ईरान और अमेरिका के बीच सीज फायर की घोषणा का इजरायल ने भी समर्थन किया है. इसके बाद भी लेबनान पर इजरायल का हमला जारी है. इजरायल वहां हिजबुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाने की बात कहता रहा है. हिज्बुल्लाह एक शिया मिलिशिया आर्म्ड ग्रुप है, जिसे ईरान के IRGC का प्रॉक्सी माना जाता है. यह इजरायल के साथ युद्ध में हमास को सपोर्ट करता रहा है.
हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि इजराइल और ईरान समर्थित हिज़्बुल्लाह समूह के बीच की यह दुश्मनी लेबनान-इजरायल सीमा पर दशकों से चले आ रहे संघर्ष का नया चैप्टर है. लेबनान और इजरायल के बीच दुश्मनी की शुरुआत इन देशों के जन्म से ही शुरू हो गया था. इसे समझने के लिए अतीत में थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा.
लेबनान- इजरायल की दुश्मनी की ये है कहानी
लेबनान को 1943 में फ्रांस से स्वतंत्रता मिली. उस वक्त फिलीस्तीन से अलग एक यहूदी देश इजरायल बनाने की बात चल रही थी. लेबनान में मुस्लिम धर्म के शिया और सुन्नी दोनों ही समुदाय की अच्छी आबादी है. इसके अलावा लेबनान लाखों अरब फिलीस्तीनी शरणार्थियों, ईसाइयों और कुछ यहूदियों का भी घर है. ऐसे में उस वक्त नवगठित लेबनान के राष्ट्रवादियों का मानना था कि अल्पसंख्यकों का एक गठबंधन बनेगा जिसके तहत एक ईसाई-लेबनानी राष्ट्र ज़ायोनिस्टों के साथ जुड़ जाएंगे. इसलिए लेबनान ने अरब देशों के साथ रहना मुनासिब समझा.
जब 1948 में इजरायल ने अपने स्वतंत्रता की घोषणा की तो अरब देश इस बात पर सहमत नहीं थे. खासकर मिस्र, जॉर्डन, इराक, सीरिया और लेबनान ने इसका विरोध किया. लेबनान की सीमा इजरायल से लगती थी. इसलिए उसने अन्य अरब देशों के साथ मिलकर नवगठित इजरायल के खिलाफ युद्ध शुरू कर दी. युद्ध के दौरान ब्रिटिश-शासित फिलिस्तीन के इलाके (इजरायल)से भागकर या निष्कासित किए गए लगभग 100,000 फिलिस्तीनी शरणार्थी बनकर लेबनान पहुंचे.
अरब देशों में लेबनान की सेना सबसे छोटी थी. इजरायली सेना ने अरब लड़ाकों को खदेड़ दिया और अस्थायी रूप से दक्षिणी लेबनान के एक हिस्से पर कब्जा कर लिया. 23 मार्च, 1949 को एक युद्धविराम संधि पर हस्ताक्षर किए गए और इजरायली सेना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सीमा पर वापस लौट गई.
दक्षिणी लेबनान में बफर जोन बनाना चाहता है इजरायल
इस घटना के बाद से लगातार लेबनान और इजरायल के बीच जंग होती रही है. खासकर लेबनान का ये दक्षिणी हिस्सा हमेशा से युद्ध का मैदान बना रहा है. इजरायल इस दक्षिणी इलाके के एक खास हिस्से बफर जोन बनाना चाहता है. यह लिटानी नदी (Litani River) तक फैला हुआ है. इसे बफर जोन बनाकर इजरायल अपनी उत्तरी सीमा को हिज्बुल्लाह लड़ाकों से सुरक्षित रखना है.
अरब और फिलीस्तीन के मुद्दे पर लेबनान हमेशा इजरायल से भिड़ता रहा है. इसी तरह 1978 में जब लेबनान स्थित फिलिस्तीनी लड़ाकों ने सीमा पार इजरायल में छापे मारना जारी रखा, तो इजरायल ने लेबनान पर कर दिया था. उस वक्त भी इजरायल लिटानी नदी तक आगे बढ़ गए थे. बाद में इजरायली सेना संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप के बाद पीछे लौट आई थी.
अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, 6 जून, 1982 को इजरायल ने अपनी सीमा पार पीएलओ (फिलीस्तीन लिब्रेशन ऑर्गनाइजेशन) के हमलों को रोकने के बहाने लेबनान पर आक्रमण कर दिया. हालांकि, इजरायली सेना राजधानी बेरूत तक उत्तर की ओर बढ़ गई और उसने मुख्य रूप से फिलिस्तीन समर्थक पश्चिमी बेरूत को घेर लिया.
