दिल्ली के चितरंजन पार्क में दीपजय दत्ता के पहली मंजिल वाले घर में मातम पसरा हुआ है. आज वो 'दीपजय' नहीं बल्कि 'दीपकष्ट' दत्ता बने हुए हैं. दत्ता साहब का जन्म और परवरिश कोलकाता में हुई है और आज वो दिल्ली में पीआर इंडस्ट्री (जनसंपर्क) में एक मोटी सैलरी वाली नौकरी कर रहे हैं. बंगाल के चुनावी नतीजों को आए एक हफ्ता हो चुका है, लेकिन दत्ता साहब अभी भी सदमे में हैं कि आखिर ये हुआ कैसे?
पिछले कई महीनों से वे बीजेपी शासित राज्यों के अपने सहयोगियों का मज़ाक उड़ा रहे थे. उन्हें बार-बार गर्व से बता रहे थे कि भारत में बहती 'भगवा लहर' के खिलाफ सिर्फ उनके गृह राज्य की रीढ़ की हड्डी ही सीधी खड़ी रह सकती है. वो दोस्तों को ज्ञान दे रहे थे कि बंगाली एक 'अलग प्रजाति' के होते हैं. और सचमुच, वो थे भी.
यह 'प्रजाति' साऊथ दिल्ली के चितरंजन पार्क में रहती है, साऊथ बॉम्बे के नेपियन सी रोड वाले फ्लैटों में पाई जाती है, बैंगलोर के इंदिरानगर कैफे में और लंदन के साउथहॉल वाले अपार्टमेंट्स में दिखती है. न्यू जर्सी में तो आपको हर दूसरा आदमी ऐसा ही मिलेगा- इंजीनियर जो जादवपुर यूनिवर्सिटी से पढ़ा हो और ऋत्विक घटक की फिल्मों पर जिसका एक 'गंभीर विचार' हो.
इन्हें कहते हैं NRB यानी नॉन-रेसिडेंट बंगाली. सालों से इन्होंने एक पवित्र जिम्मेदारी उठा रखी थी: बंगाल की 'आत्मा' का बोझ ढोना, जिससे खुद बंगाल को ये सब न करना पड़े.
असल में इनके लिए बंगाल सिर्फ एक राज्य नहीं है, बल्कि एक 'सभ्यता' का प्रोजेक्ट है. यह टैगोर, बोस और सत्यजीत रे का मेल है. यह अड्डा, मिष्टी दोई और 'कोलकाता' का सही उच्चारण है. यह एक वामपंथी-उदारवादी (लेफ्ट-लिबरल) सांस्कृतिक रसूख है, जिसने इन प्रवासियों को दिल्ली की सर्दियों और बैंगलोर की पार्टियों में गर्माहट दी है. NRB के लिए बंगाल उनकी आत्म-छवि का पुश्तैनी घर है. और अब, उसी बंगाल ने बीजेपी को वोट दे दिया.
207 सीटें. इतिहास में पहली बार बीजेपी ने बंगाल की सत्ता पर कब्ज़ा किया है. बंगाल की जनता ने 15 साल के कुशासन, सिंडिकेट राज, भ्रष्टाचार और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की उस खास प्रतिभा- जिसमें वो राजनीतिक हिंसा को एक 'सांस्कृतिक परंपरा' बना देते थे- से तंग आकर वो कर दिया जिसके बारे में सोचना भी इनके लिए पाप था: उन्होंने विकल्प चुन लिया.
और बंगाल ने इसका जश्न मनाया. यही वो बात है, जिसे दिल्ली-बॉम्बे में बैठा NRB पचा नहीं पा रहा. वो तस्वीर उनके दिमाग से नहीं निकल रही कि मिदनापुर, बांकुरा और बीरभूम के उन कस्बों में- जहां सिंडिकेट बदलने पर ही झंडा बदलता था- वहां लोग सड़कों पर ऐसे उतरे जैसे लंबे सूखे के बाद पहली बारिश हुई हो.
उन हाउसिंग सोसायटियों में जहां पहले वोटिंग के दिन बुजुर्गों को टीएमसी के गुंडे घरों में बंद कर देते थे, वहां लोग मुस्कुराते हुए वोट डालकर निकले. यह जश्न किसी पार्टी द्वारा प्रायोजित नहीं था. यह कुछ और था- यह 'राहत' थी. वर्धमान की एक गृहिणी, जिसने अपने पति को तीन साल तक सरकारी टेंडर हारते देखा क्योंकि उसने 'कट मनी' (कमीशन) देने से मना कर दिया था, वह अपने आंगन में बैठकर चुपचाप रो रही थी. दुख से नहीं, सुकून से. लेकिन NRB इस फर्क को कभी नहीं समझ पाएगा.
सोशल मीडिया पर बंगाल के 'बुद्धिजीवी' दुख का ऐसा प्रदर्शन कर रहे हैं कि उस पर एक नया 'रवींद्र संगीत' बन जाए. कवि टैगोर की तस्वीरें लगा रहे हैं, फिल्मकार लोकतंत्र की मौत पर कोट्स डाल रहे हैं. उन्हें यह भी याद नहीं कि अंधेरा होने के लिए पहले कभी बल्ब का जलना भी जरूरी था. रिटायर्ड प्रोफेसर 'साझा संस्कृति' के खत्म होने पर लंबे थ्रेड लिख रहे हैं.
