बेघर…युवा…औरत: 'कभी मैं घर की ज़ीनत थी, किसी बाहरी ने देखा तक न था, अब खुले में रहती हूं, लोग इशारे करते हैं'

'इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से बच्चों संग दिल्ली आई, तो दिल में अरमान था. खोया हुआ शौहर मिल जाएगा और हम घर लौट आएंगे. सुनहरे फ्रेम में जड़ी मुस्कुराती पिक्चर. वो 2014 था. दस साल गुजरे. अब दूर गांव में घर तो बाकी है, लेकिन लौटने की हूक नहीं बची.'

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दिल्ली के शेल्टर होम्स में एक बड़ी आबादी दूसरे राज्यों से आई बेघर महिलाओं की हैं. (Photo: Generative AI by Vani Gupta) दिल्ली के शेल्टर होम्स में एक बड़ी आबादी दूसरे राज्यों से आई बेघर महिलाओं की हैं. (Photo: Generative AI by Vani Gupta)

मृदुलिका झा

  • दिल्ली,
  • 28 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 10:19 AM IST

दिल्ली की सड़कों से गुजरें, खासकर निजामुद्दीन या मुनिरका या पुराने हिस्सों की तरफ- तो पांत के पांत लोग सड़क किनारे सोए दिखेंगे. दरवाजे पर धूल-खाए पुराने बंदनवार की तरह झूलती ये आबादी बेघर है. वो गैरजरूरी चीज, जिसे भुलाए रहने में ही भलाई है. अनदेखेपन में भी जिंदा रहती इस भीड़ में महिलाएं भी मिलेंगी. हर रात उनके लिए नए खतरों का न्योता है. रेप. मारपीट. छिनैती. और सबसे खतरनाक चीज- इस सबका आदी हो जाना.

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Aajtak.in ने ऐसी ही कुछ महिलाओं से बात की. परवीन (नाम बदला हुआ) उन्हीं में से एक हैं.

बंगला साहिब के पास बने शेल्टर होम में रहती परवीन भी कभी ‘आम’ औरत थीं. प्रयागराज की रहने वाली. शादीशुदा. घर-बार वाली. रसोई-बच्चों वाली. रात में अपने बिस्तर पर सोने-जागने वाली. और घर की 'जीनत'...लगभग 20 मिनट की बातचीत में यह शब्द वे बार-बार दोहराती हैं.
 
डिप्रेशन में घर से गए पति को तलाशते हुए दिल्ली पहुंची परवीन ने वक्त का छोटा हिस्सा सड़कों पर बिताया, लेकिन उतना ही उन्हें भीतर तक तोड़ने के लिए काफी था.
 
हरे सलवार-कुरते में माथे पर छोटी काली बिंदी लगाए महिला के चेहरे और बोलचाल में अब भी बीती रौनक चहलकदमी करती है. पहली नजर में वे होमलेस नजर नहीं आतीं. दरम्यानी कीमत के दिखते कपड़े. सलीके से बने हुए बाल और इन सबसे ऊपर बोलचाल का अंदाज. वे ठहर-ठहरकर बोलती हैं, पड़ाव के साथ... सड़क पर बसे उतावलेपन से कोसों दूर. 

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सास की मौत के बाद पति बीमार रहने लगे. पहले काम छोड़ा. फिर घर से भी गायब रहने लगे. लोग कहते कि उनका दिमाग फिर गया है. होते-होते एक दिन वे पूरे ही गायब हो गए. दो-तीन रोज किसी ने खयाल नहीं किया. भरापूरा ससुराल. दिन से रात तक बारहों काम रहते. दिमाग चले शौहर की बीवी तो नौकर ही बन जाती है.
 
मैं चाकरी बजा रही थी कि खटका हुआ. एक-एक दिन करके पूरा हफ्ता बीत चुका था. उनकी कोई आहट नहीं थी. 
 
मैंने पूछ-पाछ की तो जेठ पर्दा हटाकर पीटने लगे. वे कहते कि अम्मा तो हमारी भी गई, फिर तुम्हारे ही शौहर का दिमाग कैसे चल गया! बात ठीक थी. मेरे पास इसका जवाब नहीं था. कह नहीं सकी कि जिसकी माली हालत कमजोर हो, कलेजा भी उसी का कच्चा होता है. 
 
