वेबसाइट का दावा- प्लेन क्रैश में ही हुई थी नेताजी की मौत

वेबसाइट का कहना है कि 18 अगस्त 1945 की रात को ही बोस का देहांत हुआ था. चश्मदीदों के तौर पर नेताजी के एक करीबी सहयोगी, दो जापानी डॉक्टर, एक एंटरप्रेटर और एक ताईवानी नर्स को शामिल किया गया है.

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जख्मी नेताजी का इलाज करने वाले डॉ. योशिमी (दाएं से दूसरे ) जख्मी नेताजी का इलाज करने वाले डॉ. योशिमी (दाएं से दूसरे )

स्‍वपनल सोनल

  • नई दिल्ली,
  • 16 जनवरी 2016,
  • अपडेटेड 9:56 AM IST

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जहां यह मानने को तैयार नहीं हैं कि नेताजी की मौत विमान हादसे में हुई थी, वहीं ब्रिटेन की वेबसाइट bosefiles.info ने दावा किया है कि सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु ताईवान में हुए प्लेन क्रेश में हुई थी. वेबसाइट ने अपने दावे को सही ठहराते हुए कथित चश्मदीदों के बयान भी जारी किए हैं.

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इससे पहले भी नेताजी के जीवन के दूसरे पहुलओं, खासकर उनकी को लेकर कई उद्भेदन करने वाली इस वेबसाइट का कहना है कि 18 अगस्त 1945 की रात को ही बोस का देहांत हुआ था. चश्मदीदों के तौर पर नेताजी के एक करीबी सहयोगी, दो जापानी डॉक्टर, एक एंटरप्रेटर और एक ताईवानी नर्स को शामिल किया गया है.

क्या कुछ लिखा है वेबसाइट ने अपने दावे में-

वेबसाइट में लिखा है कि सुभाष चंद्र बोस के सहायक कर्मी कर्नल हबीबुर रहमान ने हादसे के छह दिन बाद 24 अगस्त 1945 को एक लिखित और हस्ताक्षरित बयान दिया था. रहमान ने बयान में कहा, 'निधन से पहले बोस ने मुझसे कहा था कि उनका अंत समीप है. उन्होंने मुझसे उनकी ओर से यह संदेश देशवासियों को देने कहा था- मैं भारत की आजादी के लिए अंत तक लड़ा और अब मैं उसी प्रयास में अपना जीवन दे रहा हूं. देशवासी स्वतंत्रता संघर्ष जारी रखें जबतक कि देश स्वतंत्र न हो जाए. आजाद हिंद जिंदाबाद.'

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देहांत के बाद नर्स का बयान
मौत के एक साल बाद नर्स शान ने बयान दिया, 'जब उनकी मृत्यु हुई. मैं उनके पास ही थी. वह पिछले साल 18 अगस्त (1945 ) को चल बसे.' नर्स शान आगे कहती है, 'मैं सर्जिकल नर्स हूं और मैंने उनकी मृत्यु तक उनकी देखभाल की. मुझे निर्देश दिया गया था कि मैं उनके पूरे शरीर पर जैतून का तेल लगाऊं और मैंने ऐसा ही किया. जब कभी उन्हें थोड़ी देर के लिए होश आता, वह प्यास महसूस करते थे. कराहते हुए वह पानी मांगते थे. मैंने उन्हें कई बार पानी पिलाया.'

बुरी तरह जल चुका था शरीर
दुर्घटना के बाद अस्पताल में भर्ती किया गया, उसके प्रभारी चिकित्सा अधिकारी जापानी सेना के कैप्टन तानेयोशी योशिमी थे. वे अकेले जिंदा गवाह हैं. डॉ. योशिमी ने पहले कई गवाहियां हांगकांग के स्टानली गाओल में 19 अक्टूबर 1946 को दीं, जहां उन्हें ब्रिटिश अधिकारियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जेल में डाल दिया था. इसे ताईवान के युद्ध अपराध संपर्क खंड के कैप्टन अल्फ्रेड टर्नर ने रिकॉर्ड किया. उन्होंने कहा, 'जब उन्हें बिस्तर पर लिटाया गया तब मैंने ही तेल से उनके (बोस के) शरीर का जख्म साफ किया और उनकी ड्रेसिंग की. उनका पूरा शरीर बुरी तरह जल चुका था. उनका सिर, छाती और जांघ गंभीर रूप से जले हुए थे. वह अधि‍तकर बातें अंग्रेजी में कर रहे थे. इसके बाद एक एंटरप्रेटर को बुलाया गया.

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अस्पताल में जापानी अधिकारियों ने दी सलामी
इसके बाद नाकमुरा नाम के एक एंटरप्रेटर को अस्पताल बुलाया गया. नाकमुरा ने बताया कि वह अक्सर सुभाष चंद्र बोस के लिए दुभाषिए के रूप में काम कर चुके हैं और उनकी उनसे कई बार बातचीत हो चुकी है. इस बात में कहीं कोई संदेह नहीं जान पड़ा कि जिस व्यक्ति से वह बात कर रहे थे, वह सुभाष चंद्र बोस ही थे. नेताजी ने जुबान से कभी दर्द या पीड़ा की शिकायत नहीं थी. नेताजी का यह मानसिक संतुलन देख हम सभी दंग थे.' उन्होंने कहा कि बोस चल बसे और कमरे में जापानी अधिकारी एक कतार में खड़े हो गए. उन्होंने बोस के पार्थिव शरीर को सलामी दी.

...और रात 11 बजे चल बसे नेताजी
डॉ. योशिमी ने कहा, 'अस्पताल में भर्ती किए जाने के चौथे घंटे में ऐसा लगा कि उनकी हालत बिगड़ रही है. वह अपनी कोमा की दशा में कुछ फुसफुसाए, बड़बड़ाए, लेकिन वह कभी होश में नहीं लौटे. करीब रात ग्यारह बजे वह चल बसे.' डॉ. योशिमी 1956 में मेजर जनरल शाह नवाज की अगुवाई वाली नेताजी जांच समिति और 1974 में न्यायमूर्ति जीडी खोसला आयोग में पेश हुए.

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