1945 की गर्मियों में, जब दूसरे विश्वयुद्ध के सायरन की आवाजे बंद हो गई थीं. हिटलर मर चुका था, नाजी उच्च कमान ध्वस्त हो चुकी थी. चारों तरफ शांति का अहसास हो रहा था. पूरा यूरोप खंडहरों में तब्दील हो चुका था. लगभग एक दशक में पहली बार, महाद्वीप शांति की संभावना पर विचार कर रहा था. हालांकि, प्रशांत क्षेत्र में युद्ध जारी रहते हुए भी, यूरोप भर में बम गिराना कम से कम खत्म हो गया था. कहीं किसी के मन में एक बार फिर से पूरी दुनिया में तबाही भरी आंधी लाने का विचार तेजी से उमड़-घुमड़ रहा था.
जब सेकंड वर्ल्ड वॉर खत्म होने के बाद पूरी दुनिया में शांति छाने लगी. मलबों के बीच से जिंदगी एक बार फिर सुगबुगाने लगी थी. जब यूरोप शांति का जश्न मना रहा था. इसी बीच 1945 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने चुपचाप अपने जनरलों को सोवियत संघ पर हमले की योजना बनाने के लिए कहा. चर्चिल का यह ऑर्डर तीसरे विश्वयुद्ध के बटन दबाने जैसा था. ऐसे में जानते हैं कि क्या सचमुच उस वक्त दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध के करीब पहुंच चुकी थी और ब्रिटेन तत्काल और उसके बाद होने वाले युद्ध के कितने करीब था?
'ऑपरेशन अनथिंकेबल' की हो चुकी थी प्लानिंग
जब यूरोप के महान शहरों की सड़कों पर जश्न का माहौल था, तब ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल पहले से ही एक और संघर्ष पर विचार कर रहे थे. चर्चिल के अनुरोध पर, ब्रिटिश चीफ ऑफ स्टाफ ने 'ऑपरेशन अनथिंकेबल' नामक एक प्रस्ताव तैयार किया था. इसका लक्ष्य बहुत बड़ा था.
इस ऑपरेशन का मकसद सोवियत संघ की सेना को पूर्वी यूरोप से खदेड़ना और सोवियत नियंत्रण में आ चुके देशों की स्वतंत्रता को बहाल करना. द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के कुछ ही हफ्तों के भीतर, ब्रिटेन तीसरे विश्व युद्ध की संभावना का आकलन करने लगा था.
द्वितीय विश्व युद्ध के दोस्त से लेकर दुश्मन बनने तक
जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट था, यह लगभग अकल्पनीय था. फिर भी, चर्चिल ने इसकी प्लानिंग करने पर जोर दिया. हिस्ट्रीएक्स्ट्रा पॉडकास्ट पर बोलते हुए , इतिहासकार टिम बोवेरी ने बताया कि यह विचार कैसे विकसित हुआ. बोवेरी बताते हैं कि युद्ध के दौरान, ब्रिटेन, अमेरिका और सोवियत संघ ने नाजी जर्मनी के खिलाफ एक साथ लड़ाई लड़ी थी. लेकिन उनका गठबंधन भरोसे या साझा राजनीतिक भावना के बजाय व्यावहारिक आवश्यकता पर आधारित था. फरवरी 1945 में याल्टा सम्मेलन के समय तक , इसमें दरारें दिखने लगी थीं.
याल्टा में, चर्चिल, अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट और सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन यूरोप के लिए युद्ध के बाद के समझौते पर सहमत हुए, जिसमें यह वादा भी शामिल था कि मुक्त देशों में स्वतंत्र चुनाव होंगे. फिर भी, जैसा कि बूवेरी बताते हैं, वे वादे लगभग तुरंत ही टूटने लगे.
याल्टा समझौते के बाद के महीनों में, रूजवेल्ट को चर्चिल से लगातार संदेश मिलते रहे कि कैसे सोवियत संघ याल्टा समझौते का उल्लंघन कर रहा था. कैसे वे पूर्वी यूरोप में मित्र देशों के पर्यवेक्षकों को आने की अनुमति देने से इनकार कर रहे थे. कैसे स्टालिन युद्धबंदियों के आदान-प्रदान में आनाकानी कर रहा था और कैसे वह बलपूर्वक इन देशों पर प्रभुत्व स्थापित करने की अपनी प्लानिंग को आगे बढ़ा रहा था.
हालांकि, रूजवेल्ट को अभी भी सहयोग की उम्मीद थी, लेकिन पोलैंड, रोमानिया और बाल्कन में सोवियत नियंत्रण के विस्तार के साथ चर्चिल की चिंता बढ़ती जा रही थी. युद्ध जीतने में सहायक अस्थिर गठबंधन तेजी से अविश्वास में तब्दील हो रहा था.
