मच्छर हो रहे स्मार्ट! स्प्रे की महक से डरने की जगह आ रहे पास, नई रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा

Tips to get rid of mosquitos: मच्छरों से निपटने के लिए हम सभी स्प्रे और क्रीम्स का यूज करते हैं लेकिन एक नई स्टडी में सामने आया है कि दूर भगाने के लिए लोग जिन स्प्रे को हम अपना सबसे बड़ा हथियार मानते हैं, वही खून चूसने वाले खतरनाक मच्छरों को आपकी तरफ आकर्षित कर सकते हैं.

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मच्छरों से कैसे निपटें (Photo: ITG) मच्छरों से कैसे निपटें (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 29 मई 2026,
  • अपडेटेड 8:44 PM IST

Tips to get rid of mosquitos: गर्मियों का मौसम आते ही मच्छरों का आतंक बढ़ जाता है और इनसे बचने के लिए हम सब का सबसे भरोसेमंद हथियार होता है मच्छर भगाने वाला रिपेलेंट स्प्रे. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस खुशबू या केमिकल से आप मच्छरों को दूर भगाने की सोच रहे हैं, वही उन्हें आपके और करीब ला सकता है.

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खतरनाक बीमारियों फैलाते हैं मच्छर

मच्छर केवल आपको परेशान ही नहीं करते बल्कि ये खतरनाक और जानलेवा बीमारियों को भी दावत देते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, मच्छरों से होने वाली बीमारियों के कारण हर साल लगभग 7,00,000 लोगों की मौत हो जाती है.

रिसर्च में मिले हैरान करने वाले नतीजे

अब वैज्ञानिकों के नए शोध से पता चला है कि हर साल गर्मियों में जिन मच्छरों को दूर भगाने के लिए लाखों लोग अपने ऊपर मच्छर भगाने वाला स्प्रे (मॉसकिटो रिपेलेंट) छिड़कते हैं, वो समय के साथ स्मार्ट होते जा रहे हैं. खून चूसने वाले ये खतरनाक मच्छर इस रिपेलेंट स्प्रे की गंध को दूर भागने के संकेत के बजाय अपने भोजन से जोड़कर देखना सीख सकते हैं. 

आमतौर पर दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले इन मॉस्किटो रिपेलेंट स्प्रे में DEET नामक केमिकल का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जाता है जिसका रासायनिक नाम N,N-diethyl-meta-toluamide है जिसे मच्छरों के खिलाफ सबसे सुरक्षित और अचूक हथियार माना जाता है और यूके हेल्थ सिक्योरिटी एजेंसी भी मच्छरों के काटने से बचने के लिए इसी केमिकल वाले स्प्रे के इस्तेमाल की आधिकारिक सलाह देती है. 

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मच्छरों के व्यवहार में दिखा ये चेंज

चूंकि मच्छरों के काटने से होने वाली जानलेवा बीमारियों के कारण हर साल दुनिया भर में लाखों लोगों की मौत होती है और इसलिए उन देशों और इलाकों में ऐसे रिपेलेंट स्प्रे का उपयोग बेहद जरूरी हो जाता है जहां मच्छरों के कारण मलेरिया, zika वायरस, डेंगू और जापानी एन्सेफलाइटिस जैसी घातक बीमारियां तेजी से फैलती हैं.

लेकिन इस नई स्टडी में शोधकर्ताओं ने पाया है कि समय के साथ ये मच्छर रिपेलेंट स्प्रे की तीखी गंध को किसी इनाम यानी भोजन की मौजूदगी से जोड़कर देखने लगते हैं. कुछ खास और हैरान करने वाले मामलों में तो यह भी देखा गया है कि मच्छर इस महक से दूर भागने के बजाय इसकी तरफ और तेजी से आकर्षित होने लगे हैं जो भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है.

कैसे कातिल को दोस्त समझने लगे मच्छर

अमेरिका के वर्जीनिया में स्थित यूनिवर्सिटी वर्जीनिया टेक के एसोसिएट प्रोफेसर क्लेमेंट विनौगर के मुताबिक, अगर शरीर पर लगाए गए DEET स्प्रे का असर समय के साथ कम होने लगे और उस दौरान कोई मच्छर किसी तरह खून चूसने में कामयाब हो जाए तो वो इस गंध को भोजन (इनाम) के संकेत के रूप में याद रख लेता है. ऐसे में इस गंभीर और हैरान करने वाली संभावना या यूं कहें कि खतरे को बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. 

