बेघर…युवा…औरत: 'सोते हुए लोग चिपट जाते, दुत्कारो तो मारपीट करते, कभी घर-परिवार वाली थी, वक्त ने सब छीन लिया'

दिल्ली-एनसीआर का मौसम अब भी सर्द बना हुआ है. धूप की चमक बीते इश्क की कसक जितनी चुभन-भरी. परतदार कपड़ों के बीच भी हवा किसी घुसपैठिए के अंदाज में भीतर चली आती है. इसी शहर का एक और चेहरा भी है. फ्लाईओवरों की आड़ में सोता. सड़क किनारे छिपता. इनमें औरतें भी मिलेंगी. अधपेट...अधढंकी...अधसोई...और अधजिंदा!

Advertisement
एक सर्वे के मुताबिक 2024 के मध्य में दिल्ली में 3 लाख से ज्यादा लोग बेघर थे. (Photo: Generative AI by Vani Gupta) एक सर्वे के मुताबिक 2024 के मध्य में दिल्ली में 3 लाख से ज्यादा लोग बेघर थे. (Photo: Generative AI by Vani Gupta)

मृदुलिका झा

  • नई दिल्ली,
  • 22 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 9:32 AM IST

सर्दियों में दिल्ली दो फांक हो जाती है. एक हिस्सा वो है, जिसके लिए ठंड कश्मीरी फिरन और पश्मीना की नुमाइश का वक्त है. घरों में हीटर और मलमली रजाइयों के बीच पॉल्यूशन पर बहसें चलेंगी. दूसरा हिस्सा ठीक उलट है. बेघर. तिस पर भी औरत. इनकी जद्दोजहद खुद को धुएं नहीं, रेप से बचाना है. वे ठंड में महंगे कपड़े पहन इतराती नहीं, खुद को ढांप-भर पाने की जुगत में रहती हैं. सर्दियों में उन्हें हेल्दी सूप की हुड़क नहीं लगती, भरपेट खाना उनका अकेला हासिल है.
 
फ्लाईओवर-सड़क और मंदिर-दरगाहों किनारे सोती इन्हीं औरतों से aajtak.in ने बात की. कुमुदा (पहचान छिपाई हुई) ऐसा ही एक चेहरा हैं. 

Advertisement

वे कहती हैं- पहले मैं भी घरबार वाली थी. मौसम बदलने पर अचार-पापड़ सुखाती तो उन्हें बंदरों-कौओं से बचाते झुंझलाती. वक्त पलटा. अब हर रात खुद को साबुत बचा पाना बड़ी चीज है.

सराय काले खां! शहर के दक्षिण-पूर्वी इस हिस्से से शहर-ए-दिल्ली के लोग अक्सर गुजरते हैं. यहां निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से लेकर मेट्रो की पिंक लाइन भी है. मुगल दौर में सराय काले ख़ां एक पड़ाव हुआ करता था, जहां से बादशाहों से काफिले गुजरते और दूर-दराज के मुसाफिर पनाह लेते थे.

सल्तनत बीत गई, लेकिन तासीर वही रही. साल 2024 में इस जगह का नाम बदलकर आदिवासी नेता के नाम पर बिरसा मुंडा चौक कर दिया गया. सराय काले खां अब भी सैकड़ों के लिए ठिकाना है. फर्क यही है कि मुसाफिरों की जगह अब बेघर ले चुके, जिनके लिए सड़कें ही सराय हैं.
 
मिलने पर ये लोग मुस्कुराते हुए बात करते हैं. तस्वीर भी खिंचाते हैं. बस घर के भीतर बुलाकर बैठने की मनुहार नहीं कर पाते.
 
ठंडी-नंगी सड़कों पर उम्र का बड़ा हिस्सा बिता चुकी कुमुदा भी इनमें से एक हैं. महोबा की इस महिला ने दिल्ली के शुरुआती दिन सड़क पर बिताए.

