यूपी-उत्तराखंड होगा किसान आंदोलन का अगला पड़ाव, मुहिम को गांव-गांव ले जाने की तैयारी

आंदोलन को और तीव्र और असरदार बनाने के लिए संयुक्त किसान मोर्चा ने इस राष्ट्रीय आंदोलन के अगले पड़ाव के रूप में मिशन उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड शुरू करने का फैसला किया है.

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किसान आंदोलन किसान आंदोलन

कुमार अभिषेक

  • लखनऊ,
  • 26 जुलाई 2021,
  • अपडेटेड 6:58 PM IST
  • किसान आंदोलन और तेज करने का फैसला
  • UP-उत्तराखंड होगा संयुक्त किसान मोर्चे का पड़ाव
  • दोनों राज्यों में अगले साल होने हैं चुनाव

तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने और एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग को लेकर चल रहा किसान आंदोलन आज आठ माह पूरे कर चुका है. इस मौके पर आंदोलन को और तीव्र और असरदार बनाने के लिए संयुक्त किसान मोर्चा ने इस राष्ट्रीय आंदोलन के अगले पड़ाव के रूप में मिशन उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड शुरू करने का फैसला किया है.

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इस मिशन के तहत संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले संघर्षरत इन दो प्रदेशों के किसान संगठन सहित पूरे देश के किसान संगठन अपनी पूरी ऊर्जा इन दो प्रदेशों में आंदोलन की धार तेज करने पर लगाएंगे. संयुक्त किसान मोर्चा ने बयान जारी करके कहा कि इस मिशन का उद्देश्य पंजाब और हरियाणा की तरह उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भी हर गांव किसान आंदोलन का दुर्ग बन सके. मोर्चा ने आगे कहा, ''आज स्वामी सहजानंद सरस्वती, चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत की धरती पर जिम्मेदारी आ पड़ी है कि उसे भारतीय खेती और किसानों को कॉर्पोरेट से बचाना है.''

इस मिशन के तहत संयुक्त किसान मोर्चा ने आह्वान किया है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में  सभी टोल प्लाजा को फ्री किया जाए. इसके अलावा, किसान मोर्चे ने यह भी तय किया है कि बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के कार्यक्रमों का विरोध और उनके नेताओं का बहिष्कार किया जाएगा. इस मिशन को रूप देने के लिए पूरे प्रदेश में बैठकों, यात्राओं और रैलियों की भी शुरुआत हो रही है.

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इन मुद्दों को उठाएगा संयुक्त किसान मोर्चा

संयुक्त किसान मोर्चा ने फैसला किया है कि इस मिशन के तहत राष्ट्रीय मुद्दों के साथ-साथ इन दोनों प्रदेशों के किसानों के स्थानीय मुद्दे भी उठाए जाएंगे. किसान मोर्चे ने दावा किया कि यूपी में गेहूं के कुल अनुमानित 308 लाख टन उत्पादन में से सिर्फ 56 लाख टन यानी18% गेहूं ही सरकार ने खरीदा है. इसके अलावा, अन्य फसलों (अरहर, मसूर, उड़द, चना, मक्का ,मूंगफली, सरसों) में सरकारी खरीदी शून्य रही है. केंद्र सरकार की प्राइस स्टेबलाइजेशन स्कीम के तहत तिलहन और दलहन की खरीद के प्रावधान का इस्तेमाल भी नहीं के बराबर हुआ है.

 

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