साहित्य आजतक में जब सधेंगे सुरः शुरुआत जावेद अली से और समापन उस्ताद राशिद खान के शो के साथ

'साहित्य आजतक' का आयोजन दिल्ली के इंडिया गेट स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में 16, 17 और 18 नवंबर को होगा. यह महाकुंभ इस बार सौ के करीब सत्रों में बंटा है, जिसमें 200 से भी अधिक विद्वान, कवि, लेखक, संगीतकार, अभिनेता, प्रकाशक, कलाकार, व्यंग्यकार और समीक्षक हिस्सा ले रहे हैं.

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जावेद अली (तस्वीर- ट्विटर) जावेद अली (तस्वीर- ट्विटर)

देवांग दुबे गौतम

  • नई दिल्ली,
  • 15 नवंबर 2018,
  • अपडेटेड 5:07 PM IST

'साहित्य आजतक' केवल साहित्य का ही महाकुंभ नहीं है, बल्कि इसमें सुरों की दुनिया की बेताज हस्तियां भी जुटेंगी. 'साहित्य आजतक' में जुटने वाले सूफी संगीत के सितारों की बात करें तो शुरुआत जावेद अली से और समापन उस्ताद राशिद खान के शो से होगा. खास बात यह कि सूफी संगीत के इन दिग्गजों के बीच भजन सम्राट अनूप जलोटा भी होंगे. आइए सुरों की इस महफिल को सजाने वाले सितारों के बारे में जानते हैं.

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जावेद अलीः जावेद अली की आवाज सीधे दिल में उतरती है. उनकी रूहानी आवाज में सूफी और बॉलीवुड संगीत समान रूप से सुरीले सुनाई देते हैं. जावेद ने 'कहने को जश्न-ए-बहारां', 'अर्जियां', 'कुंग फाया कुंग', 'मौला अली मौला' और 'तू ही हकीकत' जैसे गानों से संगीत प्रेमियों के दिल में एक खास जगह बनाई है.

उस्ताद पूरन चंद वडाली और लखविंदर वडालीः 'तू माने या न माने दिलदारा, असां तो तेनू रब मनया...' जैसे गाने से हर दिल पर छाए पंजाबी-सूफी गानों की शान पूरनचंद वडाली ‘वडाली ब्रदर्स’ फेम के बड़े भाई हैं. छोटे भाई प्यारे लाल वडाली के इसी साल बिछड़ जाने से यह जोड़ी कमजोर हुई पर इनके गानों ने पूरी दुनिया में धूम मचाई. ‘रंगरेज मेरे, रंगरेज मेरे’, ‘दमादम मस्त कलंदर’, ‘एक तू ही तू ही, तू ही- तू ही’ और ‘सोहने यार’ आपके चर्चित गाने हैं. लखविंदर वडाली जी वडाली घराने की तीसरी पीढ़ी के होनहार वारिस हैं.

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अनूप जलोटाः अपनी भजन और गजल गायिकी से हिंदुस्तान के घर-घर में सुने जाने वाले अनूप जलोटा भजन सम्राट के रूप में भी मशहूर हैं. आपने 'ऐसी लागी लगन', 'जग में सुंदर हैं दो नाम ', 'चांद अंगड़ाइयां ले रहा है', 'सूरज की गरमी से' जैसी सैकड़ों मशहूर गजलें गाई हैं.

उस्ताद राशिद खानः पंडित भीमसेन जोशी ने उस्ताद राशिद खान को 'भारतीय गायिकी के भविष्य का भरोसा' कहा था. उस्ताद राशिद खान ने सूफी गायिकी को एक अलग ही मुकाम दिया. कबीर के निर्गुण हों 'याद पिया कि आए...’ उनके गानों की बुलंदी अलग ही सुनाई देती है. आपने ’ऐ री माई री, चंदरिया झीनी री झीनी, अईयो पिया जी, अल्ला ही रहीम, छीने रे मोरा चैन जैसे अनगिनत गाने गाए.

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