विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने भोजशाला मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश का स्वागत किया है. VHP ने कहा कि यह फैसला भारत की सांस्कृतिक विरासत और सनातन परंपरा की अहम पुष्टि है. हिंदू पक्ष के लिए एक बड़ी जीत के रूप में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने शुक्रवार को घोषणा की कि धार जिले में स्थित विवादित भोजशाला परिसर देवी सरस्वती को समर्पित एक प्राचीन मंदिर है और केंद्र सरकार तथा ASI इसके प्रशासन व प्रबंधन पर फैसला ले सकते हैं.
VHP के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने इस फैसले की सराहना करते हुए कहा, "अब हिंदुओं को भोजशाला में बिना किसी रुकावट के पूजा-अर्चना करने का अधिकार मिलेगा."
कुमार ने एक बयान में कहा, "मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाया है कि धार स्थित भोजशाला एक हिंदू मंदिर है. कोर्ट ने यह भी कहा कि भोजशाला में पूजा-अर्चना की विधि और परंपरा हमेशा से हिंदू मंदिर जैसी रही है."
उन्होंने कहा कि यह फैसला भारत की सांस्कृतिक चेतना, सत्य और सनातन परंपरा की महत्वपूर्ण पुष्टि है."
भोजशाला: संस्कृत और शोध का वैश्विक केंद्र
भोजशाला को केवल मां वाग्देवी की पूजा-अर्चना का स्थान ही नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे प्राचीन काल की तरह संस्कृत और धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन का एक वैश्विक केंद्र बनना चाहिए."
आलोक कुमार ने कहा, "इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए समाज और सरकार दोनों को मिलकर काम करना होगा. इस स्थान की आध्यात्मिक ऊर्जा पूरे विश्व में दिव्य प्रकाश फैलाएगी.
शांति और सद्भाव की अपील
इस फैसले को संतुलित और सकारात्मक बताते हुए कुमार ने समाज के सभी वर्गों से इस निर्णय को स्वीकार करने और शांति व सद्भाव बनाए रखने की अपील की.
उन्होंने कहा, "यह किसी की जीत या हार नहीं है. हमें कोर्ट के आदेशों और संवैधानिक प्रक्रियाओं का सम्मान करना चाहिए. यह फैसला किसी भी समुदाय की हार नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक सच्चाई और सांस्कृतिक न्याय की बहाली है.
कुमार ने कहा कि यह फैसला विस्तृत न्यायिक प्रक्रिया के बाद आया है, जिसमें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की जांच, दोनों पक्षों की दलीलें और न्यायाधीशों का खुद निरीक्षण शामिल था."
वैज्ञानिक विश्लेषण, सभी पक्षों को सुनने और संरचना का भौतिक निरीक्षण करने के बाद यह फैसला सुनाया गया है." उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्यों और हिंदू पूजा की निरंतर परंपरा के आधार पर भोजशाला को देवी वाग्देवी के प्राचीन मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र के रूप में मान्यता दी है.
मां वाग्देवी की मूर्ति की घर वापसी
यह फैसला केवल एक स्थल से संबंधित नहीं है, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और सभ्यतागत पहचान से जुड़ा है. कुमार ने अदालत की उस टिप्पणी का भी स्वागत किया जिसमें केंद्र सरकार से मां सरस्वती की मूर्ति को भारत वापस लाने के आवेदनों पर विचार करने को कहा गया है. यह मूर्ति फिलहाल ब्रिटिश संग्रहालय में रखी हुई है. उन्होंने कहा कि यह मूर्ति भारत की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है और इसे भोजशाला में अपने मूल स्थान पर दोबारा स्थापित किया जाना चाहिए.
फैसले के मुख्य बिंदुओं पर VHP की राय
कुमार ने उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार और ASI भोजशाला के संरक्षण, प्रबंधन और संस्कृत शिक्षा की गौरवशाली परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए जरूरी कदम उठाएंगे.
हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने यह भी कहा कि मुस्लिम समुदाय, जो इस 11वीं सदी के स्मारक को कमाल मौला मस्जिद कहता है, जिले में मस्जिद निर्माण के लिए अलग जमीन के आवंटन हेतु राज्य सरकार से संपर्क कर सकता है.
भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद विवाद पर अपने बहुप्रतीक्षित फैसले में अदालत ने टिप्पणी की कि भोजशाला में संस्कृत शिक्षण केंद्र और देवी सरस्वती के मंदिर के अस्तित्व के संकेत मिले हैं.
हाई कोर्ट ने कहा कि भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवादित परिसर का धार्मिक स्वरूप यह संकेत देता है कि यह देवी सरस्वती का मंदिर है. अदालत ने 2003 का ASI आदेश रद्द कर दिया, जिसमें मुसलमानों को भोजशाला परिसर में शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई थी.
क्या है पूरा मामला
यह लंबे समय से चला आ रहा विवाद धार जिले में ASI की ओर से संरक्षित स्मारक के धार्मिक स्वरूप से जुड़ा है. हिंदू समुदाय भोजशाला को वाग्देवी (देवी सरस्वती) को समर्पित मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद कहता है.
जैन समुदाय के एक याचिकाकर्ता का दावा है कि यह मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल है. विवाद छिड़ने के बाद ASI ने 7 अप्रैल 2003 को आदेश जारी कर हिंदुओं को हर मंगलवार और मुसलमानों को हर शुक्रवार को परिसर में पूजा-अर्चना की अनुमति दी थी. हिंदू पक्ष ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी और परिसर में पूजा का विशेष अधिकार मांगा.
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