1000 साल पुराना है ढोकले का इतिहास...जानें 11वीं सदी के 'दुक्काई' के ढोकला बनने की पूरी कहानी

ढोकला का इतिहास 11वीं सदी के 'दुक्किया' से लेकर आज के स्पंजी ढोकला तक है. ढोकला का सफर केवल एक रेसिपी का नहीं बल्कि भारत की प्राचीन फर्मेंटेशन परंपरा के जीवित रहने की कहानी है. तो आइए इसका इतिहास कैसा है, इस बारे में जान लीजिए.

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ढोकला को बेसन से बनाया जाता है. (Photo: ITG) ढोकला को बेसन से बनाया जाता है. (Photo: ITG)

आजतक लाइफस्टाइल डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 07 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 9:05 AM IST

गुजरात फेमस कई डिश आज देश-विदेश तक फेमस हैं. कई लोग सुबह नाश्ते में गुजराती डिश ढोकला खाना पसंद करते हैं. ये भाप में पकता है और बेसन का बनता है जो कई मायनों में हल्का और टेस्टी होता है. भले ही आज ढोकला गुजरात की पहचान बन चुका है, लेकिन इसका इतिहास सदियों पुराना है और इसकी जड़ें प्राचीन भारत से जुड़ी हुई हैं. ढोकला महज एक स्नैक नहीं, बल्कि भारतीय फर्मेंटेशन (किण्वन) प्रोसेस का एक बेहतरीन नमूना है जो पहले के समय में खाना पकाने के लिए इस्तेमाल होती थी. तो आइए जानते हैं कि कैसे भाप में पका यह व्यंजन अपनी सादगी और स्वाद के दम पर दुनिया भर के खान-पान का अहम हिस्सा बन गया.

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ढोकले का इतिहास

हल्के-फुल्के और स्पंजी ढोकला की जड़ें 11वीं सदी की जैन परंपरा से जुड़ी हुई हैं. दिलचस्प बात यह है कि इसका जिक्र प्राचीन जैन ग्रंथों से लेकर मध्यकालीन पाक-शास्त्र की किताबों तक में भी मिलता है. 

फूड हिस्टोरियन केटी आचार्या की किताब 'ए हिस्टोरिकल डिक्सनरी ऑफ इंडियन फूड' के हवाले से गोया जर्नल बताता है, 1068 ईस्वी में जैन साहित्यिक परंपरा में 'दुक्काई' (Dukkai) नाम से इसका उल्लेख मिलता है जो मुख्य रूप से पिसी हुई दालों से तैयार किया जाता था.

यह आज के ढोकले जैसा ही था जिसे किण्वित करके दालों और चावल के मिश्रण से बनाया जाता था. फिर 1520 ईस्वी में 'वारणक समुच्चय' (Varanaka Samuchaya) में 'ढोकला' शब्द आया जो गुजराती संस्कृति का हिस्सा बना. 

यह वह समय था, जब फर्मेंटेशन की प्रक्रिया में सुधार हुआ और दालों के साथ-साथ अन्य अनाज भी इसमें शामिल किए जाने लगे. भाप में पकाने की तकनीक ने इसे सेहत के लिहाज से भी खास बना दिया, जिससे यह जैन और गुजराती समुदायों के बीच एक मुख्य आहार बन गया था. इसके बाद समय के साथ चावल-दाल से बेसन-खमंड तक इसके कई रूप बदले और आज 100 से ज्यादा तरीके से ढोकला को बनाया जाता है. 

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समय के साथ हुए बदलाव

19वीं-20वीं सदी में ढोकला पूरी तरह बदल गया. पारंपरिक चावल-उड़द दाल का ढोकला धीरे-धीरे बेसन और सूजी से बनने लगा. Goya Journal के अनुसार, गुजरात के अलग-अलग इलाकों में मिलेट्स, ज्वार या बाजरा मिलाकर नई किस्में बनीं जो लोगों को पसंद आने लगीं. 

आधुनिक समय में ENO या फ्रूट सॉल्ट से स्पंजी बनावट आसान हुई और अब ढोकला बेसन बेस्ड हो गया जो हर जगह पसंद किया जाता है. आज बाजार में रेडी-टू-ईट पैकेट्स उपलब्ध हैं.

खमण और ढोकला के बीच का अंतर

अक्सर लोग खमण और ढोकला को एक ही समझ लेते हैं लेकिन फूड एक्सपर्ट्स के मुताबिक दोनों में बारीक अंतर है. पारंपरिक ढोकला चावल और चने की दाल के मिश्रण से बनाया जाता है जबकि खमण पूरी तरह से बेसन (चने का आटा) से तैयार होता है. 

खमण का रंग अधिक पीला और इसकी बनावट अधिक स्पंजी होती है. 20वीं सदी के बाद इसमें में सोडा और साइट्रिक एसिड के इस्तेमाल ने इसे 'नायलॉन ढोकला' जैसा आधुनिक रूप दिया जो आज स्ट्रीट फूड के रूप में सबसे ज्यादा फेमस है.
 

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