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'जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल बायोलॉजी' में प्रकाशित इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने मुख्य रूप से यलो फीवर फैलाने वाले मच्छर एडीस एजिप्टी पर अपना ध्यान केंद्रित किया. मच्छरों की यह खतरनाक प्रजाति पूरी दुनिया में डेंगू, zika, यलो फीवर और चिकनगुनिया जैसी जानलेवा बीमारियां फैलाने के लिए जिम्मेदार है जिससे हर साल दुनिया भर में करोड़ों लोग गंभीर रूप से संक्रमित होते हैं.

इस स्टडी के दौरान शोधकर्ताओं ने मच्छरों को सिखाने के लिए मशहूर Pavlovian conditioning सिद्धांत का सहारा लिया. यह ठीक वैसा ही सीखने का तरीका है जैसा वैज्ञानिक इवान पावलव ने अपने मशहूर प्रयोग में कुत्तों पर आजमाया था जहां घंटी की आवाज को कुत्तों ने अपने दिमाग में भोजन से जोड़ लिया था.

वैज्ञानिकों ने मच्छरों पर किया ये प्रयोग

प्रयोग के दौरान मच्छरों को एक महीन कपड़े की जाली के पीछे बंद रखा गया था और उनकी पहुंच से ठीक बाहर गर्म इंसानी खून से भरा एक थैला लटकाया गया था. जैसे ही इन भूखे मच्छरों ने जाली के करीब आकर खून पीना शुरू किया, शोधकर्ताओं ने ठीक उसी समय हवा में DEET केमिकल की गंध छोड़ दी, जिससे मच्छरों के दिमाग में इस गंध और भोजन का सीधा कनेक्शन बन गया.

इस प्रयोग को चार बार दोहराने के बाद 60 प्रतिशत से ज्यादा मच्छरों ने तब भी खून पीने की कोशिश की, जब उन्हें Deet की गंध आ रही थी. 

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इसके बाद मच्छरों को दो इंसानी हाथों में से किसी एक को चुनने का मौका दिया गया. एक हाथ पर कुछ नहीं लगा था जबकि दूसरे पर सामान्य मात्रा में Deet लगा हुआ था. जिन मच्छरों को कोई ट्रेनिंग नहीं मिली थी, उन्होंने Deet लगे हाथ से दूरी बनाए रखी. लेकिन जिन मच्छरों को ट्रेनिंग दी गई थी, वो उसी हाथ की ओर आकर्षित हुए, जिस पर Deet लगा था.

मच्छर ऐसे हो सकते हैं स्मार्ट

क्लेमेंट विनौगर ने कहा, यह आम धारणा हमेशा से यही रही है कि रिपेलेंट अपनी केमिस्ट्री की वजह से काम करते हैं. यानी Deet की गंध मच्छरों को बस बुरी लगती है और वो भाग जाते हैं या फिर इसकी केमिस्ट्री मच्छरों को हमारी गंध पहचानने से रोकती है. 

'लेकिन हम जो दिखा रहे हैं वह यह है कि मच्छर का दिमाग अनुभव के आधार पर उस प्रतिक्रिया को फिर से लिख सकता है. मच्छर ने जो सीखा है, वो उतना ही मायने रखता है, जितना कि वो केमिकल काम करता है. मुझे लगता है कि यह एक बड़ा बदलाव है.'

विनौगर ने आगे कहा कि इन नतीजों का मतलब यह नहीं है कि लोगों को Deet का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए. यह अभी भी उपलब्ध सबसे असरदार रिपेलेंट्स में से एक है.

उन्होंने बताया कि अगर आप ऐसे इलाकों में हैं जहां बीमारियों का खतरा सचमुच मौजूद है तो आपको इसका इस्तेमाल करना चाहिए. लेकिन इस स्टडी से पता चलता है कि समय और मात्रा, जितना पहले समझा जाता था, उससे कहीं ज्यादा मायने रख सकती है.

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विनौगर कहते हैं, 'एक ही बार में बहुत ज्यादा लगाने के बजाय आप इसे नियमित रूप से दोबारा लगा सकते हैं ताकि यह आपकी स्किन पर एक्टिव रहे और लगातार सुरक्षा देता रहे.'

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