बजट वाले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का डेरा सचखंड बल्लन पहुंचना अब पंजाब की सियासत का बड़ा मुद्दा बन गया है. वह गुरु रविदास जयंती के 649वें कार्यक्रम में शामिल हुए. इसके बाद पूरे पंजाब में डेरों पर सबकी नजर टिक गई है. प्रधानमंत्री की इस यात्रा को दलित समाज तक मजबूत संदेश के तौर पर देखा जा रहा है. पंजाब में करीब 32 प्रतिशत आबादी दलित है. यह वर्ग चुनाव में बहुत अहम माना जाता है. बीजेपी लंबे समय से पंजाब में खुद को मजबूत करने की कोशिश कर रही है. लेकिन उसे अब तक बड़ी चुनावी जीत नहीं मिल पाई है.
बीजेपी पहले अकाली दल के साथ मिलकर सरकार में रही. 1997 से 2002 और 2007 से 2017 तक वह छोटे सहयोगी की भूमिका में थी. वह परंपरागत रूप से 117 में से 23 सीटों पर चुनाव लड़ती थी. तीन कृषि कानूनों के दौरान 2020 में अकाली दल ने गठबंधन तोड़ दिया. तब से बीजेपी अकेले अपनी जमीन बनाने की कोशिश कर रही है. लेकिन रास्ता आसान नहीं है.
हाल ही में पद्म श्री से सम्मानित डेरा बल्लन के प्रमुख से प्रधानमंत्री मिले. उन्होंने वहां समय बिताया और गुरु रविदास के समानता और सद्भाव के संदेश को दोहराया. इसे पंजाब के रविदासिया समाज तक पहुंच बनाने की बड़ी कोशिश माना जा रहा है. खासकर दोआबा इलाके की करीब 19 सीटों पर इसका असर माना जाता है. इससे पहले दिसंबर 2025 में डेरा प्रमुख ने दिल्ली में उनसे मुलाकात कर न्योता दिया था.
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बीजेपी अभी दलित वोट बैंक में मजबूत पकड़ नहीं बना पाई है. पार्टी अकाली दल की सपोर्टर वाली अपनी पुरानी छवि से बाहर निकलना चाहती है. इसके लिए वह सिख नेताओं को पार्टी में ला रही है. विपक्ष इसे बाहर से लाए गए नेता बताता है. साथ ही पार्टी डेरों से नजदीकी भी बढ़ा रही है, क्योंकि डेरों का असर माना जाता है.
पंजाब के कई डेरा खुद को गैर राजनीतिक बताते हैं. वे कहते हैं कि उनका काम आध्यात्म और समाज सेवा है. लेकिन हकीकत यह है कि उनका चुनाव पर असर दिखता है. खासकर जाति आधारित वोटिंग में डेरों की भूमिका अहम मानी जाती है. पंजाब में दलित आबादी करीब 32 प्रतिशत है. इसमें रविदासिया और वाल्मीकि समुदाय सबसे बड़े समूह हैं. दोनों का वोट चुनाव की दिशा बदल सकता है. माना जाता है कि रविदासिया वोट पहले कांग्रेस को ज्यादा मिलता रहा. जबकि वाल्मीकि वोट बिखरा रहा और 2022 के चुनाव में आम आदमी पार्टी को फायदा मिला.
पंजाब हमेशा से बीजेपी के लिए कठिन राज्य रहा है. हरियाणा से सीख लेते हुए पार्टी सामाजिक समीकरण बदलने की कोशिश कर रही है. इसी रणनीति में डेरों को अहम माना जा रहा है.
बड़े डेरों पर नेताओं की नजर
प्रधानमंत्री मोदी नवंबर 2022 में राधा स्वामी सत्संग ब्यास भी गए थे. वहां उन्होंने प्रमुख गुरिंदर सिंह ढिल्लों से मुलाकात की थी. वह करीब एक घंटे वहां रहे. प्रधानमंत्री हर साल वाराणसी में गुरु रविदास के जन्मस्थान सीर गोवर्धनपुर भी जाते हैं. लेकिन 2026 का बल्लन दौरा समय और राजनीतिक संकेत के कारण खास माना गया.
केवल बीजेपी ही नहीं, दूसरे दलों के नेता भी डेरों में जाते रहे हैं.
राहुल गांधी की यात्राएं
मार्च 2016 में राहुल गांधी ने ब्यास में गुरिंदर सिंह ढिल्लों से मुलाकात की. उन्होंने पंजाब में नशे के मुद्दे पर चर्चा की. दिसंबर 2016 में वह डेरा मुख्यालय में रात रुके. उनके साथ तब के पंजाब कांग्रेस प्रमुख कैप्टन अमरिंदर सिंह भी थे. जनवरी 2017 में उन्होंने संत निरंजन दास से बंद कमरे में मुलाकात कर आशीर्वाद लिया. कांग्रेस के कई नेता नियमित रूप से डेरों में जाते रहे हैं.
अरविंद केजरीवाल की यात्राएं
सितंबर 2016 में अरविंद केजरीवाल ने ब्यास डेरा का दौरा किया. यह 2017 चुनाव से पहले हुआ था. उन्होंने गुरिंदर सिंह ढिल्लों से मुलाकात की. मार्च 2016 में केजरीवाल और भगवंत मान डेरा बल्लन भी गए थे. मार्च 2023 में भी दोनों नेता वहां पहुंचे. उन्होंने गुरु रविदास रिसर्च सेंटर के लिए रकम देने का ऐलान किया.
हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी भी हाल में पंजाब के डेरों और सामाजिक कार्यक्रमों में पहुंचे हैं. वह अक्सर पगड़ी पहनकर हरियाणा मॉडल की बात करते हैं और आम आदमी पार्टी पर हमला करते हैं.
डेरों से जुड़े विवाद
डेरों का रास्ता राजनीतिक दलों के लिए आसान नहीं होता. हाल में राधा स्वामी ब्यास प्रमुख गुरिंदर सिंह ढिल्लों के बिक्रम सिंह मजीठिया से जेल में मिलने पर विवाद हुआ. उन्होंने सितंबर 2025 और फिर 2 फरवरी 2026 को मजीठिया से मुलाकात की. दूसरी मुलाकात के बाद ढिल्लों ने मजीठिया पर लगे आरोपों को गलत बताया.
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इस पर तंज किया. उन्होंने कहा कि भगवान अदालतों को बचाए, जहां मिलने वाला ही जज बन जाए. रेल राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने मुख्यमंत्री के बयान की निंदा की. आम आदमी पार्टी समर्थक कहते हैं कि डेरा प्रमुख मजीठिया के रिश्तेदार हैं, इसलिए उनके बयान को उसी नजर से देखा जाना चाहिए.
पुराना विवाद
2017 चुनाव से पहले कई सिख नेता डेरा सच्चा सौदा गए थे. उन्होंने वहां आशीर्वाद मांगा था. यह 2007 के अकाल तख्त के आदेश के खिलाफ माना गया. 4 अप्रैल 2017 को अकाल तख्त ने 44 नेताओं को पेश होने को कहा. इसमें अकाली दल, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के नेता शामिल थे. करीब 39 नेता पेश हुए और उन्हें धार्मिक सजा दी गई.
राम रहीम और पैरोल विवाद
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम 2017 से जेल में है. उसे दो साध्वियों से दुष्कर्म और हत्या के मामलों में सजा मिली है. इसके बाद भी उसे कई बार पैरोल और फरलो मिली. फरवरी 2026 तक उसे 15 बार जेल से बाहर आने की अनुमति मिली. वह कुल 400 से ज्यादा दिन जेल से बाहर रहा. अक्सर यह समय चुनाव के आसपास रहा. इस पर भी राजनीतिक असर के आरोप लगते रहे हैं.
पंजाब में डेरों का असर कितना
अनौपचारिक आंकड़ों के अनुसार पंजाब के 13000 गांवों में करीब 9000 डेरा बताए जाते हैं. लेकिन औपचारिक अनुमान करीब 100 बड़े डेरों का है. इनमें से आधा दर्जन डेरों का पूरे पंजाब पर असर माना जाता है.
पंजाब के प्रमुख डेरा
1. राधा स्वामी सत्संग ब्यास
मुख्यालय अमृतसर के ब्यास में है. इसके लाखों अनुयायी हैं. देश और विदेश में भी बड़ा असर है. यह शाकाहार, ध्यान और अनुशासन पर जोर देता है. इसे पंजाब का सबसे संगठित डेरा माना जाता है. करीब 19 सीटों पर असर माना जाता है.
2. डेरा सच्चा सौदा
मुख्यालय हरियाणा के सिरसा में है. लेकिन मालवा क्षेत्र में मजबूत असर है. इसका प्रमुख गुरमीत राम रहीम है. इसके अनुयायी बड़ी संख्या में बताए जाते हैं. करीब 69 सीटों पर असर माना जाता है.
3. डेरा सचखंड बल्लन
जालंधर के पास बल्लन गांव में है. इसके प्रमुख संत निरंजन दास हैं. इसका असर खास तौर पर रविदासिया और दलित समाज में है. दोआबा की करीब 8 सीटों पर असर माना जाता है.
4. दिव्य ज्योति जागृति संस्थान
मुख्यालय जालंधर के नूरमहल में है. यह आध्यात्म और समाज सेवा पर जोर देता है. करीब 8 सीटों पर असर माना जाता है.
5. संत निरंकारी मिशन
मुख्यालय दिल्ली में है. पंजाब में इसकी शाखाएं हैं. यह जीवित गुरु की परंपरा पर जोर देता है. करीब 4 सीटों पर असर माना जाता है.
6. नामधारी संप्रदाय
इसका मुख्य केंद्र लुधियाना के भैणी साहिब में है.
भले ही बीजेपी ने शुरुआत जल्दी कर दी हो, लेकिन पंजाब के 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बाकी दल भी डेरों का रुख करेंगे. सवाल यही है कि क्या डेरा आगे भी चुनाव में गेम चेंजर बनेंगे. राजनीतिक दलों को इससे काफी उम्मीद जरूर है.
कमलजीत संधू