‘भगीरथ‘ मोदी... कैसे बिहार से बंगाल लेकर पहुंचे भाजपा की चुनावी गंगा

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की जीत को महज चुनावी जीत मानना गलत होगा. ये बदलाव किसी क्रांति से कम नहीं है. और ऐसे नतीजे पाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के उस संकल्प को याद करना जरूरी है, जो उन्होंने बिहार की जीत के तत्काल बाद लिया था.

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बंगाल चुनाव प्रचार में पीएम मोदी ने गंगा पर खास फोकस रखा. (फोटो- PTI) बंगाल चुनाव प्रचार में पीएम मोदी ने गंगा पर खास फोकस रखा. (फोटो- PTI)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 04 मई 2026,
  • अपडेटेड 1:33 PM IST

बंगाल का चुनावी महासंग्राम नतीजे तक पहुंच गया. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के सपने को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरा कर दिखाया. भाजपा पहली बार बंगाल में सरकार बनाने जा रही है. भाजपा की चुनावी गंगा को पटना से आगे ले जाने के ल‍िए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भगीरथी प्रयास सबने देखा. पार्टी गंगोत्री धाम वाले उत्तराखंड में तो पहले से ही सत्ता में रही, फिर भाजपा का परचम यूपी और बिहार आकर रुक गया था. लेकिन, अब बंगाल के नतीजों के बाद बारी है पूरब के भाग्य का नया अध्याय ल‍िखे जाने की.

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4 मई की सुबह जब बंगाल की हवाओं में चुनावी नतीजों का शोर घुला हुआ है, तो हार-जीत के आंकड़ों से इतर एक बड़ी तस्वीर उभर कर सामने आ रही है. कोलकाता के कालीघाट से लेकर दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग तक, आज चर्चा सिर्फ इस बात की नहीं है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कौन बैठेगा, बल्कि चर्चा इस बात की है कि भारतीय राजनीति के इस सबसे बड़े और भीषण युद्ध ने देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर क्या प्रभाव छोड़ा है. बंगाल चुनाव 2026 केवल एक राज्य का चुनाव नहीं था, बल्कि यह दो विचारधाराओं, दो अस्मिताओं और दो महाशक्तियों के बीच का ऐसा टकराव था, जिसने भारतीय राजनीति की व्याकरण बदल दी है.

पटना से कोलकाता: गंगा का राजनीतिक प्रवाह

इस पूरे चुनाव को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे मुड़कर बिहार चुनाव के नतीजों की उस शाम को याद करना होगा. जब दिल्ली में भाजपा मुख्यालय पर कार्यकर्ताओं का हुजूम उमड़ा था, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बड़ी बात कही थी. उन्होंने बिहार की जीत को 'विकास की जीत' बताते हुए संकेत दिया था कि पटना की जो 'गंगा' भाजपा के लिए जीत की धारा लेकर आई है, उसे अब बंगाल की ओर मुड़ना है. प्रधानमंत्री का वह बयान महज एक चुनावी नारा नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक बिसात थी.

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बिहार में एनडीए की क्लीन स्वीप के बाद भाजपा का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर था. लेक‍िन  मोदी जानते थे क‍ि गंगा के ल‍िए आगे का रास्‍ता आसान नहीं होगा. उनका 'भगीरथी प्रयास' उसी दिन से शुरू हो गया था. उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया था कि भाजपा के लिए बंगाल अब सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि एक मिशन है. जिस तरह भगीरथ ने गंगा को जमीन पर लाने के लिए कठोर तपस्या की थी, उसी तरह प्रधानमंत्री ने बंगाल की सत्ता के शिखर तक पहुंचने के लिए अपनी पूरी ऊर्जा झोंक दी.

अंग, बंग और कलिंग: पूर्वी भारत का त्रिकोण

प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों में अक्सर 'अंग, बंग और कलिंग' का जिक्र आता है. यह महज भौगोलिक शब्द नहीं हैं, बल्कि भाजपा की 'ईस्टर्न इंडिया' यानी पूर्वी भारत की उस रणनीति का हिस्सा हैं, जो बिहार (अंग), बंगाल (बंग) और ओडिशा (कलिंग) को जोड़ती है. भाजपा ने बिहार में अपनी जड़ें मजबूत कर ली हैं, ओडिशा में वह पहली बार सत्‍ताधारी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन 'बंग' यानी बंगाल हमेशा से उसके ल‍िए दूर की कौड़ी ही रहा है. यहां लेफ्ट के पतन के बाद भाजपा दूसरे पायदान पर तो आ गई, लेक‍िन उसका नंबर 2 होना, टीएमसी से बहुत पीछे रहा.

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प्रधानमंत्री का मानना था कि जब तक बंगाल का पुनरुद्धार नहीं होगा, तब तक पूर्वी भारत का विकास अधूरा है. उन्होंने अपनी रैलियों में बार-बार यह मुद्दा उठाया कि यदि भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनना है, तो बंगाल को उसका इंजन बनना ही होगा. 'लुक ईस्ट' पॉलिसी से लेकर 'एक्ट ईस्ट' तक, बंगाल इस पूरी चेन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है.