Advertisement

बेघरों के लिए आश्रय गृह! दरवाजे पर 'कुमुदा सदन' या 'कुमुदिनी' जैसा कोई फैंसी नेमप्लेट नहीं, बल्कि धूसर-सफेद बोर्ड पर आश्रय गृह लिखा हुआ.

बड़े गोलाकार कैंपस में सीमेंट और एस्बेस्टस से बने हुए कई आयताकार घर. कोई पुरुषों के लिए, कोई महिलाओं और बच्चों के लिए. इन्हीं में से एक हिस्सा परिवार के लिए है.

कुमुदा अपने पति के साथ यहीं रहती हैं. काले और गहरे स्लेटी परदे लगाकर आठ-बाय-आठ का हिस्सा बांट दिया गया है. यहां आप बिस्तर लगा लीजिए, और बचे हुए कोने में कुछ सजा लीजिए, या चाहें तो कपड़ों की गट्ठर रख डालिए. यही ड्रॉइंगरूम है, यही बेडरूम. रसोई इस घर में मिसिंग है. कुछ वक्त पहले एक आश्रय गृह में आग लगने के बाद से यहां खाना पकाने पर रोक लग गई.
 
फुसफुसाते हुए हमें बाहर ले जाती हैं. पति बीमार है, ठीक से बात नहीं हो पाएगी. बाहर एक लॉक्ड कंप्यूटर रूम खुलवाकर हमें बिठाया जाता है.

यहीं महोबा की कुमुदा हमें ठीक से दिखती हैं.

गांव में रहते हुए साड़ी पहनती महिला ने शहर आकर सलवार-कुरती पहनना सीख लिया. लेकिन शहराती ढंग वाली नहीं, किनारे तुरपाई की हुई चौड़े पायंचे वाली. सिर पर दुपट्टा जो अंचरे का दूर का रिश्तेदार लगता है. पैरों की दो ऊंगलियों में घिसी हुई बिछिया. यही अकेला जेवर है, जो गिरस्थन कुमुदा के पास बाकी रह गया. होठों के किनारों पर जमाने पहले चबाए हुए महंगे कपूरी पान की उड़ी हुई रंगत.

Advertisement

वे याद करती हैं- हम भी कभी घरबार वाले थे. वार-त्योहार मनाते. मौसम बदलता तो बरी-पापड़ बनाते. वो सब करते, जो घरवालियां करती हैं. फिर ये बीमार पड़ गए. पहले महोबा में ही इलाज हुआ. तबीयत नहीं संभली तो कई शहरों के चक्कर लगे. वो ठीक तो हो गए लेकिन इस बीच घर-बार बिक चुका था.  
 
आसपास से काफी लोग दिल्ली जाते थे. देखा-देखी हम भी चले आए. सोचा था कि यहां आकर कमाएंगे और धीरे-धीरे पूंजी जोड़ लेंगे.
 
कभी बाहर का कुछ काम किया था आपने?

बताया तो. हम गिरस्ती वाली लुगाई थे. घर के सब काम जानते. दस तरह का खाना बनवा लो. सफाई करवा लो. एक नजर देखकर नई-पुरानी काट के कपड़े भी सी-पिरो लेते. मानकर चले थे, कि दोनों जना मिलकर करेंगे तो कुछ न कुछ हो ही जाएगा. पता नहीं था, ऐसे दिन देखेंगे.


 
एक बैग में कपड़े लेकर आए थे. न ओढ़ने को कुछ था, न बिछाने को. कभी मोहल्ले-भर को अपने हाथों से बनाकर खिलाते. यहां सड़क किनारे होटल का खाना पड़ता. वहां कच्ची बाड़ी में टमाटर-मिर्च बो रखी थी. कभी फूल-फल भी उगा लेते. यहां गाड़ियों के धुएं और चिल्ल-पों में रहते. लेकिन असल मुश्किल रात में शुरू होती.

जब दुनिया खा-पीकर सोने जाती, हम जागने की पारी लगाते.

