग्रेस-डीएमके गठबंधन पर एकमत नहीं हैं. न पक्ष में, न खिलाफ ही. कुछ नेता गठबंधन के ननए विकल्प विजय 

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हालांकि, गठबंधन के भविष्य को लेकर उनकी राय अलग-अलग है. कुछ सांसदों के बारे में चर्चा है कि वे नए विकल्प यानी विजय के साथ चुनाव में जाने के पक्षधर हैं, तो कुछ ऐसे भी हैं, जो ग्राउंड पर डीएमके के साथ टकराव के बावजूद बरसों पुराने राजनीतिक गठबंधन को यूं ही छोड़ देने के पक्ष में कतई नहीं हैं. 

ऐसे नेता पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का हवाला देते हुए याद दिलाते हैं कि कैसे 2004 में उनके प्रयासों से गठबंधन हुआ था. और, फिर सवाल होता है कि क्या किसी ने उनसे इस बारे में पूछा है? कुछ नेताओं ने राहुल गांधी को नए गठबंधन के लिए राजी करने की दिशा में प्रयास भी किया है.

डीएमके गठबंधन के पक्षधर नेताओं का कहना है कि राहुल गांधी और एमके स्टालिन के बीच रिश्ता बेहद अच्छा है. राहुल गांधी डीएमके नेता को ब्रदर कहकर बुलाते हैं. बिहार में वोटर अधिकार यात्रा में भी राहुल गांधी के सपोर्ट के लिए एमके स्टालिन पहुंचे थे. 

सवाल ये भी उठाया जा रहा है कि अगर विजय के साथ चुनावी गठबंधन हो जाता है, तो क्या राहुल गांधी टीवीके नेता के साथ मंच शेयर करेंगे? 

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