देश की बड़ी आईटी कंपनी देश की बड़ी आईटी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज इन दिनों एक बड़े विवाद में फंस गई है. एक के बाद एक सामने आईं 9 एफआईआर ने इस मामले को बेहद गंभीर बना दिया है. इन शिकायतों में महिलाओं ने वर्कप्लेस पर उत्पीड़न, छेड़छाड़, अश्लील टिप्पणियों और मानसिक दबाव जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं. इन दिनों गंभीर आरोपों के कारण चर्चा में है. एक के बाद एक सामने आईं कई एफआईआर ने वर्क प्लेस पर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. इसी बीच यह समझना जरूरी है कि भारत में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कौन से कानून बने हैं और वे कैसे काम करते हैं.
क्या है पॉश कानून?
दिल्ली हाई कोर्ट के वकील प्रेम जोशी बताते हैं कि भारत में महिलाओं को वर्कप्लेस पर सुरक्षित माहौल देने के लिए POSH Act, 2013 लागू किया गया है. इस कानून की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले विशाखा एवं अन्य बनाम राजस्थान राज्य, 1997 राज्य से हुई थी. इसका मकसद है कि ऑफिस में महिला के साथ छेड़छाड़, अश्लील व्यवहार या मानसिक उत्पीड़न न हो और अगर हो, तो तुरंत कार्रवाई हो सके.
हर कंपनी के लिए क्या है जरूरी?
पॉश कानून के तहत किसी भी कंपनी में 10 या उससे ज्यादा कर्मचारी हैं, वहां एक आंतरिक शिकायत समिति (IC) बनाना अनिवार्य है. इस कमेटी का काम शिकायत सुनकर रिपोर्ट तैयार कर जांच करना होता है. अगर किसी महिला के साथ ऑफिस में गलत व्यवहार होता है, तो वह सीधे इस कमेटी के पास जा सकती है.
छोटी कंपनियों के लिए क्या नियम है?
अगर किसी संस्था में 10 से कम कर्मचारी हैं, तो वहां आंतरिक शिकायत समिति नहीं बनती. ऐसे में सरकार की तरफ से स्थानीय शिकायत समिति (LCC) बनाई जाती है, जो जिला स्तर पर काम करती है. वे महिलाओं की शिकायतें सुनती है और जांच कर कार्रवाई सुनिश्चित करती है. इससे छोटी कंपनियों में काम करने वाली महिलाओं को भी सुरक्षा मिलती है.
जांच की समय सीमा क्या है?
पॉश कानून के अनुसार, हर शिकायत की जांच 90 दिनों के अंदर पूरी करनी जरूरी है. इस दौरान दोनों पक्षों को सुना जाता है और निष्पक्ष जांच की जाती है, ताकि सही फैसला लिया जा सके.
अगर कंपनी कार्रवाई न करे तो क्या करें?
अगर आंतरिक शिकायत समिति या कंपनी सही तरीके से कार्रवाई नहीं करती, तो पीड़ित महिला के पास कई विकल्प होते हैं. सबसे पहले वे पुलिस के पास जाकर शिकायत दर्ज करा सकती हैं. इसके अलावा नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन, स्टेट ह्यूमन राइट्स कमीशन, नेशनल कमीशन फॉर वीमेन और स्टेट कमीशन फॉर वीमेन पर जाकर मदद ले सकती हैं. इससे यह सुनिश्चित होता है कि किसी भी मामले को दबाया न जा सके.
TCS जैसे मामलों में क्यों जरूरी है यह कानून?
TCS से जुड़े हालिया आरोपों में छेड़छाड़, अश्लील टिप्पणियां, निजी जीवन में दखल और धार्मिक दबाव जैसे गंभीर मुद्दे सामने आए हैं. ऐसे मामलों में पॉश कानून बेहद अहम हो जाता है, क्योंकि यह पीड़ित को कानूनी सुरक्षा देता है. कंपनी को जवाबदेह बनाता है और जांच की स्पष्ट प्रक्रिया तय करता है.