मैं चुपचाप घर के काम करती और बच्चे संभालती. चार बेटियां थीं. एक गोद में लगी हुई. वक्त मिलते ही पति के मोबाइल पर कॉल करती कि शायद कभी तो फोन लग जाए, कभी तो कोई खबर मिल जाए. 
 
आखिर एक दफा कॉल उठ गया. उस पार नई आवाज थी. निजामुद्दीन दरगाह का सफाईवाला. उसी से पता लगा कि वे दिल्ली में हैं. दरगाह में पड़े रहते हैं. दिमाग चला हुआ है तो बात नहीं कर सकेंगे. सफाईवाले ने भी यही बात दोहराई. 
 
मैंने घरवालों को बताया. उन्होंने बरज दिया. ‘लौटना होगा तो लौट आएगा. तुम चुप रहो.’ उस रोज आटा गूंथते, कोरमा पकाते, सफाई करते और बच्चों को सुलाते हुए मैं एक ही बात सोचती रही- मुझे दिल्ली जाना है. 
 
सास के इंतकाल के बाद मेरा सारा सोना बिक चुका था. बच्चों की जरूरतों के लिए कोई पैसे नहीं देता था. ले-देकर कान की बालियां छूटी थीं. उन्हें बेचा और सामान बांध-बूंधकर बच्चों को बटोर घर से निकल गई. शौहर को लेकर घर लौट आऊंगी, इतना ही इरादा था, लेकिन क्या पता था कि वापसी कभी नहीं होगी. 
 
निजामुद्दीन उतरते ही सीधे दरगाह पहुंची. वहां कोना-कोना घूम लिया लेकिन वे नहीं दिखे. फोन भी बंद बता रहा था. मैं डर गई. ‘अल्लाह! घर से पैर बाहर निकालकर कहीं कोई गलती तो नहीं हो गई!’
 
उस रात मैं दरगाह किनारे ही सो गई. जागी तो बैग गायब- पैसे गायब. पांव की पायल तक उतर गई थी. घर फोन करूं तो उधर से टूं-टूं की आवाज आए. 
 
और मायका?

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वहां कॉल करने की हिम्मत नहीं थी. मैं सात बहनों में बड़ी थी. अब्बू दिल के मरीज. उनपर कितना बोझ डालती. 

दिन बीतने लगे. मैं दरगाह के आसपास बैठी रहती. वहां खाने-पीने को बहुत कुछ बंटता है लेकिन पता ही नहीं था कि हाथ कैसे फैलाए जाएं. न बच्चे ही कुछ मांगते थे, न मैं ही कुछ बोल पाती थी. परवीन हाथ खोलकर दिखाते हुए झट से बंद कर लेती हैं, जैसे गुरबत के उन दिनों की वहां तस्वीर छपी हुई हो.
 
एक बार एक बेटी भूख से इस कदर परेशान हो गई कि पंप से गटागट पानी पी आई. रात सोई तो पानी की उल्टियां ही उल्टियां. आखिरकार मैंने मांगना सीख लिया. शर्मिंदगी से आवाज लरजती. आंखें ढुलकतीं. लेकिन लोग इसे एक्टिंग ही मानते हुए झोली में डालते चलते. 
 
घर पर पाबंदियों में रहती थी. कभी किसी गैर मर्द ने नहीं देखा था. यहां खुले में बैठती. आते-जाते लोग इशारा करते. कई बार बांह भी पकड़ ली कि साथ चलो, पैसे देंगे. 

खुले में बैठी औरत दुकान पर सजा सामान हो जाती है. जिसका दिल चाहा, उठाया-परखा और खरीद लिया या छोड दिया. मैं भी वही सामान हो रही थी कि तभी एक रोज पास के पार्क में पति दिख गए. वे एक दरख्त के नीचे सो रहे थे. पागलों की तरह भागती गई. उन्हें उठाया तो वे पहचाने ही नहीं. मैं नाम ले-लेकर पुकारती. शादी के बाद के प्यार वाले नाम. रूठने-मनाने के नाम. वे खोए हुए देखते रहे.
 
