ये लिफ्ट 16 लोगों के लिए पर्याप्त है... लिफ्ट में चढ़ते हुए कई बार आपका इस नोट पर ध्यान गया होगा. लेकिन अब लिफ्ट में लिखे ऐसे ही दावों और लोगों की सुरक्षा को लेकर एक नई बहस शुरू हो गई है. ब्रिटेन और यूरोप में लिफ्टों की वजन क्षमता को लेकर हुए एक नए शोध ने सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. शोध के अनुसार, 1972 से 2004 के बीच बनीं लिफ्टें अब आज के नागरिकों के बढ़ते वजन और शारीरिक बनावट के लिहाज से पर्याप्त नहीं रह गई हैं.
तुर्की के इस्तांबुल में आयोजित यूरोपीय कांग्रेस ऑन ओबेसिटी (ECO) में प्रस्तुत इस अध्ययन में पाया गया कि बढ़ते मोटापे के स्तर के साथ लिफ्टों की तकनीक और क्षमता में सुधार नहीं हुआ है जो भविष्य में दुर्घटनाओं का कारण बन सकता है.
क्या कहता है शोध?
अध्ययन के प्रमुख लेखक और अंतरराष्ट्रीय प्रेडर-विली सिंड्रोम संगठन के अध्यक्ष प्रोफेसर निक फाइनर ने यूके, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन, ऑस्ट्रिया और फिनलैंड में 1972 से 2024 के बीच निर्मित 112 लिफ्टों का एनालिसिस किया.
इसमें लिफ्ट के अंदर लगे वजन सीमा के बोर्ड और यात्रियों की अधिकतम संख्या की तुलना पुराने दौर के वयस्कों के औसत वजन से की गई. निष्कर्ष में पाया गया कि पुराने मानकों के आधार पर बनी लिफ्टों में अब निर्धारित संख्या में लोगों का बैठना असुरक्षित हो सकता है क्योंकि दशकों पहले के मुकाबले अब औसत वजन काफी बढ़ चुका है.
अंतरराष्ट्रीय प्रेडर-विली सिंड्रोम संगठन के अध्यक्ष और अध्ययन के प्रमुख लेखक प्रोफेसर निक फाइनर ने देखा कि जिस दौरान ये लिफ्ट बनी थी, उस समय लिफ्ट में अधिकतम लोगों की संख्या और उसकी भार क्षमता की सीमा क्या थी. यानी प्रति व्यक्ति के हिसाब से कितना वजन तय किया गया था.
पुरानी लिफ्ट की तकनीक में नहीं किया गया बदलाव
शोध में पाया गया कि वयस्कों के लगातार बढ़ते वजन के बावजूद 2004 के बाद से कई पुरानी लिफ्ट में कुल वजन उठाने की सीमा में वृद्धि नहीं हुई है. 1970 के दशक के मध्य में ब्रिटिश पुरुष का औसत वजन 75 किलोग्राम और एक महिला का औसत वजन 65 किलोग्राम था लेकिन यह बढ़कर क्रमशः 86 किलोग्राम और 73 किलोग्राम हो गया है.
भारत में भी ध्यान देने की जरूरत
वहीं, यह समस्या केवल ब्रिटेन या यूरोप की नहीं है भारत में मोटापा एक महामारी बनकर उभरा है. यहां देश की आबादी कम वजन की समस्या से निकलकर तेजी से अधिक वजन और मोटापे की चपेट में जा रही है. अमेरिका की नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन की रिपोर्ट बताती है कि भारत में मोटापे की व्यापकता (Prevalence) 40.3% तक पहुंच गई है. क्षेत्रीय स्तर पर इसमें अलग-अलग आंकड़े देखे गए हैं जहां दक्षिण भारत में यह आंकड़ा सबसे अधिक 46.51% है तो वहीं पूर्वी भारत में सबसे कम 32.96% दर्ज किया गया है. इसलिए यहां भी लिफ्ट में लोगों का वजन उठाने की क्षमता की अच्छी तरह जांच-पड़ताल किए जाने की जरूरत है.
फाइनर ने आगे कहा, शिफ्ट ये हुआ कि मैन्युफैक्चरिंग में वजन पर ज्यादा फोकस करने के बजाय ये देखा जाने लगा कि लिफ्ट के फ्लोर पर कोई इंसान कितनी जगह घेरता है. उन्होंने मान लिया कि लोगों का आकार गोलाकार ना होकर ओवल वाले शेप में होगा. वो ये समझने में भूल कर गए कि अब मोटापा बढ़ रहा है तो लोगों को लिफ्ट में जगह भी ज्यादा चाहिए होगी.
फाइनर ने कहा, गलत कैलकुलेशन पर आधारित डिजाइनों के कारण बहुत छोटी लिफ्टें सुरक्षा समस्याओं का कारण बन सकती हैं. अगर आपने जितने लोगों के लिए लिफ्ट बनाई है, उसके आधे ही लोग लिफ्ट में जा पा रहे हैं तो ये एक बड़ी दिक्कत है. इससे मोटे लोगों के साथ भेदभाव भी बढ़ सकता है.
उदाहरण के लिए अगर लिफ्ट में लोगों ने कुल वजन सीमा को पार कर लिया तो लिफ्ट में ज्यादा लोग नहीं जा सकते.
फाइनर ने कहा कि दुर्भाग्य से हमें जीवन में कई चीजों को सुपर-साइज करने की जरूरत है जो मोटापे से ग्रस्त लोगों के लिए सुरक्षित हों, वरना उन्हें समाज में धीरे-धीरे अलग-थलग कर दिया जाएगा. अगर हम मोटापे और शरीर के बढ़ते साइज को ध्यान में नहीं रखते हैं तो हम वास्तव में ऐसे लोगों का जीवन और मुश्किल बना रहे हैं.
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