बेघर…युवा…औरत: ‘हर रात नया नर्क लेकर आती है, कोई चेहरे पर धार छोड़ता है, कोई जबर्दस्ती करता है...’

पुराने-दान में मिले कपड़े, जो साइज में कई गुना बड़े या छोटे हों...उलझकर जूट बन चुके बाल... पैसे या खाना देते हुए हिकारत-घुली-दया... और अनाथ का पुछल्ला...यही मेरी पहचान थी. कालका जी मंदिर के आगे पली-बढ़ी. बचपन में मुझे बस भूख और सर्दी-गर्मी समझ आती थी. उम्र बढ़ी तो इसमें डर शामिल हो गया. रात का. लोगों का. अनचाहे चली आई नींद का.

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बेघर महिलाएं भूख और मौसम ही नहीं, एक साथ कई मार झेलती हैं. (Photo: Generative AI by Vani Gupta) बेघर महिलाएं भूख और मौसम ही नहीं, एक साथ कई मार झेलती हैं. (Photo: Generative AI by Vani Gupta)

मृदुलिका झा

  • दिल्ली.,
  • 29 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 10:33 AM IST

बेघर औरतों से मिलें तो एक बात कॉमन दिखेगी. अधसोयापन! ये चुना हुआ उनींदापन है. रातभर जागने के लिए वे तमाम तरकीबें करती हैं.
 
अधपेट रहना...

खुद को जख्म दे देना कि टीस से नींद न आए...

या फिर लगातार एक ही जगह पर चलते रहना...
 
'सोए और खोए तो सब कहते हैं, लेकिन हमारे लिए है- सोए और लुटे!' हंसी-हंसी में ही श्यामली अपना सारा दर्द बता जाती हैं.
 
रात साढ़े आठ बजे जब हम श्यामली से मिले, वे ड्यूटी के लिए तैयार हो रही थीं. शेल्टर होम में सुपरवाइजर हूं. नाइट शिफ्ट करती हूं ताकि दिन बच्चों के साथ बिता सकूं. वे बताती हैं.

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कहानी!

हमारी क्या कहानी! बेघर हैं. औरतें हैं. हम सबकी एक ही कहानी होती है. मारपीट. जबर्दस्ती. नशा. रिपीट…. यही सिलसिला चलता रहता है. किस्मत ज्यादा ही मेहरबान हुई तो पेट रह जाएगा और फिर बच्चे भी उसी दलदल में फंसे रहेंगे.

सफेद स्वेटर पर क्रोशिया का सफेद स्टोल ओढ़े श्यामली याद करती हैं- होश संभाला, तब से खुद को कालका जी मंदिर के आगे पाया. लोग कहते कि तेरे मां-बाप तुझे यहां छोड़ गए हैं. कोई मुझे मुन्नी कहता, कोई ऐ लड़की. छह साल की थी, जब मैंने अपना नाम रख लिया- श्यामली.


 
मंदिर में जो भी आता, मैं और मेरे जैसे कुछ और बच्चे उसके आगे-पीछे डोलने लगते. कभी पैसे मिलते, कभी नहीं. कई बार भंडारे में खाना मिल जाता. पेट भरने लगा. साथ में शरीर भी भरने लगा. यहीं से असल मुश्किल शुरू हुई.
 
मैं सोती तो कोई न कोई बगल में आ लगता. कपड़ों के भीतर हाथ डालने लगता. मैं छोटी ही थी. कितना विरोध करती. भागती तो दौड़कर पकड़ लेते. मारपीट करते.
 
उस वक्त एक ही साध थी. किसी भी तरह खुद को इतना छोटा कर लो कि किसी को दिखाई न दो...

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अपने-आप को छिपाना मुश्किल हो चुका था. दिन तो जैसे-तैसे बीत जाता. मंदिर रात 12 बजे बंद होता था. उससे पहले से शरीर कांपने लगता. ये पुरानी बात है. तब आसपास काफी पेड़-पौधे थे. पत्थर थे. मैं वहां जाने लगी लेकिन फिर भी पकड़ाई में आ जाती.

पहली रिपोर्ट यहां पढ़ें- बेघर…युवा…औरत: 'सोते हुए लोग चिपट जाते, दुत्कारो तो मारपीट करते, कभी घर-परिवार वाली थी, वक्त ने सब छीन लिया'
 
किसी ने आपकी मदद नहीं की?

कौन करता! हर जगह दादागिरी चलती है. बेघर लोगों में भी कोई न कोई बॉस होता है, जिससे सब डरते हैं. लोग-बाग सोचते कि आज मुझे बचाएंगे तो कल खुद मारे जाएंगे. वे चुपचाप पड़े रहते. मैं भागती रहती. रोती रहती. ऐसे कितनी रातें बिताईं, कोई अंदाजा नहीं. फिर एक रोज मेरा भी शिकार हो गया. फिर अक्सर होने लगा.
 
मना करती तो मारपीट होती. भीख के पैसे छीन लेते. बचने का कोई तरीका नहीं था. धीरे-धीरे मैं नशा करने लगी. एक बुराई आई तो उससे जुड़कर कई गलत आदतें आने लगीं. जैसे पैसे को पैसा खींचता है, वैसे गलत को गलत खींचता है. मैं जेबकतरी बन गई. तब एक बस चला करती थी- नंबर 429. उसमें मैंने कितनी ही जेबें काटीं. हम लड़के-लड़कियां का गैंग बन चुका था.

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जब तक डरती थी, सब नोंचते-मारते थे. जब मैंने भी उन-सा रंग अपना लिया, सब साथी हो गए.

