आज चीन-अमेरिका में कोल्ड वॉर... लेकिन इतिहास एकदम अलग है, कभी दोनों देशों ने मिलकर लड़ा था वर्ल्ड वॉर

अमेरिका और चीन के बीच आज भी कोल्ड वॉर जैसे हालात हैं. हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चीन यात्रा के दौरान भी काफी कुछ ऐसा देखने को मिले, जिसके बाद ऐसे मायने निकाले जा रहे हैं. लेकिन, अतीत में दोनों देशों का संबंध एकदम अलग था. दोनों कभी काफी अच्छे दोस्त थे और साथ मिलकर वर्ल्ड वॉर भी लड़ा. ऐसे में समझते है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि आज दोनों एक दूसरे के धूऱ विरोधी है.

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कभी थे अच्छे दोस्त, अब दुश्मन हैं अमेरिका और चीन (Photo - X/@whitehouse) कभी थे अच्छे दोस्त, अब दुश्मन हैं अमेरिका और चीन (Photo - X/@whitehouse)

सिद्धार्थ भदौरिया

  • नई दिल्ली,
  • 18 मई 2026,
  • अपडेटेड 3:03 PM IST

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन के दौरे पर गए थे. इस दौरान शी जिनपिंग के साथ उनकी हर तस्वीर को दुनिया ने दो महाशक्तियों के बीच तल्खी के रूप में देखा. कैसे दोनों नेता चले, किसकी कुर्सी ऊंची थी, दोनों ने कैसे हाथ मिलाया और कैसे बातचीत हुई. हर तस्वीर पर दुनिया की नजर थी और सबने यही देखा कि 'कोल्ड वॉर' बातचीत में भी दिखी. लेकिन इन दोनों देशों के रिश्ते इतिहास में क्या ऐसे ही हमेशा से तल्ख थे. नहीं, इतिहास के पन्ने कुछ और कहते हैं. 

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एक जमाना था जब दोनों देश बंटी हुई दुनिया में एक साथ थे. दोनों ने मिलकर एक साथ जंगें लड़ीं. दूसरे विश्व युद्ध में दोनों एक साथ मिलकर दुश्मन से लड़ रहे थे. लेकिन उसके बाद रिश्ते कैसे तल्ख हो गए. कैसे दोनों एक दूसरे से दुश्मन बन गए.

कभी अमेरिका का साथी था चीन
दूसरे विश्व युद्ध की आधिकारिक शुरुआत से दो साल पहले, जापान से लड़ रहे मित्र देशों का  चीन एक महत्वपूर्ण, लेकिन अक्सर भुला दिया जाने वाला सदस्य था. इस दौरान चीन ने अमेरिका के कंधे से कंधा मिलाकर जापान के खिलाफ जंग लड़ी थी. दूसरा वर्ल्ड वॉर शुरू होने से पहले से ही चीन की लड़ाई जापान के साथ जारी थी. चीन के साथ तनाव बढ़ने के साथ जुलाई 1937 में जापानी सैनिक बीजिंग तक पहुंच गई थी.   

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कुछ ही हफ्तों में, तकनीकी रूप से श्रेष्ठ जापानी सेनाओं ने बीजिंग पर कब्जा कर लिया. उन्होंने नवंबर 1937 में व्यापारिक केंद्र शंघाई पर भी कब्जा कर लिया. शाही जापानी सेना ने चीनी प्रतिरोध का जवाब तेजी से क्रूर अत्याचारों से दिया, जिनमें से सबसे कुख्यात घटना दिसंबर 1937 में चीनी राष्ट्रवादी राजधानी नानजिंग (या नानकिंग) में प्रवेश करने के बाद हुई। छह सप्ताह की अवधि में, जापानी सेना ने 200,000 से 300,000 सैनिकों और नागरिकों का नरसंहार किया और हजारों महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया.


कैसे अमेरिका और चीन बन गए थे दोस्त
इधर, जब 1939 में दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हुआ और जापान ने अमेरिका के पर्ल हार्बर पर  हमला किया. जब जापानी शक्ति को रोके रखने के लिए चीन की अहमियत पर अमेरिका की नजर गई. उनके पास हथियार नहीं थे. फिर 1940 और 1941 में, अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने चीन को सैन्य सामग्री खरीदने के लिए ऋण दिया और उसे लेंड-लीज कार्यक्रम में शामिल किया.  