पहले रोना आया. फिर गुस्सा. फिर तरस आने लगा. इस आदमी के साथ मैंने कितने खुशरंग देखे थे. अब वो इस हाल में है. दरख्त तले सोता हुआ.
 
मैंने मांग-तांगकर काफी सारे अखबार जमा किए. सुई-धागा खरीदा. और सिल-सुलाकर एक गद्दा-सा बना दिया. एक कोने में वे सोते. एक तरफ मैं सारे बच्चों को बटोरकर बैठती. फिर सर्दियां आने लगीं. ओस गिरी तो अखबार भीगकर मिट्टी हो गए. 
 
इसी वक्त सुना कि निजामुद्दीन में बच्चा चोर घूम रहे हैं. एक बच्ची को मैं सीने से चिपटाकर रखती. दो को एक गोद में रखती, बड़ी को एक गोद में. ऊपर से कंबल ढांप देती. मेरा सिर और ऊपर का हिस्सा खुला ही रहता. ठंड से कान सुन्न हो जाते. कमर-जोड़ों में तीखा दर्द रहने लगा. नींद आती तब भी डर के मारे आंखें खुली रहतीं कि कहीं कोई मेरी बेटियों को न ले जाए. 

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बच्चों से घिरी थी, लोग तब भी नहीं बख्शते थे. गंदे इशारे और गंदी जबान तो आम बात थी. कई लोग गलत जगह छूने की भी कोशिश करने लगे. मैं पास सोए पति को जगाती तो भी उन्हें कोई सुध नहीं थी.
 
ऐसी ही एक सर्दी की रात थी, जब किसी ने मुझे घसीटना चाहा. दस साल की मेरी बेटी जाग गई. उसने ईंट उठाकर मारी. ये वो बच्ची थी, जो घर पर ऊंची आवाज पर बिलख पड़ती थी. आज पत्थर उठाकर अजनबियों को डराने लगी.
 
मैं रोए जा रही थी कि वक्त ने मुझे कहां पहुंचा दिया. कभी मैं घर की जीनत थी. अब ये हाल है कि इज्जत नीलाम होने को है. रोते हुए ही कितने दिन-कितनी रातें बीतीं- कुछ याद नहीं. 
 
अब?

अब रैनबसेरा में रहती हूं. ससुराली रिश्ता तोड़ चुके. पति सब भूल-भाल चुके. मायके से कमजोर हूं तो उन्हें बताने का कलेजा नहीं. एक वक्त था, जब सजे-सजाए कमरे में रहती. सर्दियों में हीटर, गर्मी में एसी चलता. मौसम के साथ कपड़े बदलते. सब रुक चुका है. एक ही मौसम है, रुखा-बेजान जो सालों से चला आ रहा है. 
 
शेल्टर होम में ही केयरटेकर बन चुकी परवीन महीने के बीस हजार कमाती हैं. 

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घर की तमन्ना किसे नहीं होती. हाथों में गुलाब हो और एकदम से छिन जाए, तब भी खुशबू बनी रहती है. घर की याद मेरे लिए वही फूल है. पर हर किसी का सपना पूरा भी तो नहीं होता. पति अनफिट हैं. उनका इलाज. बेटी के दिल में छेद था. उसका इलाज. जो कमाया- सब खर्च कर दिया. बस, उम्मीद है कि बच्चे पढ़-लिख जाएं और उन्हें अपनी छत मिल सके. 

परवीन की दुआ-करती आवाज में गरमाहट, मानो कितनी धूप, कितनी खुशियां- सर्द मौसम में एक साथ आ जाएं. पुराने दुख के पुराने जख्म भरे हुए. हरी सलवार-कमीज पर बित्ताभर काली बिंदी वाली परवीन एक बार फिर घर की जीनत बनी हुई! 

(तीसरी किस्त में पढ़ें श्यामली को, मंदिर के सामने पली-बढ़ी इस युवती की जिंदगी में खुशी का तसव्वुर ही अकेली खुशी रही.)

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