मिडिल ईस्ट की जंग की वजह से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही पर काफी असर पड़ा है. इसके बाद से भारत में एपीजी सप्लाई चेन प्रभावित होती नजर आ रही है. हालांकि, दो भारतीय जहाज LPG की बड़ी खेप लेकर सुरक्षित भारत की ओर बढ़ रहे हैं और अब पैनिक होने की कोई आवश्यकता नहीं है. ऐसे में कभी आपने सोचा है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से किस तरह शिप एशियाई देशों में आते हैं और इस दौरान मर्चेंट नेवी के अफसरों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. तो मर्चेंट नेवी में सेकेंड ऑफिसर नवजोत से जानते हैं कि किसी भी शिप को समुद्र के रास्ते एक देश से दूसरे देश पहुंचाने में किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है...
कई देश होते हैं शामिल
कई सालों से शिप पर काम कर रहे नवजोत ने आजतक को बताया कि जब भी कोई शिप एक देश से दूसरे देश जाता है तो उसमें कई देश इनवॉल्व रहते हैं. ऐसा नहीं है कि जिस देश में माल जा रहा है, उसकी ही जिम्मेदारी होती है. ऑफिसर बताते हैं कि लोगों को लगता है कि जहाज किसी एक देश का होता है और वो देश उसे ऑपरेट करता है, लेकिन असलियत इससे काफी अलग है. कई बार जहाज पर काम करने वाला क्रू किसी एक देश का होता है, उसे मैनेज करने वाली मैनिंग कंपनी किसी दूसरे देश की होती है, जबकि जहाज का मालिक किसी तीसरे देश का हो सकता है.
वहीं जिस सामान को जहाज लेकर जा रहा होता है, उसका मालिक भी किसी और देश की कंपनी हो सकती है. इतना ही नहीं, जहाज जिस देश से सामान लेकर निकलता है और जिस देश में उसे उतारता है, वे भी अलग-अलग होते हैं. ऐसे में अगर बीच समुद्र में कोई समस्या आ जाए तो फैसला लेना आसान नहीं होता, क्योंकि हर कदम पर अलग-अलग पक्षों को सूचना देनी पड़ती है.
उन्होंने अपने इंटरव्यू के दौरान एक किस्सा भी बताया कि एक बार उनका जहाज अटलांटिक महासागर के बीच में था, तभी एक क्रू मेंबर की तबीयत खराब हो गई. उस वक्त जहाज ऐसी जगह था कि पीछे ब्राजील लौटने में भी करीब दस दिन लगते और आगे साउथ अफ्रीका पहुंचने में भी लगभग उतना ही समय था. ऐसे में सीधे फैसला लेना संभव नहीं था. ऐसे में पहले जहाज के मालिकों को जानकारी दी गई, फिर उस कंपनी को बताया गया जिसका कार्गो जहाज पर था और साथ ही उस पोर्ट को भी सूचना दी गई जहां सामान उतारा जाना था, क्योंकि रूट बदलने से डिलीवरी में देरी हो सकती थी. इसके बाद उन्होंने आगे ही जाने का फैसला किया.
साथ ही उन्होंने बताया कि समुद्र में काम करने वाले लोगों के लिए मुश्किलें सिर्फ तकनीकी नहीं होतीं, कई बार हालात राजनीतिक और सुरक्षा से भी जुड़ जाते हैं. उदाहरण के तौर पर अगर किसी इलाके में तनाव या युद्ध जैसी स्थिति बन जाए, तो वहां से गुजरने वाले जहाजों के क्रू के सामने कई तरह की दिक्कतें खड़ी हो जाती हैं.
कैसे होती है अरबों के माल की सिक्योरिटी?
उन्होंने बताया कि जब भी कोई शिप एक देश से दूसरे देश जाता है तो आम तौर पर कोई भी सिक्योरिटी साथ नहीं होती है. साथ ही उन्होंने बताया कि यहां तक कि उनके पास कोई हथियार नहीं होते हैं और वो विपरीत परिस्थिति में कोई कदम नहीं उठा सकते. वे इस स्थिति में शिप का रूट या स्पीड में बदलाव कर माल को बचाने की कोशिश करते हैं. इसके अलावा किसी संकट की स्थिति में नेवी से मदद मांगते हैं. अगर कोई समुद्री लुटेरे शिप पर आ जाए तो वो कुछ नहीं कर सकते.
उन्होंने बताया कि सोमालिया जैसे कुछ रूट तो ऐसे भी होते हैं, जहां हमें कुछ देर के लिए सिक्योरिटी हायर करनी होती है. कुछ जगह पर शिप को ले जाना मुश्किल होता है, ऐसे में कुछ देर के लिए सिक्योरिटी हायर की जाती है, जो हमें खतरनाक रूट को क्रॉस करवाती है. आजतक हर शिप की लोकेशन कोई भी ट्रैक कर सकता है, ऐसे में लुटेरे भी करते हैं और कुछ संवेदनशील इलाकों में काफी मुश्किल का सामना करना पड़ता है.
इस बारे में जब भारतीय सेना के रियर एडमिरल गिरीश कुमार (रि) से बात की तो उन्होंने बताया कि शिप की सिक्योरिटी भगवान भरोसे ही होती है. उन्होंने बताया कि कार्गो शिप पर कोई सिक्योरिटी नहीं होती है और मर्चेंट नेवी के पास कोई हथियार भी नहीं होते हैं. कुछ विपरीत परिस्थितियों में नेवी को उन्हें बचाने के लिए जाना पड़ता है.
कैसे काम करती है मर्चेंट नेवी?
नवजोत बताते हैं, 'मर्चेंट नेवी में ज्यादातर लोग कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम पर काम करते हैं. जहाज पर जाने से पहले एक निश्चित अवधि के लिए कॉन्ट्रैक्ट साइन किया जाता है. आम तौर पर ऑफिसर का कॉन्ट्रैक्ट करीब छह महीने का होता है, जबकि क्रू मेंबर नौ महीने के आसपास जहाज पर रहते हैं. इस दौरान ही उन्हें सैलरी मिलती है. जहाज से उतरने के बाद जब तक वे अगली यात्रा के लिए दोबारा जॉइन नहीं करते, तब तक आम तौर पर सैलरी नहीं मिलती.
जहाज पर लंबे समय तक रहने के कारण खाने-पीने और पानी का इंतजाम भी पहले से करना पड़ता है. जहाज पर अलग-अलग कमरों में मछली, मांस, सब्जियां और सूखा राशन स्टोर किया जाता है, ताकि महीनों तक क्रू का काम चल सके. पीने के पानी के लिए भी जहाज पर ही समुद्री पानी को साफ करके ताजा पानी बनाने की व्यवस्था होती है. लेकिन अगर जहाज किसी वजह से लंबे समय तक एक जगह अटका रह जाए और बाहर से सप्लाई न मिल पाए, तो क्रू को राशनिंग भी करनी पड़ सकती है
साथ ही उन्होंने बताया कि आमतौर पर एक शिप एक देश के लिए काम नहीं करता है और वो लंबे समय तक कम ही एंकर होता है. वो चलता रहता है और एक देश से दूसरे देश तक हमेशा ट्रेवल करता है.
मोहित पारीक