कई बार टूटा, हर बार फिर बना... क्या है मौजूदा सोमनाथ मंदिर के बनने की कहानी?

सोमनाथ मंदिर पर कई बार हमला हुआ है. ऐसे में जानते हैं कि आज जो सोमनाथ मंदिर खड़ा है, उसके बनने की क्या कहानी है?

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सोमनाथ मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के 75 साल हो गए हैं.  (Photo: Somnath.org) सोमनाथ मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के 75 साल हो गए हैं. (Photo: Somnath.org)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 11 मई 2026,
  • अपडेटेड 12:56 PM IST

प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 साल पूरे होने पर 'सोमनाथ अमृत पर्व-2026' का आयोजन किया गया है. इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2 किलोमीटर का रोड शो करते हुए सोमनाथ मंदिर पहुंचे. यहां उन्होंने मंदिर का कुंभाभिषेक किया. वैदिक मंत्रों के बीच 11 तीर्थों के जल से शिखर जल चढ़ाया गया. 90 मीटर ऊंची क्रेन की मदद से कलश को मंदिर के ऊपर रखा गया था. अभिषेक के बाद चेतक हेलिकॉप्टर के जरिए मंदिर पर फूल बरसाए गए. वायुसेना की सूर्यकिरण टीम मंदिर के ऊपर 15 मिनट का एरोबेटिक शो भी किया गया.  

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बता दें कि आज से 75 साल पहले 11 मई 1951 को स्वतंत्र भारत में नए सिरे से बनाए गए सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हुई थी. ये वो दिन था, जब कई बार हमले झेल चुके सोमनाथ मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा हुई थी. इसके बाद भी मंदिर का कार्य लंबे समय तक चलता रहा और कई साल बाद इसे जनता को समर्पित किया गया. ऐसे में जानते हैं कि आखिर सोमनाथ मंदिर पर कितनी बार हमला हुआ और आज जो ये मंदिर बना है, इसके पीछे की क्या कहानी है...

क्या है धार्मिक महत्व?

सोमनाथ मंदिर का निर्माण चंद्रदेव सोमराज ने किया था. सोमनाथ को भगवान शिव के 12 आदि ज्योतिर्लिंगों में प्रथम के रूप में पूजा जाता है. इसका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है. सोमनाथ डॉट ओआरजी के अनुसार, प्राचीन भारतीय मान्यताओं के अनुसार, सोमनाथ का संबंध चंद्र देव को उनके ससुर दक्ष प्रजापति के श्राप से मुक्ति मिलने से जुड़ा है. चंद्रमा ने दक्ष प्रजापति की 27 बेटियों से विवाह किया था, लेकिन वे सबसे ज्यादा प्रेम रोहिणी से करते थे और बाकी रानियों की उपेक्षा करते थे. इससे नाराज होकर दक्ष प्रजापति ने चंद्रमा को श्राप दे दिया, जिसके कारण उनका तेज और प्रकाश खत्म होने लगा.

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तब ब्रह्मा जी की सलाह पर चंद्र देव प्रभास तीर्थ पहुंचे और भगवान शिव की कठोर तपस्या की. उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें श्राप से मुक्ति दी और उनका तेज वापस लौटा दिया. पुराणों में बताया गया है कि सबसे पहले चंद्र देव ने सोने का मंदिर बनवाया था. इसके बाद रावण ने चांदी का मंदिर बनवाया और फिर भगवान श्रीकृष्ण ने चंदन की लकड़ी से सोमनाथ मंदिर का निर्माण कराया. प्राचीन ग्रंथों और शोधों के अनुसार, पहले सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की प्राण प्रतिष्ठा श्रावण महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को वैवस्वत मन्वंतर के दसवें त्रेता युग में हुई थी.

कई बार हुआ हमला

गुजरात के वेरावल बंदरगाह में स्थित इस मंदिर की महिमा और कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी. इतिहास में कई बार मुस्लिम आक्रमणकारियों ने 11वीं से 18वीं सदी के बीच इस मंदिर को नुकसान पहुंचाया, लेकिन हर बार लोगों की आस्था और संकल्प ने इसे फिर से खड़ा कर दिया. 