श्यामली बेहद बेबाकी से बता रही हैं. जैसे अपनी नहीं, किसी और की कहानी कहती हों. सफेद स्टोल में घिरा चेहरा शब्दों के साथ हरकतें करता हुआ. उनकी जिंदगी में इतने मोड़ हैं, जितने पुराने बनारस की गलियों में न मिलें.


 
ड्रग्स तो लेती ही थी. एक रोज नशे में ही किसी ने मुझे बेच दिया. आंखें खुलीं तो मैं मथुरा के किसी गांव में थी. उस आदमी ने खुद को मेरा पति बताया. पच्चीस हजार में मुझे मेरे ही किसी संगी ने बेच दिया था.
 
मैं हंसने लगी. परिवार वाली हंसी. सिर पर छत थी. सामने एक आदमी था, जो मेरा पति था. वो जो-जो कहता, मैं करती. अक्सर सोचती कि एक नशेड़ी-जेबकतरी-बेघर से किसी ने शादी क्यों की, फिर तुरंत इस खयाल को हटा देती. उससे कभी पूछा भी नहीं कि कहीं उसके दिमाग ये खयाल न आ जाए.

जल्द ही मैं प्रेग्नेंट हो गई. बच्चा हुआ तब पता लगा कि मैं वहां क्यों थी. वो आदमी पहले से शादीशुदा था. पत्नी का पेट नहीं ठहर पा रहा था तो उन्होंने ये तरीका खोजा. एक-एक दो बच्चे हुए. दोनों मुझसे उसी वक्त छीन लिए गए. सीने से लगाने तक का सुख नहीं मिला. दूध से मेरी छातियां दर्द करतीं लेकिन बच्चे को गाय के दूध पर पाला जा रहा था.

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दूसरी रिपोर्ट यहां पढ़ें- बेघर…युवा…औरत: 'कभी मैं घर की ज़ीनत थी, किसी बाहरी ने देखा तक न था, अब खुले में रहती हूं, लोग इशारे करते हैं'
 
बच्चों के जन्म के बाद मुझसे रोज मारपीट होने लगी. गाय बांधने की जगह ही अब मेरा बेडरूम थी और बची हुई रोटियां मेरा खाना. पति काफी पीने लगा था. पीते-पीते ही वो खत्म हो गया. आखिरी धागा भी टूट गया. एक रोज मैं निकल भागी और वापस कालका मंदिर पहुंच गई. जिंदगी फिर उसी रफ्तार पर चल पड़ी. नशा. चोरी. मारपीट. और जबर्दस्ती.
 
घर में रहकर लौटी थी, तो बेछत होने की चुभन इस बार और ज्यादा थी.
 
बेघर औरत पर दोगुनी मार है. हम जहां सोएं, मर्द छांट-छांटकर उन्हीं जगहों पर यूरिनेट करने आ जाते. डांटो तो हंसते हुए छेड़खानी शुरू कर दें. गुस्साओ तो पलटकर ब्लेड मार दें. बचने की कोशिश में सूनी जगह खोज लो तो रेप होना पक्का.

हर रात नया नर्क दिखाती थी.


 
रात सोती तो कलेजा उन बच्चों को कलपता, जिन्हें मैं कभी दूध नहीं पिला सकी. लेकिन उन्हें वहां छोड़ना ही ठीक था. कुछ नहीं तो कम से कम उनके पास छत तो है.
 
ऐसे ही एक रोज जबर्दस्ती में मुझे फिर बच्चा ठहर गया. अबकी बार मैंने कालका में ही अपने एक संगी से शादी कर ली. वक्त के साथ अहसास हुआ कि बच्चों के लिए अच्छा इंसान बनना है.
 
पता करते हुए मैं बच्चों के साथ शेल्टर होम आ गई.
 
पति?

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वो अब भी वहीं हैं पुरानी जिंदगी में डूबे हुए. लेकिन उनका मलाल नहीं. मेरे पास अब बच्चे हैं और एक सपना है कि हमारा भी एक घर हो.

रैनबसेरा तो है!

यहां कौन रहना चाहता है. मैं घर चाहती हूं, जिसे अपनी मर्जी से सजा सकूं. जिसकी दीवारों पर मेरा छोटा बालक ड्रॉइंग कर सके. बड़ा लड़का जहां किसी फुटबॉलर की फोटो लगा सके. वे जो मांगें, मैं वैसा पका सकूं. यहां खाना तो मिलता है, लेकिन होटल का पका-पकाया. मौसम की मार से बचाने को छत तो है, लेकिन घर का सुकून नहीं. सब कुछ रूल के हिसाब से होता है.
 
श्यामली सरककर पास चली आती हैं, जैसे कोई बेहद खुफिया बात बतानी हो- मैंने फरीदाबाद में घर ले लिया है. दस हजार की किस्त चुकाती हूं. जब साढ़े 12 लाख हो जाएंगे, घर मेरा हो जाएगा. अब सोते-जागते यही खयाल रहता है. मैंने तो वहां के लिए परदे और बाकी सामान छांटने भी शुरू कर दिए!
 
लगभग तीस साल की श्यामली की आंखों में फरीदाबाद का बारह-लाखी घर चमक रहा है.

सफेद स्टोल की तरह सफेद परदे, जहां फूलदार कपड़े पहना बच्चा दीवार पर बारहखड़ी लिख रहा हो, और मां रसोई में उसकी पसंद का नाश्ता बना रही हो.

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हमारे लिए जो रुटीन है - इस बेघर मां के लिए वही जिंदगी है.

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