'परसेंटेज डील' ने बोये थे संदेह के बीज
स्टालिन के प्रति चर्चिल का संदेह याल्टा की घटना से पहले का था. अक्टूबर 1944 में चर्चिल के मॉस्को दौरे के दौरान, उन्होंने स्टालिन के साथ एक 'परसेंटेज डील' किया था. इसमें यह तय किया गया था कि ब्रिटिश और सोवियत संघ बाल्कन में अपने प्रभावक्षेत्र को कैसे बांटेंगे.
एक कागज के टुकड़े पर, चर्चिल ने प्रभाव के मोटे-मोटे अनुपात लिख दिए. इसमें रोमानिया में 90 प्रतिशत सोवियत प्रभाव, ग्रीस में 90 प्रतिशत ब्रिटिश प्रभाव और बाकी जगहों पर बराबर हिस्सेदारी. स्टालिन ने कागज पर निशान लगाया और उसे वापस कर दिया. भले ही वह सोवियत प्रभुत्व को पूरी तरह से रोक नहीं सके, चर्चिल को कम से कम इसे कुछ हद तक सीमित करने की उम्मीद तो थी.
लेकिन 1945 की शुरुआत तक यह स्पष्ट हो गया था कि स्टालिन अपने कब्जे में ली गई संपत्ति को अपने पास रखना चाहता था. रूजवेल्ट से कड़े कदम उठाने की चर्चिल की अपील को काफी हद तक नजरअंदाज कर दिया गया. इसी निराशा से उपजकर उन्होंने एक और कठोर विचार सामने रखा.
फिर ऐसे हुई 'ऑपरेशन अनथिंकेबल' की प्लानिंग
1945 की वसंत ऋतु में, जब सोवियत सेना बर्लिन की ओर बढ़ रही थी. ब्रिटिश और अमेरिकियों की अपेक्षा से कहीं अधिक तेजी से उन्होंने पूर्वी यूरोप पर अपना नियंत्रण मजबूत कर लिया. तभी चर्चिल ने अपने चीफ ऑफ स्टाफ से सोवियत संघ की कथित प्राकृतिक सीमाओं तक, यानी जहां वे अगस्त 1939 की मोलोटोव-रिबेंट्रोप संधि से पहले थे, लाल सेना को खदेड़ने की सैन्य क्षमता का आकलन करने को कहा.
इस प्रस्ताव में ब्रिटिश और अमेरिकी सेनाओं के साथ विवादित रूप से फिर हथियारबंद जर्मन सैनिकों द्वारा सोवियत सैनिकों को पूर्व की ओर धकेलने के लिए एक अचानक आक्रमण की कल्पना की गई थी. चीफ ऑफ स्टाफ ने एक प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार की, जिसका कोडनेम 'ऑपरेशन अनथिंकेबल' रखा गया.
इसका घोषित उद्देश्य स्टालिन को सोवियत सीमाओं पर प्रतिबंध स्वीकार करने के लिए विवश करना था, लेकिन इसका अर्थ यूरोप में जीत के कुछ ही हफ्तों के भीतर अपने हालिया सहयोगी के खिलाफ एंग्लो-अमेरिकन युद्ध होता.चर्चिल के सलाहकारों ने शीघ्र ही यह निष्कर्ष निकाला कि ऑपरेशन अनथिंकेबल हर स्तर पर असंभव था.
ऐसे टला तीसरा विश्वयुद्ध
सैन्य क्षमता की दृष्टि से, रूस की लाल सेना विशाल थी. इसकी संख्या मित्र देशों की सेनाओं से कई गुना अधिक थी और इसने पूर्वी और मध्य यूरोप के अधिकांश भाग पर कब्जा कर रखा था. यदि पोलैंड में हमला सफल भी हो जाता, तो स्टालिन रूसी क्षेत्र में गहराई तक पीछे हट सकता था, जिससे मित्र देशों को एक लंबे, असंभव अभियान में उलझना पड़ता. फिर अचानक, मॉस्को के बाहर ठंड से जम कर ब्रिटिश और अमेरिकी सैनिकों की मौत होती जाती.
बिना चर्चिल को कुछ भी बताए, ऑपरेशन अनथिंकेबल को जून 1945 तक चुपचाप रद्द कर दिया गया. एक महीने बाद, आम चुनाव में चर्चिल को पद से हटा दिया गया और क्लेमेंट एटली की लेबर सरकार सत्ता में आई. फिर भी, इस घटना से यह स्पष्ट हो गया कि चर्चिल स्टालिन पर कितना गहरा अविश्वास करते थे और यूरोप में आने वाले विभाजन की उन्हें कितनी आशंका थी. ऐसे ही अविश्वास भरी नीतियों ने आगे कोल्ड वॉर को जन्म दिया.
सिद्धार्थ भदौरिया