पहला हमला- ये 1300 साल पहले हुआ था, जो सिंध का सूबेदार कहे जाने वाले अल जुनैद ने किया था. इस वक्त मंदिर को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ था. 

दूसरा हमला- ये 1000 साल पहले हुआ था, जो गजनवी के सुल्तान महमूद गजनवी ने किया था. उस वक्त कई मूर्तियां तोड़ी गईं और संपत्ति लूटी गई थी.

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तीसरा हमला- ये 772 साल पहले हुआ था, जो  खिलजी वंश के शासक अलाउद्दीन खिलजी ने किया था. इस दौरान मंदिर को लूटा गया और मंदिर को ध्वस्त किया गया. 

चौथा हमला- ये हमला 361 साल पहले हुआ था, जो  मुगल शासक औरंगजेब ने किया था. इस दौरान फिर मंदिर को नुकसान पहुंचाया गया. 

इसके अलावा भी कई बार हमले पर आक्रांताओं ने हमला किया है. ये भी कहा जाता है कि 17 बार इस बार अटैक किया गया था. 

वर्तमान मंदिर की कहानी

आजादी के बाद 13 नवंबर 1947 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण का आदेश दिया. उन्होंने 13 नवंबर 1947 को मंदिर के खंडहरों का दौरा किया था और इसके पुनर्निर्माण का फैसला लिया. 19 अप्रैल 1950 को तत्कालीन सौराष्ट्र राज्य के मुख्यमंत्री यू.एन. ढेबर ने भूमि पूजन किया. इसके बाद 8 मई 1950 को महाराजा जाम साहेब दिग्विजयसिंहजी ने नए मंदिर की आधारशिला रखी.

इस बीच, 15 दिसंबर 1950 को पटेल का निधन हो गया और उसके बाद मंत्री केएम मुंशी ने इसकी जिम्मेदारी संभाली. मई 1951 में निर्माण कार्य पूरा हुआ. 11 मई 1951 को भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा की. मंदिर का निर्माण प्रसिद्ध वास्तुकार प्रभाशंकर सोमपुरा की योजना के अनुसार किया गया.

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इस बाद भी मंदिर का कार्य चलता रहा और बाकी का मंदिर बाद में बना. मंदिर के तीन मुख्य हिस्से बनाए गए, जिसमें  गर्भगृह और शिखर, सभा मंडप और नृत्य मंडप शामिल है. इनमें से पहले दो हिस्सों का निर्माण पहले पूरा हुआ. 7 मई 1965 को महाराजा जाम साहेब दिग्विजयसिंहजी ने कलश प्रतिष्ठा, ध्वजारोहण और महारुद्र यज्ञ की शुरुआत की और मंदिर पर रेशमी ध्वज फहराया. आखिरकार पूरी तरह से पुनर्निर्मित मंदिर को 1 दिसंबर 1995 को तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने राष्ट्र को समर्पित किया. 

कैसा है मंदिर?

वर्तमान मंदिर परिसर में गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप शामिल हैं, जो अरब सागर के तट पर भव्यता के साथ खड़े हैं. मंदिर के शिखर की ऊँचाई 150 फीट है, जिसके शीर्ष पर 10 टन भारी कलश स्थापित है. 27 फीट ऊंचा ध्वजदंड मंदिर की आध्यात्मिक उपस्थिति का प्रतीक है. पूरा परिसर 1,666 स्वर्ण-मंडित कलशों और 14,200 ध्वजाओं से सुसज्जित है, जो पीढ़ियों की भक्ति और उत्कृष्ट शिल्प कौशल का प्रतीक हैं. 

सोमनाथ निरंतर जीवंत उपासना का केंद्र बना हुआ है. यह संख्या एक साल में 92 से 97 लाख भक्तों के बीच रहती है (2020 में लगभग 98 लाख तीर्थयात्रियों ने मंदिर के दर्शन किए).   बिल्व  पूजा जैसे अनुष्ठानों में 13.77 लाख से अधिक भक्त हिस्सा लेते हैं, जबकि 2025 में महाशिवरात्रि  के अवसर पर 3.56 लाख श्रद्धालु आये थे. भक्तों को सोमनाथ के इतिहास से जोड़ने में सांस्कृतिक पहलों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. 

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