एक मशहूर हस्ती ने बंगाली में लिखा कि ’उन्हें अपनी जन्मभूमि अब पहचानी नहीं जा रही’, और इस पर उन 17,000 लोगों ने लाइक किया, जिन्होंने पिछले आठ साल से अपनी जन्मभूमि की शक्ल तक नहीं देखी है. पत्रकार इसे ’चुनावी शुचिता की परीक्षा’ बता रहे हैं, लेकिन वही लोग चुप थे, जब पंचायत चुनावों के दौरान मतपेटियां तालाबों में तैर रही थीं.
NRB के पास अब छिपने के लिए एक बहाना है- 'एसआईआर' (SIR) यानी वोटर लिस्ट का संशोधन. उनका कहना है कि नाम काटे गए, गड़बड़ी हुई. यह एक जायज शिकायत हो सकती है, लेकिन NRB ने इसे एक ऐसा किला बना लिया है, जिसमें बैठकर उन्हें बंगाल के असल वोटरों से बात करने की जरूरत ही न पड़े. उनके हिसाब से ’जनता ने नहीं चुना, बल्कि जनता के साथ धोखा हुआ.’
जो बात ये NRB नहीं कह पा रहे, वो यह है कि भारी संख्या में बंगाल की जनता बाहर निकली और उसने बदलाव के लिए वोट दिया. यह वो आंकड़ा है, जिसे NRB ने ’चोरी’ की फाइल में डाल दिया है. जनादेश स्पष्ट है, बस उन्हें छोड़कर सबको दिख रहा है.
दूसरी तरफ, जो लोग सच में हारे हैं यानी टीएमसी के नेता, वे हार के वो कारण गिना रहे हैं, जो NRB के प्लान में नहीं थे. वे आरजी कर अस्पताल कांड, संदेशखाली और मुस्लिम वोटों के बंटवारे की बात कर रहे हैं.
इधर चितरंजन पार्क में दत्ता साहब ने अपने पड़ोसियों और मछली बेचने वाले तक को बता दिया था कि ’दीदी कभी नहीं हार सकतीं.’ और अब दीदी हार गई हैं. वो भी ऐसी करारी हार, जिसका गणित किसी भी दार्शनिक तर्क से नहीं सुधारा जा सकता.
दत्ता साहब अब हावड़ा में रहने वाले अपने रिश्तेदारों से बात नहीं कर रहे हैं. उनकी नज़र में ये ’गद्दारी’ है. उन छोटे भाइयों और बहनों ने अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों (नौकरी, सड़क, सुरक्षा) के लिए वोट दिया, जबकि उन्हें दिल्ली में बैठे ’भद्रलोक’ के आत्म-सम्मान के लिए वोट देना चाहिए था. ’जघन्य काज!’ (कितना घिनौना काम).
वामपंथी-उदारवादी बंगाली का असल बंगाली वोटर के साथ रिश्ता हमेशा से पेचीदा रहा है. अगर वोटर बहुत करीब आ जाए, तो वो असुविधाजनक लगने लगता है. वोटर को नौकरी चाहिए, सड़क चाहिए और ये चाहिए कि ’गलत’ पार्टी को वोट देने पर उसे पीटा न जाए. बंगाल के बंगाली की चिंताएं 'भौतिक' हैं, जबकि प्रवासी NRB की चिंताएं 'सभ्यताओं' की हैं.
NRB चाहता था कि बंगाल धर्मनिरपेक्षता का आखिरी किला बना रहे, हिंदुत्व के खिलाफ एक सांस्कृतिक ढाल बना रहे. बंगाल से उम्मीद की गई थी कि वो इस वैचारिक बोझ को उठाता रहे, चाहे अंदर से वहां की व्यवस्था सड़ चुकी हो.
ममता बनर्जी के शब्द उनके लिए मरहम की तरह हैं- ’चोरी हुई,’ ’अनैतिक है.’ ये शब्द उस दुनिया को बचाए रखते हैं, जो 3 मई (गिनती शुरू होने) से पहले थी. लेकिन 93 फीसदी मतदान हुआ और भगवा रंग ने बाजी मार ली. बीरभूम या बांकुरा के किसी साधारण बंगाली ने, जो सालों से कट-मनी और गुंडागर्दी से पिस रहा था, अपना हिसाब किताब कर लिया और एक चुनाव कर लिया.
यह चुनाव 'लुटियंस दिल्ली' के माहौल में फिट नहीं बैठता. यह बंगाल के उस 'पुनर्जागरण' (Renaissance) की कविताओं से मेल नहीं खाता, जिसका गुणगान ये बुद्धिजीवी करते हैं.
खैर, NRB जल्द ही संभल जाएंगे. अगले कुछ हफ्तों में बड़े-बड़े अखबारों में लंबे लेख छपेंगे कि ’इस जीत का लोकतंत्र और टैगोर के भारत के लिए क्या मतलब है.’ वे लेख बहुत खूबसूरती से लिखे जाएंगे. बस उनमें बीरभूम के उस वोटर का जिक्र नहीं होगा, जिसने वोट दिया है. क्योंकि उस वोटर को बोलने की जरूरत नहीं है, वो बोल चुका है. बस NRB सुन नहीं रहा था.
(यह आर्टिकल Indiatoday.in के लिए लिखे गए मूल लेख का अनुवाद है.)
कमलेश सिंह