इसी बीच 14 सितंबर 1982 को लेबनानी फोर्सेस (एलएफ) के नेता और नवनिर्वाचित राष्ट्रपति बशीर गेमायेल की सीरियाई सोशल नेशनलिस्ट पार्टी के एक सदस्य द्वारा हत्या कर दी गई. दो दिन बाद, इजरायली सेना के संरक्षण में एलएफ के एक अन्य नेता एली होबेका ने दक्षिणपंथी ईसाई बलों को एकजुट किया, जिन्होंने हजारों, फिलिस्तीनियों और लेबनानी शियाओं को मार डाला.इसे अब सबरा और शतीला नरसंहार के नाम से जाना जाता है.
1983 में इजरायल की सेना मध्य लेबनान से पीछे हट गया, लेकिन उसने दक्षिण में अपनी सेनाएं तैनात रखीं. 1985 में इज़राइल दक्षिणी लेबनान में लिटानी नदी तक पीछे हट गया. दक्षिणी लेबनान में लगभग 15 किलोमीटर चौड़े एक सुरक्षित कब्जा क्षेत्र स्थापित किया. इसे दक्षिणी लेबनानी सेना और इजरायली सेना मिलकर नियंत्रित करती है.
हिज्बुल्लाह के साथ लेबनान-इजरायल संघर्ष का नया चैप्टर शुरू
तब इजरायल द्वारा लेबनान पर आक्रमण ने ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) के समर्थन से हिजबुल्लाह के गठन को बढ़ावा दिया. 1985 से ईरान के साउथ लेबनान के इसी हिस्से से इजरायल के प्रभाव को कम करने के लिए हिज़्बुल्लाह ने इजरायली सेनाओं के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया.
1996 में हिज़्बुल्लाह द्वारा दक्षिण में इजरायली सेना पर नियमित रूप से हमले करने और उत्तरी इज़राइल में रॉकेट दागने के चलते, इज़राइल ने 17 दिनों तक चलने वाला 'ऑपरेशन ग्रेप्स ऑफ रैथ' नामक आक्रमण शुरू किया, जिसमें लेबनान में 200 से अधिक लोग मारे गए.
24 मई को इजरायल ने घोषणा की कि वह अपनी सेनाओं को संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सीमा, ब्लू लाइन तक वापस बुला लेगा. इस निर्णय से दक्षिणी लेबनान पर इजरायली कब्जा प्रभावी रूप से समाप्त हो गया. जैसे ही इजरायली सेना पीछे हटी, दक्षिण लेबनानी सेना के कई सदस्य भी उनके साथ लेबनान से बाहर निकल गए. इस तरह इजराइल दक्षिणी लेबनान से पीछे हट गया, जिससे 22 वर्षों का कब्ज़ा समाप्त हो गया.
2006 जुलाई में, हिज़्बुल्लाह ने सीमा पार करके इजरायल में प्रवेश किया, दो इजरायली सैनिकों का अपहरण किया और अन्य को मार डाला, जिससे पांच सप्ताह तक चलने वाला युद्ध छिड़ गया जिसमें हिज्बुल्लाह के गढ़ों और राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे दोनों पर इज़राइल द्वारा भारी हमले किए गए.
जब इजरायली सेना दक्षिणी लेबनान में आगे बढ़ी, तो इजरायली हवाई हमलों का हिजबुल्लाह ने रॉकेट दागकर जवाब दिया. लेबनान में कम से कम 1,200 लोग, जिनमें ज्यादातर नागरिक थे और 158 इजरायली, जिनमें ज्यादातर सैनिक थे, मारे गए.
8 अक्टूबर 2023 को, हिजबुल्लाह ने इजरायल के साथ गोलीबारी शुरू कर दी, यह घटना फिलिस्तीनी आतंकवादी समूह हमास द्वारा दक्षिणी इजरायल में समुदायों पर हमला करने और गाजा युद्ध को भड़काने के एक दिन बाद हुई. 2024
जुलाई में इजरायल के कब्जे वाले गोलान हाइट्स पर हुए हमले में 12 युवक मारे गए. हिजबुल्लाह ने इसमें शामिल होने से इनकार किया, लेकिन इजरायल ने बेरूत के पास एक हमले में हिजबुल्लाह के एक वरिष्ठ कमांडर को मार गिराया.
इस तरह लेबनान और इजरायल की जंग का हिज्बुल्लाह के रूप में नया अध्याय शुरू है. ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के साथ इस बार 2026 में एक बार फिर से लेबनान के हिज्बुल्लाह ने इजरायल पर जवाबी कार्रवाई की और अब जब ईरान युद्ध में सीज फायर हो चुका है,फिर भी इजरायल लेबनान पर हमला जारी रखे हुए है. क्योंकि, एक बार फिर से इजरायल दक्षिणी लेबनान पर कब्ज कर उसे एक सुरक्षित बफर जोन बनाना चाहता है.
सिद्धार्थ भदौरिया