भोजशाला विवाद में जैन पक्ष की एंट्री ने बदला समीकरण, मूर्ति पर नया दावा, मांगा पूजा-अर्चना का अधिकार

धार भोजशाला केस में अब जैन समुदाय ने याचिका दाखिल कर दी. दावा किया कि ब्रिटिश म्यूजियम की प्रतिमा सरस्वती नहीं, जैन यक्षिणी अंबिका की है. समाज ने अब हाई कोर्ट से पूजा की अनुमति मांगी है और 2003 के आदेश को चुनौती दी.

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भोजशाला में अब 'त्रिकोणीय' जंग.(File Photo:ITG) भोजशाला में अब 'त्रिकोणीय' जंग.(File Photo:ITG)

aajtak.in

  • इंदौर/धार,
  • 07 मई 2026,
  • अपडेटेड 3:50 PM IST

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में बुधवार को जैन समाज की ओर से दायर की गई याचिका पर सुनवाई हुई. इस याचिका में दावा किया गया कि भोजशाला हिंदू मुस्लिम का स्थान नहीं, बल्कि जैन समाज का तीर्थ स्थल है. जो प्रतिमा वाग्देवी की बताई जा रही है, वह जैन समुदाय की आराध्य मां अंबिका की है. यह परिसर मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल था. जैन याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट से अपील की कि उनके समुदाय को पूजा करने का अधिकार दिया जाए.  

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दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता सालेक चंद जैन ने एक जनहित याचिका (PIL) में यह दावा किया है. यह याचिका ऐसे समय में दायर की गई है, जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) संरक्षित इस स्मारक के धार्मिक स्वरूप को लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्षों की ओर से दायर मामले पहले से ही हाई कोर्ट में लंबित हैं.

ASI के 2003 के आदेश को चुनौती

जैन के वकील दिनेश पी राजभर ने इंदौर पीठ के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस राजेश कुमार गुप्ता के समक्ष ASI के 2003 के एक आदेश को चुनौती दी.

इस आदेश के तहत हिंदुओं को हर मंगलवार को भोजशाला परिसर के अंदर पूजा करने की अनुमति है, जबकि मुसलमानों को शुक्रवार को इस स्थल पर नमाज अदा करने की अनुमति दी गई है.

वास्तुकला और ऐतिहासिक प्रमाण

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राजभर ने दावा किया कि भोजशाला परिसर में कभी एक जैन मंदिर और एक गुरुकुल हुआ करता था.

संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर जोर देते हुए उन्होंने कहा, "संविधान के तहत जैन धर्म के अनुयायियों को भोजशाला परिसर में पूजा करने का अधिकार है."

राजा भोज का संरक्षण

राजभर ने तर्क दिया कि धार के राजा भोज हिंदू और जैन, दोनों धर्मों के विद्वानों के संरक्षक थे. उनके अनुसार, 11वीं सदी के इस स्मारक में संचालित शैक्षिक केंद्र में जैन विद्वान भी मौजूद थे.

राजभर ने ऐतिहासिक विवरणों और पुरातात्विक सामग्रियों का हवाला देते हुए दावा किया कि भोजशाला की संरचना के कुछ हिस्सों पर जैन वास्तुकला का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है.

दिलवाड़ा मंदिरों से तुलना

उन्होंने 1882 में शिमला के सरकारी सेंट्रल प्रेस की प्रकाशित एक रिपोर्ट और अन्य प्रकाशनों का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि विवादित परिसर में स्थित मस्जिद के कुछ हिस्से जैन समुदाय से जुड़ी इमारतों के अवशेषों से बनाए गए थे और इसके कुछ गुंबदों और खंभों की तुलना माउंट आबू (राजस्थान) के प्रसिद्ध दिलवाड़ा जैन मंदिरों से की गई थी.

वाग्देवी या यक्षिणी अंबिका?

फोटो और म्यूजियम के रिकॉर्ड्स का हवाला देते हुए राजभर ने तर्क दिया कि लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में रखी एक प्रतिमा, जिसे हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) की प्रतिमा होने का दावा करता है, वास्तव में जैन यक्षिणी अंबिका की प्रतिमा है. 

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उन्होंने तर्क दिया कि इस मूर्ति पर जैन तीर्थंकरों के प्रतीक चिह्न हैं और यह विशिष्ट विशेषता इसे देवी सरस्वती की हिंदू शैली की मूर्तियों से अलग करती है.

राजभर ने दावा किया कि ASI ने 2024 में HC के निर्देश पर भोजशाला के वैज्ञानिक सर्वेक्षण पर अपनी रिपोर्ट में इस स्मारक के साथ जैन समुदाय के ऐतिहासिक जुड़ाव को नजरअंदाज कर दिया.

उन्होंने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार विवादित स्मारक के संबंध में एक समुदाय के दावों का सीधे तौर पर समर्थन कर रही है और यह रवैया संदेह पैदा करता है.

बता दें कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच 6 अप्रैल से भोजशाला मंदिर-कमल मौला मस्जिद परिसर की धार्मिक प्रकृति के संबंध में दायर 5  याचिकाओं और एक रिट अपील पर नियमित रूप से सुनवाई कर रही है. हिंदू समुदाय भोजशाला को वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद के रूप में पहचानता है.

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