अगर चीन ने 1938 में उम्मीद के मुताबिक आत्मसमर्पण कर दिया होता, तो द्वितीय विश्व युद्ध की पूरी दिशा ही बदल जाती. चीन ने जापान को अपनी धरती पर रोके रखा. पर्ल हार्बर पर हमले के बाद जब अमेरिका और ब्रिटेन जापान के खिलाफ लड़ाई में शामिल हुए , तो चीन को सैन्य उपकरण, धन और सैन्य सलाहकारों की खूब सप्लाई की गई. इसके साथ ही चीन का वैश्विक कद भी बढ़ा.

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चीनी हवाई अड्डों का इस्तेमाल कर रहे थे अमेरिकी फाइट जेट 
तब अमेरिकी फाइटर जेट ने जापानी ठिकानों पर हमले करने के लिए चीनी हवाई अड्डों का इस्तेमाल किया. फिर भई जमीनी युद्ध का भार चीन पर ही बना रहा और एक व्यापक युद्ध का सामना करते हुए, जापानी सेना चीन में फंसी रही. इससे अमेरिका और दूसरे मित्रदेशों को काफी फायदा हुआ.

अमेरिका और चीन के बीच ऐसे शुरू हुई अदावत
साम्राज्यवादी जापान  जब चीन में पांव पसार रहा था तब चीन गृहयुद्ध में उलझा था.च्यांग काई-शेक की सत्तारूढ़ चीनी राष्ट्रवादी पार्टी और माओत्से तुंग की कम्युनिस्ट सेनाओं के बीच गृहयुद्ध छिड़ा हुआ था. तब दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान च्यांग काई शेक की राष्ट्रवादी सेना ने कम्युनिस्ट लड़ाकों के साथ मिलकर जापान का प्रतिरोध किया था. अमेरिका और अन्य मित्र देशों ने च्यांग काई शेक की राष्ट्रवादी सेना को जापान से भिड़ने में काफी मदद की थी. 

वहीं दूसरे विश्वयुद्ध  में जापान के आत्मसमर्पण के साथ चीन में फिर से गृहयुद्ध भड़क उठा और माओ की साम्यवादी क्रांति की लड़ाई शुरू हो गई. इसने 1949 में च्यांग काई-शेक की राष्ट्रवादी सरकार को उखाड़ फेंका. चीन में जैसे- जैसे कम्युनिस्ट सरकार प्रभावी होती गई, अमेरिका के साथ चीन की तल्खी बढ़ती गई. 1949 के बाद, जब माओ और कम्युनिस्टों ने मुख्य भूमि में सत्ता हासिल की. उस वक्त च्यांग काई-शेक शासन के बारे में कुछ भी सकारात्मक कहना, लगभग अस्वीकार्य हो गया था.

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ऐसे में अमेरिका जिसकी  कम्युनिस्ट विरोधी नीति ने दुनिया को नए वर्ल्ड ऑर्डर में बांट दिया और इसके साथ ही  कोल्ड वॉर का दौर शुरू हो चुका था. कोल्ड वॉर के दौरान  विश्वयुद्ध के समय की गुटबंदी खत्म हो चुकी थी और चीन ने कम्युनिस्ट देश के रूप में उभरा था जो अब अमेरिका से कहीं ज्यादा रूस के नजदीक हो चुका था. 

इस तरह दूसरे विश्वयुद्ध के खत्म होने और चीन में कम्युनिस्ट सरकार के गठन के साथ ही प्रशांत महासागर के दोनों किनारों पर मित्र राष्ट्रों के सदस्य के रूप में चीन की भूमिका भी धूमिल होती चली गई. धीरे- धीरे चीन की भूमिका अमेरिका के सहयोगी के बजाय धूर विरोधी के रूप में सामने आती गई. कोल्ड वॉर के चरम पर आते- आते अमेरिका और चीन के बीच तल्खी इतनी बढ़ी कि दोनों एक दूसरे के दुश्मन बन गए. 

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