Advertisement

पति सोएं तो मैं बैठी रहती. मैं सोऊं तो वे पहरेदारी करें. कीमती कुछ था नहीं, ले-देकर एक इज्जत थी. घर-द्वार भले बिक गया, लेकिन थी तो मैं भले घर की लुगाई ही. एक रोज दोनों की आंख झपक गई. उस रात जो बीता, वो हादसा लौट-लौटेकर हर रात आता है.

निजामुद्दीन शेल्टर होम को अपना घर बना चुकी कुमुदा अब फुसफुसा रही हैं- दोनों जना सो रहे थे. आसपास और लोग भी थे. सब लेबरी (मजदूरी) करने वाले. इतने में एक बस वाला आकर मुझे उठाता है- चलो-चलो, सब मजदूरिन चली गईं. तुम भी उठो. बस में बैठो. वो मेरा हाथ पकड़े हुआ था. नींद से मेरी न आंखें खुलें, न दिमाग. मैं काठ की तरह चलने लगी. बगल में घरवाला धुत्त सोए था.

कुछ कदम चली होऊंगी कि किसी ने मेरे पति को आवाज दी. वे दौड़ते हुए आए, उतने में बस वाला मेरा हाथ छोड़कर भाग गया.

पति ने आव देखा, न ताव- तुरंत एक थप्पड़ जमा दिया. नींद खुल चुकी थीं. मैं पूरी रात रोती बैठी रही. अगले दिन काम पर गई तो आंखें जलें. दिन-पर-दिन बीते. पहले आंखें जलतीं. फिर सिर में दर्द रहने लगा. काम करते हुए नींद आने लगी. लेबरी करूं तो हाथ से सामान गिर-गिर जाए. कई बार काम से हटा दिया गया. दुख होता, शर्म भी आती कि बचुवन की तरह सोए-सोए जागे हैं, लेकिन नींद और मौत कहां बखत देखती हैं!
 
उस आदमी के बारे में कुछ पता लगा, जो आपको ले जा रहा था?

Advertisement

हां. वो बस ड्राइवर था. पुलिस से कहा-सुनी भी हुई. उन्होंने रपट नहीं लिखी. बस, कह दिया कि ज्यादा से ज्यादा लोग इकट्ठा सोया करो और हफ्ते-हफ्ते की पारी लगाओ. भले नींद कम होगी, लेकिन औरतें सुरक्षित रहेंगी.

महोबा में रहते हुए दिल्ली जाने का इरादा किया, तब मन में धुकधुकी तो थी लेकिन खुशी भी थी. बड़ा शहर देखूंगी. घूमूंगी. शहर का खाना खाऊंगी. शहराती बोली जानूंगी. मेहनत लगेगी लेकिन आज नहीं तो कल, हालात बदल ही जाएंगे. तब सोचा नहीं था कि ये दिन देखूंगी.

कई महीने पूरी नींद नहीं सो सके. कभी बे-चिंता नहीं रहे. चोर-चपाट का डर तो क्या रहता, लोग चिमट जाते थे.

कितनी बार ऐसा हुआ कि मेरे बगल में कोई और आकर सो गया. छुआछई करने लगा. दुत्कारो तो कहेंगे कि क्यों, तुमने जगह खरीद रखी है! जहां जाओ, वहीं ये हाल. फिर शेल्टर का पता लगा और हम यहां चले आए. लगभग 12 साल से यहीं हैं. 
 
अब तो पूरी नींद मिलती होगी!

हां. लेकिन अब अपने कच्चे-पक्के घर की याद आती है. घर जाने को जी करता है लेकिन घर है ही नहीं. किसकी दहलीज पर जाकर बैठ जाएं! जब एकदम ही सहा नहीं जाता तो अपनी बहन के घर चली जाती हूं. मेहमान सही, पर कुछ रोज छत का सुख तो मिलता है. लॉकडाउन से वहां भी नहीं जा सकी.

Advertisement

क्यों?