अगर आंतरिक शिकायत समिति का कोई सदस्य अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाता, जैसे शिकायत को नजरअंदाज करना, पक्षपात करना या सही तरीके से जांच न करना, तो उसे उसके पद से हटाया जा सकता है. यानी कमेटी के हर सदस्य की जिम्मेदारी होती है कि वह निष्पक्ष और ईमानदारी से अपना काम करे. इसके अलावा, अगर मामला बहुत गंभीर हो या पीड़ित को तुरंत मदद की जरूरत हो, तो वह सीधे संबंधित कोर्ट का भी सहारा ले सकती है.
अगर किसी महिला के साथ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न होता है, तो उसे घटना की तारीख से 3 महीने के अंदर शिकायत दर्ज करनी चाहिए. घटना होने के बाद ज्यादा देर नहीं करनी चाहिए, बल्कि समय रहते शिकायत करना जरूरी है, ताकि मामले की सही जांच हो सके और न्याय मिल सके.
क्या हैं आरोप? एक नजर में पूरा मामला
इन 9 एफआईआर में अलग-अलग तरह के आरोप सामने आए हैं, जो काफी चौंकाने वाले हैं. पहली एफआईआर में धार्मिक भावनाएं आहत करने, धमकी देने, जबरन शारीरिक संबंध बनाने के दबाव और ऑफिस में छेड़छाड़ के आरोप लगाए गए हैं. दूसरी एफआईआर में दो कर्मचारियों पर छेड़छाड़ का आरोप है, साथ ही यह भी कहा गया है कि एचआर विभाग ने शिकायत को दबाने की कोशिश की. तीसरी शिकायत में महिला के निजी और वैवाहिक जीवन पर अपमानजनक टिप्पणियां करने की बात सामने आई है, खासकर उसकी निःसंतानता को लेकर. चौथी एफआईआर में बेहद आपत्तिजनक आरोप हैं, जिसमें महिला से निजी जीवन से जुड़े शर्मनाक सवाल पूछे गए और उसके शरीर को लेकर इशारे किए गए.
धर्म और निजी जिंदगी पर भी दबाव के आरोप
पांचवीं एफआईआर इस मामले को और गंभीर बना देती है. इसमें आरोप है कि महिला पर एक खास धर्म से जुड़े रीति-रिवाज करने का दबाव बनाया गया. इसके साथ ही उसे मांसाहार खाने के लिए मजबूर किया गया और धर्म परिवर्तन के लिए भी दबाव डाला गया. यह मामला सिर्फ वर्क प्लेस के व्यवहार तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक अधिकारों से भी जुड़ता है.
महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और अश्लील हरकतें
छठी और सातवीं एफआईआर में महिला के शरीर पर अश्लील टिप्पणियां करने, जानबूझकर छूने और पीछा करने जैसे आरोप लगाए गए हैं. बताया गया है कि वर्क प्लेस पर कई बार अनुचित तरीके से छूने की कोशिश की गई और बार-बार अश्लील बातें की गईं. यह आरोप कार्यस्थल की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं.
रिश्तों और निजी जीवन में दखल
आठवीं एफआईआर में महिला के निजी जीवन में दखल देने और प्रेम संबंध या शारीरिक संबंध बनाने के लिए दबाव डालने की बात कही गई है.वहीं नौवीं शिकायत में गाली-गलौज, बदसलूकी और शरीर को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियों का जिक्र किया गया है. इन सभी शिकायतों को मिलाकर देखा जाए, तो यह मामला बेहद गंभीर और चिंताजनक नजर आता है.
कॉर्पोरेट वर्कप्लेस पर उठे सवाल
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बड़े कॉर्पोरेट ऑफिस वाकई महिलाओं के लिए सुरक्षित हैं? कंपनियां अक्सर दावा करती हैं कि वे कर्मचारियों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल देती हैं. लेकिन इस तरह के मामलों के सामने आने से इन दावों पर सवाल उठने लगे हैं.
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया
यह मामला सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों की प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं. कई लोग इस घटना की कड़ी निंदा कर रहे हैं और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं. वहीं कुछ यूजर्स का कहना है कि कंपनियों को अपनी आंतरिक शिकायत प्रणाली को और मजबूत करना चाहिए.
राधा तिवारी