कैंपेन की बारीकियां और रैलियों का रेला

बंगाल चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह का फिजिकल और डिजिटल कैंपेन चलाया, वह अभूतपूर्व था. उन्होंने बंगाल के हर कोने, चाहे वह उत्तर बंगाल के चाय बागान हों या दक्षिण बंगाल के सुंदरवन के इलाके, हर जगह अपनी मौजूदगी दर्ज कराई. उन्‍होंने 15 से अधिक रैलियां और रोडशो किए. रैलियों में भीड़ का जो सैलाब उमड़ा, उसने बंगाल की चुनावी गर्मी को और बढ़ा दिया.

मोदी का कैंपेन 'प्रो-इंकम्बेंसी' और 'एंटी-इंकम्बेंसी' के बीच एक महीन संतुलन बनाने की कोशिश थी. उन्होंने केंद्र सरकार की योजनाओं जैसे कि उज्ज्वला, पीएम-किसान और आयुष्मान भारत का जिक्र करते हुए यह समझाने की कोशिश की कि कैसे बंगाल की जनता को इन लाभों से वंचित रखा गया है. उनके भाषणों में 'पाल्टानो दोरकार, चाई बीजेपी सरकार' (बदलाव चाह‍िए, बीजेपी सरकार चाह‍िए) का नारा एक ऐसा हुक बन गया था, जिसने बंगाल के युवाओं और महिलाओं को सीधे तौर पर कनेक्ट किया.

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'बाहरी' का टैग हटाने के ल‍िए सीधा संस्‍कृत‍ि और मह‍िलाओं से जुड़े

प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम बंगाल में 'बाहरी' होने के टैग को हटाने के लिए बंगाली कल्चर और महिलाओं से सीधा संपर्क बनाया. उन्होंने ठंठन‍िया कालीबाड़ी में मां स‍िद्धेश्‍वरी माता मंद‍िर में दर्शन क‍िए और मतुआ ठाकुर मंदिर में पूजा  की. बैरकपुर रोड शो में उन्‍होंने बंगाल की अपनी यात्राओं को 'तीर्थ यात्रा' बताकर अपनी आध्यात्मिक छवि पेश की. बीजेपी ने चर्च‍ित आरजी कार मेड‍िकल कॉलेज की मृत रेप पीड़िता की मां रत्‍ना देबनाथ को कोलकाता के पानीहटी इलाके से चुनाव मैदान में उतारा था. पीएम मोदी ने खासतौर पर उनके न‍िर्वाचन क्षेत्र में एक रैली की.

पीएम का बंगाली भाषा में ओपन लेटर लिखना, हुगली के नाविकों से मिलना और झालमुड़ी का स्वाद लेना साबित करने के लिए काफी था कि वे बंगाल की जड़ों से जुड़े हैं. इन सॉफ्ट इवेंट्स के जरिए उन्होंने खुद को एक 'अभ‍िभावक' के रूप में पेश कर टीएमसी के 'आउटसाइडर' वाले नैरेटिव का प्रभावी जवाब दिया.

मुद्दों की राजनीति और अस्मिता का टकराव

प्रधानमंत्री ने अपने भाषणों में टीएमसी सरकार पर भ्रष्टाचार, अराजकता, महिलाओं से जुड़े गंभीर अपराध को लेकर न‍िशाना साधा. प‍िछले चुनाव में पीएम मोदी ने दीदी (ममता बनर्जी) पर निशाना साधते हुए कहा था "दीदी, ओ दीदी", ज‍िसे लेकर टीएमसी ने काफी ऐतराज जताया था और चुनाव में उसे मुद्दा भी बनाया था. इस बार पीएम मोदी ने ऐसा कोई मौका नहीं द‍िया. वह सीधे तौर पर सत्ता विरोधी लहर को हवा देने की कोशिश करते रहे. इसके साथ ही, वे बंगाल में जहां-जहां गए, वहां के स्‍थानीय समुदाय के मुद्दों को उठाते रहे.

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पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार और बंगाल की नई पहचान

प्रधानमंत्री का बंगाल विजन इस बात पर टिका है कि बंगाल को उत्तर-पूर्वी राज्यों और दक्षिण-पूर्वी एशिया के लिए 'गेटवे' बनाना है. उनका तर्क था कि जो बंगाल कभी पूरे देश का नेतृत्व करता था, वह आज उद्योगों और रोजगार के मामले में पिछड़ गया है. उन्होंने बार-बार बंगाल का पुराना गौरव उसे लौटाने की बात की.

आज यानी 4 मई के नतीजे से तय है कि बंगाल की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रहेगी. भाजपा ने बंगाल में जो स्पेस बनाया है, वह एक स्थायी बदलाव का संकेत है. इससे भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा 'शिफ्ट' होगा.

प्रधानमंत्री मोदी ने जिस 'भगीरथी प्रयास' की शुरुआत बिहार से की थी, वह बंगाल के चुनावी समर में पूरी तरह फलीभूत होता दिखा. उन्होंने 'सबका साथ, सबका विकास' के मंत्र को बंगाल की जटिल सामाजिक संरचना में फिट करने की भरपूर कोशिश की.

आज बंगाल ने देश को एक नई राजनीतिक बहस दी है. यह बहस विकास बनाम अस्मिता की है, यह बहस राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय की है. सत्ता की गंगा अब किस ओर बहेगी, यह तो आने वाले वक्त के विकास कार्यों से तय होगा, लेकिन फिलहाल बंगाल ने अपनी राजनीतिक चेतना से पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है. प्रधानमंत्री का बंगाल मिशन सफल रहा या नहीं, यह सिर्फ सीटों से नहीं, बल्कि बंगाल के भविष्य के लिए रखे गए विजन से आंका जाना चाहिए.

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