पैसे नहीं जुटते. ये अब काम नहीं कर पाते. मुझे भी कोठियों में काम कभी मिलता है, कभी नहीं. न तो वहां जा पा रही हूं, न उसे यहां बुला सकती हूं. हम खुद रैनबसेरा में रहते हैं. गांव वाले बातें बनाएंगे कि खुद तो बेछत है, वहीं अपनी बहन को बुला लिया. गांव की रीत-बात सब बहुत अलग होती है. मकान बेचने के बाद से हमारा जाना भी उन्हें नहीं सुहाता था.  
 
लंबी बातचीत के बीच कुमुदा थक जाती हैं. उम्र हो चली- वे कहती हैं!
 
कितनी उम्र है आपकी!
 
चालीस की हूं. वे ठहरते हुए बताती हैं, जैसे जीवन का बड़ा हिस्सा खत्म हो चुका हो. जिस एज को शहराती यंग 40s कहते हैं, उसमें इस महिला की कई जिंदगियां बीत चुकीं.
 
हम दोबारा कुमुदा के घर लौटते हैं. रैनबसेरा में सबसे कोने वाला हिस्सा जो उन्हें सीनियरिटी की वजह से हासिल हुआ.
 
टीन की छत. ट्रेन की एसी कोच की तर्ज पर परदों से घिरा बिस्तर. दीवार पर भगवान की तस्वीरें लगी हुईं. एक कोना धुंधाई हुई अगरबत्ती से काला पड़ा हुआ. बर्तन के नाम पर एक गिलास. बेड से लगी हुई साइड टेबल, जिसपर ताजा चाय के बासी दाग दिखते हैं.

Advertisement


 
कुमुदा के पति वहीं बैठे हुए हैं. मिलने पर मुस्कुराते हैं. परिचय वाली मुस्कान. इशारा करते हुए बिस्तर-कम-ड्रॉइंगरूम में बैठने को कहते हैं. पास ही बिल्ली का एक बच्चा खेलता हुआ. यही उनका परिवार है. उसपर हाथ फेरते हुए कुमुदा कहती हैं- इसे ही पाल-पोसकर बड़ा करूंगी. बाल-बच्चन तो अब होगा नहीं.
 
बातचीत के बीच कई चूहे यहां से वहां व्यस्तता से आते-जाते दिखते हैं, जैसे शाम की वॉक पर निकले हों. मेरे अलावा बाकी सबके लिए वे अदृश्य हैं, जैसे उन्होंने रैट फिल्टर लगा रखा हो.  
 
परदेदारी से निकलते हुए पूछ लेती हूं- यहां पति के साथ मन हो पाता है!

पर्दा तो अभी लगा है. पहले सब खुला हुआ था. सालों-साल भाई-बहन की तरह गुजारे. कभी गलती से हाथ तक न पकड़ा. भीतर अंधड़ चल रहा हो लेकिन रहना दूर-दूर ही था. फिर उम्र ही बीत गई. अब साल-छह महीने में कभी कुछ हो जाता है लेकिन सुरक्षित वो भी नहीं. परदे से भला कितना रुकता-छिपता है!
 
पास ही खड़ी महिला हामी भरते हुए कहती हैं- छींक भी आए तो यहां से वहां तक पता लगता है. ऐसे में पति-पत्नी का रिश्ता कहां हो सकेगा! ऊपर से यहां बच्चे भी हैं. ज्यादातर लोग लिहाज में मन मार लेते हैं.
 
चालीस में बीत चुकी कुमुदा अनमनी-सी कहती हैं- अब क्या तो शौक, क्या तो इच्छा... घर से सड़क तक देख चुकी औरत बस हाड़ रह जाती है. सांस लेगी. खाएगी. और मर जाएगी. इन्हीं नीले-काले परदों और सरकारी कंबल-बिस्तर के बीच.

बोलते हुए किसी जमाने में कपूरी पान से रंगे हुए होंठों के कोने अब चिरे हुए दिखते हैं, मानो मुस्कुराते हुए उनसे कत्थई खून टपक आएगा. 

(अगली किस्त में पढ़ें, परवीन की कहानी, जो अवसाद में घर से भागे शौहर की खोज में दिल्ली पहुंची और भीड़ में खोकर रह गईं.)

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement